विस्तृत उत्तर
द्वितीया श्राद्ध से शिव इसलिए प्रसन्न होते हैं क्योंकि शिव महाकाल हैं, यमराज उनके अधीन हैं, और द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य है। शास्त्रीय आधार के अनुसार स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो मनुष्य महालय की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर यानी शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
शिव की प्रसन्नता के पाँच मुख्य कारण इस प्रकार हैं। पहला कारण है शिव महाकाल हैं। महाकाल का अर्थ है समय और मृत्यु के परम देवता। काल का अर्थ है समय और मृत्यु दोनों। शिव महाकाल के रूप में समय और मृत्यु के स्वामी हैं। पितर भी मृत्यु के बाद की अवस्था में हैं। इसलिए पितरों के लिए श्राद्ध करना शिव को प्रसन्न करता है।
दूसरा कारण है यमराज शिव के अधीन हैं। यमराज मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी हैं। परंतु यमराज स्वयं शिव के अधीन हैं, क्योंकि शिव महाकाल हैं। जब कर्ता द्वितीया पर श्राद्ध करके पितरों और यमराज को प्रसन्न करता है, तो शिव भी प्रसन्न होते हैं।
तीसरा कारण है द्वितीया पर यमराज का आधिपत्य। पद्म पुराण के अनुसार द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। प्राचीन काल में यमुना ने यमराज को इसी तिथि पर भोजन कराया था। द्वितीया यमराज की विशेष तिथि है। इस तिथि पर श्राद्ध करने से यमराज प्रसन्न होते हैं, और यमराज की प्रसन्नता शिव की प्रसन्नता बनती है।
चौथा कारण है भक्ति से किया गया श्राद्ध। स्कन्द पुराण के श्लोक में विशेष रूप से भक्त्या शब्द है यानी भक्ति से। जब कर्ता भक्ति भाव से, पूर्ण श्रद्धा से, और बिना किसी दिखावे के श्राद्ध करता है, तो वह एक सच्चा भक्त का कार्य होता है। शिव सच्चे भक्तों से अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
पाँचवाँ कारण है पितृ-सेवा शिव-सेवा है। सनातन धर्म में माता-पिता को देव-स्वरूप माना गया है। पितरों को तृप्ति देना उनकी सेवा है। और पितृ-सेवा ईश्वर-सेवा के समान है। शिव ऐसे सच्चे पुत्र से प्रसन्न होते हैं, जो अपने पितरों का नियमित श्राद्ध करता है।
शिव की प्रसन्नता के तीन फल हैं। पहला फल है कैलास धाम की प्राप्ति। मृत्यु के बाद श्राद्धकर्ता सीधे कैलास जाता है। दूसरा फल है शिव गणों के साथ आनन्द। कैलास में शिव के दिव्य गणों के साथ परम आनन्द मिलता है। तीसरा फल है विपुल सम्पदा। इस लोक में भी प्रसन्न शिव विपुल सम्पदा प्रदान करते हैं।
शिव का क्रोध भी होता है। स्कन्द पुराण के दूसरे श्लोक में कहा गया है कि जो मनुष्य द्वितीया पर महालय श्राद्ध नहीं करता, भगवान शम्भु उस पर कुपित हो जाते हैं। कुपित शम्भु उसके ब्रह्म-वर्चस्व का नाश करते हैं, और उसे रौरव-कालसूत्र नरक में डालते हैं। यह शिव के क्रोध का प्रत्यक्ष दण्ड है।
शिव और पितृ-कर्म का सम्बन्ध गहरा है। शिव न केवल ध्यान और योग के देवता हैं, बल्कि पारिवारिक जीवन के भी संरक्षक हैं। वे स्वयं गृहस्थ हैं यानी भवानीपति। परिवार के प्रति कर्तव्य, पितरों के प्रति श्रद्धा - ये सब गृहस्थ धर्म के अंग हैं। शिव ऐसे गृहस्थ से प्रसन्न होते हैं, जो अपने पितरों के प्रति श्रद्धावान है।
शिव की प्रसन्नता का व्यापक प्रभाव यह है कि वे केवल पारलौकिक ही नहीं, बल्कि ऐहिक फल भी देते हैं। विपुल सम्पदा इसी का प्रत्यक्ष प्रमाण है। शिव की कृपा पाने वाला व्यक्ति इस लोक में भी समृद्ध होता है, और परलोक में कैलास पाता है।
द्वितीया श्राद्ध में भक्ति की अनिवार्यता इसीलिए है। श्राद्ध केवल कर्मकाण्ड नहीं है, बल्कि एक भक्ति का अनुष्ठान है। जब कर्ता भक्ति और श्रद्धा से श्राद्ध करता है, तो वह एक दिव्य कर्म बन जाता है, और शिव प्रसन्न होते हैं।
इस सम्पूर्ण सिद्धांत का सर्वोच्च संदेश यह है कि पितृ-कर्म और भगवद्-भक्ति अलग-अलग नहीं हैं। जो पितरों के प्रति श्रद्धावान है, वह भगवान के प्रति भी भक्त है। और जो भगवान के प्रति भक्त है, वह पितरों का भी सम्मान करता है। शास्त्रीय आधार के रूप में स्कन्द महापुराण नागर खण्ड अध्याय 230 इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः द्वितीया श्राद्ध से शिव इसलिए प्रसन्न होते हैं क्योंकि शिव महाकाल हैं और मृत्यु तथा पितरों के परम देवता हैं। द्वितीया पर यमराज का आधिपत्य है, और यमराज शिव के अधीन हैं। भक्ति से किया गया पितृ-कर्म शिव की सेवा के समान है। प्रसन्न शिव कैलास, शिव-गण-सहवास, और विपुल सम्पदा का आशीर्वाद देते हैं।
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