विस्तृत उत्तर
स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में महालय यानी पितृ पक्ष की द्वितीया को श्राद्ध करने के सर्वोत्कृष्ट पारलौकिक फल का गान किया गया है। शास्त्रीय आधार के अनुसार स्कन्द महापुराण के नागर खण्ड अध्याय 230 में महर्षि व्यास ने महालय यानी पितृ पक्ष की द्वितीया को श्राद्ध करने के सर्वोत्कृष्ट पारलौकिक फल का गान किया है।
स्कन्द पुराण का परिचय इस प्रकार है। स्कन्द महापुराण हिन्दू धर्म के अठारह महापुराणों में से एक है। यह भगवान स्कन्द यानी कार्तिकेय को समर्पित है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं। इस पुराण में लगभग 81,000 श्लोक हैं, और यह सबसे बड़े पुराणों में से एक है।
स्कन्द पुराण के सात खण्ड हैं। ये हैं माहेश्वर, वैष्णव, ब्रह्म, काशी, अवन्ती, नागर, और प्रभास। नागर खण्ड इनमें से छठा खण्ड है। नागर खण्ड में प्राचीन नगरों और उनके इतिहास का उल्लेख है। इसी नागर खण्ड के अध्याय 230 में द्वितीया श्राद्ध की महिमा का वर्णन है।
नागर खण्ड में द्वितीया श्राद्ध के दो श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। पहला श्लोक है द्वितीयायां तु यो भक्त्या कुर्याच्छ्राद्धं महालयम्। स प्रीणाति भगवान् भवानीपतिरीश्वरः। स कैलासमवाप्नोति शिवेन सह मोदते। विपुलां सम्पदं तस्मै प्रीतो दद्यान्महेश्वरः।
इस श्लोक का सटीक अर्थ इस प्रकार है। जो मनुष्य महालय यानी पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर यानी शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के पश्चात् निश्चित रूप से कैलास धाम को प्राप्त करता है और भगवान शिव के गणों के साथ मोद यानी आनन्द प्राप्त करता है। प्रसन्न होकर भगवान शिव उसे इस लोक में भी विपुल सम्पदा यानी विपुलां सम्पदं प्रदान करते हैं।
इस महिमा के मुख्य बिंदु पाँच हैं। पहला बिंदु है भगवान शिव की प्रसन्नता। द्वितीया श्राद्ध करने से भगवान भवानीपति महेश्वर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। यह एक अद्वितीय विशेषता है। दूसरा बिंदु है कैलास धाम की प्राप्ति। श्राद्धकर्ता मृत्यु के पश्चात् कैलास धाम को प्राप्त करता है। यह परम पारलौकिक फल है। तीसरा बिंदु है शिव गणों के साथ आनन्द। कैलास में भगवान शिव के गणों के साथ मोद यानी आनन्द प्राप्त होता है। चौथा बिंदु है विपुल सम्पदा। इस लोक में भी विपुल सम्पदा प्रदान होती है। पाँचवाँ बिंदु है भक्ति की अनिवार्यता। श्लोक में भक्त्या यानी भक्ति से शब्द विशेष रूप से उल्लेखित है।
द्वितीया श्राद्ध न करने का दण्ड भी नागर खण्ड में है। दूसरा श्लोक है द्वितीयायां तिथौ मर्त्यो यो न कुर्यान्महालयम्। तस्य च कुपितः शम्भुर्नाशयेद् ब्रह्मवर्चसम्। रौरवं कालसूत्राल्यं नरकं चाप्यदास्यति। इस श्लोक का अर्थ है कि जो मनुष्य द्वितीया तिथि को अधिकार होने पर भी महालय का श्राद्ध नहीं करता, भगवान शम्भु यानी शिव उस पर कुपित हो जाते हैं और उसके ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश कर देते हैं। मृत्यु के पश्चात् उसे रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है।
नागर खण्ड में महर्षि व्यास की भूमिका विशेष है। इस खण्ड में महर्षि व्यास ने द्वितीया श्राद्ध की महिमा का गान किया है। महर्षि व्यास अठारह महापुराणों के रचयिता हैं। उनके मुख से निकला हर वचन अकाट्य और प्रमाणिक है।
भवानीपति शब्द का अर्थ भी विशेष है। भवानी का अर्थ है पार्वती, और पति का अर्थ है स्वामी। भवानीपति यानी पार्वती के पति यानी भगवान शिव। यह शिव का एक नाम है, जो उनके गृहस्थ स्वरूप को दर्शाता है।
स्कन्द पुराण का शिव-केन्द्रित होना भी इसी से जुड़ा है। स्कन्द पुराण मूलतः शैव पुराण है, जो भगवान शिव की महिमा गाता है। इसीलिए इसमें द्वितीया श्राद्ध के फल के रूप में शिव की प्रसन्नता और कैलास की प्राप्ति बताई गई है।
इस महिमा का व्यावहारिक संदेश यह है कि द्वितीया श्राद्ध करने से दोनों लोकों का लाभ मिलता है। इस लोक में विपुल सम्पदा, और परलोक में कैलास धाम। यह श्राद्ध का सर्वोच्च पारलौकिक और ऐहिक फल है।
नागर खण्ड का यह वर्णन द्वितीया श्राद्ध की अकाट्य अनिवार्यता को भी सिद्ध करता है। यह कर्तव्य से विमुख होने वाले का ब्रह्म-तेज नष्ट हो जाता है और उसे रौरव नरक की प्राप्ति होती है। यह श्लोक द्वितीया श्राद्ध की अकाट्य अनिवार्यता और उसके उल्लंघन से उत्पन्न होने वाले भयंकर दोष को रेखांकित करता है। शास्त्रीय आधार के रूप में स्कन्द महापुराण नागर खण्ड अध्याय 230 इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में द्वितीया श्राद्ध की महिमा यह है कि इसे करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, श्राद्धकर्ता को कैलास धाम और विपुल सम्पदा मिलती है। न करने वाले का ब्रह्म-तेज नष्ट होता है और रौरव-कालसूत्र नरक की यातना भोगनी पड़ती है।
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