द्वितीया श्राद्ध और शिव-सायुज्य का सम्बन्ध प्रत्यक्ष है। सायुज्य का अर्थ है भगवान के साथ एक होना। स्कन्द पुराण के अनुसार द्वितीया श्राद्ध भक्ति से करने पर श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद कैलास प्राप्त करता है और शिव के गणों के साथ मोद पाता है। यह शिव-सायुज्य के निकट की अवस्था है। पितृ-भक्ति शिव-प्राप्ति का मार्ग है।
महालय का श्राद्ध न करने वाले के तीन प्रमुख दुष्परिणाम होते हैं। पहला, भगवान शम्भु यानी शिव कुपित होकर ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश करते हैं। दूसरा, मृत्यु के बाद रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना मिलती है। तीसरा, इस लोक में भी पितृ दोष, रोग, दरिद्रता, और परिवार में कलह आती है।
हाँ, भगवान शम्भु यानी शिव द्वितीया श्राद्ध न करने पर कुपित होते हैं। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में स्पष्ट है कि जो मनुष्य द्वितीया पर अधिकार होने पर भी महालय श्राद्ध नहीं करता, कुपित शम्भु उसके ब्रह्म-वर्चस्व का सर्वथा नाश कर देते हैं और मृत्यु के बाद रौरव-कालसूत्र नरक प्रदान करते हैं। शम्भु यानी सुख देने वाले, कुपित होकर दुःख भी देते हैं।
रौरव और कालसूत्र दो भयंकर नरक हैं। रौरव में रौरव सर्पों का काटना और अग्नि की जलन होती है। कालसूत्र में काल के धागों से बाँधकर यातना दी जाती है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया तिथि पर अधिकार होने पर भी महालय का श्राद्ध नहीं करता, उसे मृत्यु के बाद इन दोनों भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है।
ब्रह्म-वर्चस्व वह दिव्य आत्मिक तेज है जो व्यक्ति को जीवन में सफलता, स्वास्थ्य, यश, और पुण्य देता है। ब्रह्म का अर्थ है परम और वर्चस् का अर्थ है तेज। यह अदृश्य परंतु शक्तिशाली आत्मिक ऊर्जा है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया श्राद्ध नहीं करता, भगवान शिव उसके ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश कर देते हैं।
द्वितीया श्राद्ध न करने पर तीन दुष्परिणाम होते हैं। पहला, भगवान शम्भु यानी शिव कुपित होते हैं। दूसरा, उस व्यक्ति के ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश हो जाता है। तीसरा, मृत्यु के बाद रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है। स्कन्द पुराण नागर खण्ड अध्याय 230 में यह स्पष्ट वर्णन है।
विपुल सम्पदा का अर्थ है प्रचुर और असीमित समृद्धि। विपुल का अर्थ है असीमित, और सम्पदा का अर्थ है ऐश्वर्य। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार द्वितीया श्राद्ध से प्रसन्न होकर भगवान महेश्वर यानी शिव इस लोक में विपुल सम्पदा प्रदान करते हैं। इसमें भौतिक धन, परिवारिक सुख, स्वास्थ्य, यश, और विद्या - जीवन के हर पहलू में समृद्धि शामिल है।
हाँ, द्वितीया श्राद्ध से शिव गणों का साथ मिलता है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद कैलास धाम प्राप्त करता है और शिवेन सह मोदते यानी शिव के गणों के साथ परम मोद यानी आनन्द पाता है। शिव के दिव्य गणों का साहचर्य परम भक्त के लिए सर्वोच्च पारलौकिक प्राप्ति है। यह द्वितीया श्राद्ध की विशिष्ट महिमा है।
कैलास धाम भगवान शिव का परम निवास है, जो हिमालय में स्थित कैलास पर्वत पर है। शैव परम्परा में यह सर्वोच्च धाम है। स्कन्द पुराण के अनुसार द्वितीया श्राद्ध करने वाला श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद निश्चित रूप से कैलास प्राप्त करता है, शिव के गणों के साथ मोद यानी आनन्द पाता है, और प्रसन्न भगवान महेश्वर इस लोक में भी विपुल सम्पदा देते हैं।
द्वितीया श्राद्ध से शिव इसलिए प्रसन्न होते हैं क्योंकि शिव महाकाल हैं यानी मृत्यु और समय के परम देवता। यमराज शिव के अधीन हैं, और द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। जब कर्ता भक्ति से पितरों का श्राद्ध करता है, तो यमराज प्रसन्न होते हैं और शिव भी प्रसन्न होते हैं। भक्तिपूर्वक पितृ-सेवा शिव की सेवा के समान है।
भवानीपति भगवान शिव का एक नाम है, जिसका अर्थ है भवानी यानी देवी पार्वती के पति। भवानी का अर्थ है पार्वती, और पति का अर्थ है स्वामी। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में कहा गया है कि द्वितीया श्राद्ध करने से भगवान भवानीपतिरीश्वरः यानी भवानी के पति ईश्वर शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं, और श्राद्धकर्ता को कैलास धाम तथा विपुल सम्पदा प्रदान करते हैं।
द्वितीया श्राद्ध से कैलास धाम की प्राप्ति होती है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो मनुष्य महालय की द्वितीया को भक्ति से श्राद्ध करता है, वह मृत्यु के बाद कैलास धाम प्राप्त करता है और भगवान शिव के गणों के साथ आनन्द पाता है। इस लोक में भी भगवान महेश्वर विपुल सम्पदा प्रदान करते हैं। यह द्वितीया श्राद्ध का सर्वोच्च पारलौकिक फल है।
स्कन्द पुराण के नागर खण्ड अध्याय 230 में महर्षि व्यास ने महालय की द्वितीया श्राद्ध की महिमा गाई है। जो मनुष्य द्वितीया को पूर्ण भक्ति से श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर यानी शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद कैलास धाम प्राप्त करता है और शिव गणों के साथ आनन्द पाता है। इस लोक में भी विपुल सम्पदा मिलती है।