विस्तृत उत्तर
हाँ, भगवान शम्भु द्वितीया श्राद्ध न करने पर कुपित होते हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में कहा गया है कि जो मनुष्य द्वितीया तिथि को अधिकार होने पर भी महालय का श्राद्ध नहीं करता, भगवान शम्भु यानी शिव उस पर कुपित हो जाते हैं और उसके ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश कर देते हैं।
शम्भु कौन हैं, इसका परिचय देखें। शम्भु भगवान शिव का एक नाम है। शम् का अर्थ है सुख, आनन्द, और कल्याण। भु का अर्थ है होना या प्रदान करना। शम्भु यानी जो सुख और आनन्द प्रदान करे। यह शिव का करुणामय और आनन्द-स्वरूप नाम है।
शम्भु के कुपित होने का अर्थ विशेष है। शिव का एक स्वरूप करुणामय है, और दूसरा स्वरूप रौद्र है। जब कोई धर्म का उल्लंघन करता है, तो शिव का रौद्र स्वरूप जागृत होता है। शम्भु के कुपित होने पर उनका दिव्य तेज क्रोध के रूप में प्रकट होता है, जो दोषी को दण्ड देता है।
कुपित शब्द का अर्थ देखें। कुपित का अर्थ है क्रोधित, रुष्ट, या असंतुष्ट। जब भगवान शम्भु कुपित होते हैं, तो उनके क्रोध का प्रभाव अत्यंत भयंकर होता है। यह साधारण क्रोध नहीं है, बल्कि परम देव का क्रोध है।
शम्भु के कुपित होने के दो प्रमुख कारण हैं। पहला कारण है पितृ-कर्म का उल्लंघन। जब कोई व्यक्ति जानते हुए भी अपने पितरों के लिए श्राद्ध नहीं करता, तो यह एक गंभीर पाप है। पितृ-सेवा शिव-सेवा के समान है। पितृ-सेवा का उल्लंघन शिव को नाराज करता है। दूसरा कारण है यमराज की प्रसन्नता भंग होना। द्वितीया पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। यमराज शिव के अधीन हैं। जब पितरों के स्वामी यमराज की द्वितीया तिथि पर उपेक्षा होती है, तो शिव भी कुपित होते हैं।
कुपित शम्भु का तत्काल प्रभाव ब्रह्म-वर्चस्व का नाश है। नाशयेद् ब्रह्मवर्चसम् यानी ब्रह्म-वर्चस्व को नष्ट कर देते हैं। यह इस लोक में तत्काल होने वाला दण्ड है। ब्रह्म-वर्चस्व के नष्ट होने से जीवन में अनेक समस्याएँ आती हैं।
कुपित शम्भु का परलोक में प्रभाव रौरव-कालसूत्र नरक है। मृत्यु के बाद दण्ड है रौरवं कालसूत्राल्यं नरकं चाप्यदास्यति। यानी रौरव और कालसूत्र नरक भी देते हैं। यह परलोक में होने वाला दण्ड है।
शम्भु के कुपित होने का विपरीत पहलू देखें। जो द्वितीया श्राद्ध करता है, उससे शम्भु अत्यंत प्रसन्न होते हैं। प्रसन्न शम्भु कैलास और विपुल सम्पदा देते हैं। कुपित शम्भु ब्रह्म-वर्चस्व का नाश और नरक देते हैं। यह दोनों स्थितियाँ शम्भु की सर्वशक्तिमानता को दर्शाती हैं।
इस विधान का दार्शनिक संदेश यह है कि देव और मनुष्य का सम्बन्ध केवल प्रसाद-दान का नहीं है। जो कर्तव्य का पालन करता है, उसे देव-कृपा मिलती है। जो कर्तव्य की उपेक्षा करता है, उसे देव-क्रोध मिलता है। यह कर्म-सिद्धांत का एक रूप है।
शम्भु नाम का विशेष महत्व इस संदर्भ में है। शम्भु का अर्थ है सुख देने वाला। परंतु जब वे कुपित होते हैं, तो वही सुख देने वाले दुःख देते हैं। यह शिव की दोहरी प्रकृति है - करुणा और क्रोध दोनों।
इस श्लोक का व्यावहारिक संदेश यह है कि जिनके पितरों की मृत्यु द्वितीया को हुई है, उन्हें भय के कारण नहीं, बल्कि श्रद्धा और भक्ति के कारण श्राद्ध करना चाहिए। परंतु यदि कोई श्रद्धा से नहीं करता, तो स्कन्द पुराण का यह दण्ड-विधान उसे सावधान करता है।
शम्भु की प्रसन्नता और कुपितता दोनों का मूल स्रोत एक ही है - व्यक्ति का कर्म। श्राद्ध करने का पुण्य-कर्म शम्भु को प्रसन्न करता है। श्राद्ध न करने का पाप-कर्म शम्भु को कुपित करता है। यह कर्म-फल की अकाट्य व्यवस्था है।
इस सम्पूर्ण सिद्धांत का सर्वोच्च संदेश यह है कि शिव दोनों स्वरूपों में सक्रिय हैं - करुणा में और क्रोध में। जो उन्हें प्रसन्न करता है, उसे सब मिलता है। जो उन्हें कुपित करता है, उससे सब छिन जाता है। द्वितीया श्राद्ध इस प्रसन्नता का मार्ग है। शास्त्रीय आधार के रूप में स्कन्द महापुराण नागर खण्ड अध्याय 230 इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः हाँ, भगवान शम्भु द्वितीया श्राद्ध न करने पर कुपित होते हैं। स्कन्द पुराण के स्पष्ट श्लोक के अनुसार जो मनुष्य द्वितीया पर अधिकार होने पर भी महालय श्राद्ध नहीं करता, कुपित शम्भु उसके ब्रह्म-वर्चस्व का नाश करते हैं और रौरव-कालसूत्र नरक प्रदान करते हैं।
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