विस्तृत उत्तर
द्वितीया श्राद्ध शिव-सायुज्य का मार्ग है। शास्त्रीय आधार के अनुसार स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो मनुष्य महालय की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के पश्चात् निश्चित रूप से कैलास धाम को प्राप्त करता है और भगवान शिव के गणों के साथ मोद यानी आनन्द प्राप्त करता है।
शिव-सायुज्य का अर्थ देखें। सायुज्य का अर्थ है साथ होना, एक होना, या मिल जाना। शिव-सायुज्य यानी शिव के साथ एक हो जाना। यह मुक्ति का सर्वोच्च रूप है। जब जीवात्मा शिव के साथ एक हो जाती है, तो उसे पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।
मुक्ति के चार प्रकार हैं। पहला प्रकार है सालोक्य - भगवान के लोक में निवास। दूसरा प्रकार है सामीप्य - भगवान के निकट रहना। तीसरा प्रकार है सारूप्य - भगवान जैसा रूप प्राप्त करना। चौथा प्रकार है सायुज्य - भगवान में मिल जाना। यह सर्वोच्च मुक्ति है।
द्वितीया श्राद्ध से कैलास और शिव-गण-साहचर्य का वर्णन है। परंतु स्कन्द पुराण में शिव-सायुज्य का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। कैलास में शिव के साथ रहना सालोक्य और सामीप्य मुक्ति के रूप है। परंतु यह भी अत्यंत उच्च और दुर्लभ अवस्था है।
शिवेन सह मोदते का अर्थ सायुज्य के निकट है। शिव के साथ आनन्द पाना यानी शिव के अत्यंत निकट होना। यह सायुज्य का एक रूप है। यानी द्वितीया श्राद्ध से शिव-सायुज्य या उसके निकट की अवस्था प्राप्त होती है।
शिव-सायुज्य और श्राद्ध का सम्बन्ध गहरा है। पितृ-सेवा शिव-सेवा के समान है। जो अपने पितरों के प्रति श्रद्धावान है, वह शिव को प्रिय है। और जो शिव को प्रिय है, वह शिव-सायुज्य का अधिकारी है।
शिव-सायुज्य का पारलौकिक महत्व अत्यंत उच्च है। शैव परम्परा में शिव-सायुज्य सर्वोच्च लक्ष्य है। जो इसे प्राप्त करता है, वह पुनः संसार के चक्र में नहीं आता। वह शिव के साथ अनन्त काल तक रहता है।
द्वितीया श्राद्ध एक साथ कई लाभ देता है। पहला लाभ है पितरों की तृप्ति। पितर श्राद्ध के अन्न से तृप्त होते हैं। दूसरा लाभ है यमराज की प्रसन्नता। द्वितीया पर यमराज प्रसन्न होते हैं। तीसरा लाभ है शिव की प्रसन्नता। शिव कुपित न होकर, प्रसन्न होकर कैलास देते हैं। चौथा लाभ है शिव-सायुज्य या कैलास-प्राप्ति। पाँचवाँ लाभ है इस लोक में विपुल सम्पदा।
द्वितीया श्राद्ध और शिव-सायुज्य का सम्बन्ध भक्ति के माध्यम से है। श्लोक में भक्त्या यानी भक्ति से शब्द विशेष है। यानी केवल कर्मकाण्ड से नहीं, बल्कि भक्ति से किया गया श्राद्ध ही शिव-सायुज्य का मार्ग खोलता है। बिना भक्ति के यह फल नहीं मिलता।
शिव-सायुज्य का मार्ग सरल नहीं है। आमतौर पर शिव-सायुज्य के लिए तप, ध्यान, योग, और शिव-भक्ति की लम्बी साधना आवश्यक है। परंतु स्कन्द पुराण कहता है कि द्वितीया महालय श्राद्ध भक्ति से करने पर भी कैलास यानी शिव-सायुज्य की दिशा में प्राप्ति होती है। यह सनातन धर्म की करुणा है।
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 में मोक्षं भी श्राद्ध के फल में है। आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। यानी श्राद्ध से मोक्ष भी मिलता है। मोक्ष और शिव-सायुज्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। द्वितीया श्राद्ध इस मोक्ष यानी शिव-सायुज्य का मार्ग है।
इस सम्बन्ध का सर्वोच्च संदेश यह है कि पितृ-सेवा से शिव-सायुज्य मिलता है। यह सनातन धर्म का एक अनूठा सिद्धांत है, जो दर्शाता है कि लौकिक कर्तव्य-पालन और पारलौकिक मोक्ष-प्राप्ति परस्पर विरोधी नहीं हैं। जो अपने पितरों के प्रति कर्तव्यनिष्ठ है, वह शिव-सायुज्य का अधिकारी है।
इस विधान का व्यावहारिक उपयोग यह है कि गृहस्थ व्यक्ति भी, बिना वनवास और कठोर तप के, द्वितीया महालय श्राद्ध से शिव-सायुज्य की दिशा में बढ़ सकता है। यह गृहस्थ धर्म की महानता है। शास्त्रीय आधार के रूप में स्कन्द महापुराण नागर खण्ड अध्याय 230 और याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया श्राद्ध और शिव-सायुज्य का सम्बन्ध प्रत्यक्ष है। द्वितीया महालय श्राद्ध भक्ति से करने पर शिव प्रसन्न होते हैं, और श्राद्धकर्ता को कैलास यानी शिव-सायुज्य की दिशा में ले जाते हैं। यह पितृ-भक्ति से शिव-प्राप्ति का मार्ग है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





