षष्ठी श्राद्ध का काम्य फल है द्यूत यानी क्रीड़ा या प्रतियोगिता में विजय। सप्तमी श्राद्ध का काम्य फल है कृषि में अभूतपूर्व सफलता। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार श्लोक में द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं स्पष्ट रूप से इन फलों का वर्णन है। आधुनिक संदर्भ में षष्ठी किसी भी प्रतियोगिता में विजय, और सप्तमी कृषि व उत्पादन में सफलता का प्रतीक है।
चतुर्थी श्राद्ध से क्षुद्र पशु यानी भेड़, बकरी आदि छोटे पशुओं की प्राप्ति होती है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार चतुर्थी का काम्य फल क्षुद्र पशु है। क्षुद्र का अर्थ है छोटे। आधुनिक संदर्भ में यह लघु-उद्योग, पशु-पालन, और छोटी आय के स्रोतों की वृद्धि का प्रतीक है। काम्य भावना से चतुर्थी पर श्राद्ध करने से यह फल मिलता है।
तृतीया श्राद्ध का काम्य फल है अश्व यानी घोड़े आदि वाहनों की प्राप्ति। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 और नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः के अनुसार तृतीया को श्राद्ध करने से वाहन की कामना पूरी होती है। वैदिक काल में अश्व सर्वश्रेष्ठ वाहन था। आधुनिक संदर्भ में यह कार, मोटरसाइकिल आदि आधुनिक वाहनों की प्राप्ति का प्रतीक है।
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार तिथि-वार काम्य फल हैं — प्रतिपदा को उत्तम कन्या, द्वितीया को सुयोग्य दामाद और पशु-धन, तृतीया को अश्व यानी वाहन, चतुर्थी को क्षुद्र पशु, पञ्चमी को उत्तम पुत्र, षष्ठी को द्यूत यानी क्रीड़ा में विजय, सप्तमी को कृषि में सफलता, और अष्टमी को वाणिज्य यानी व्यापार में लाभ।
हाँ, द्वितीया श्राद्ध से अश्व जैसे वाहन भी मिल सकते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार द्वितीया का पशू वै फल गौ, अश्व आदि की प्राप्ति है। श्लोक में एकशफं यानी एक खुर वाला पशु यानी घोड़ा भी समाहित है। आधुनिक संदर्भ में पशू वै सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि - वाहन, घर, सम्पत्ति - का प्रतीक है। परंतु वाहन का मुख्य काम्य फल तृतीया श्राद्ध से जुड़ा है, जिसमें अश्व आदि वाहनों की विशेष प्राप्ति होती है।
वैदिक काल में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था। कृषि प्रधान और गौ-आधारित वैदिक समाज में गाय, बैल, घोड़ा आदि पशु आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन के मूल आधार थे। गाय दूध, घी, मूत्र, गोबर - सब देती थी। बैल कृषि का आधार था। गाय की संख्या से धन की गणना होती थी। इसी कारण द्वितीया श्राद्ध का पशू वै फल अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।
द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन पितरों के आशीर्वाद से प्राप्त होता है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को पशू वै यानी निश्चित रूप से उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है। आधुनिक संदर्भ में यह वाहन, घर, सम्पत्ति, उद्योग आदि सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि का प्रतीक है। काम्य भावना और पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करने पर पितर तृप्त होकर यह आशीर्वाद देते हैं।
हाँ, द्वितीया श्राद्ध से कन्या के विवाह की बाधा दूर होती है। याज्ञवल्क्य स्मृति का यह उद्घोष कि द्वितीया श्राद्ध से सुयोग्य दामाद की प्राप्ति होती है, इसे सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाता है। पितर तृप्त होकर योग्य वर का संकेत देते हैं, विवाह में देरी दूर होती है, परिवारों के बीच सद्भाव बनता है, और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।
द्वितीया श्राद्ध से सुयोग्य दामाद पितरों के विशेष आशीर्वाद से मिलता है। कर्ता को काम्य भावना से संकल्प करके पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करना चाहिए - कुतप मुहूर्त में, नैऋत्य दिशा में मुख करके, अपसव्य अवस्था में। कुश, तिल, सत्तू, घृत, मधु से पिण्डदान, पञ्चबलि और ब्राह्मण भोजन सब करें। तृप्त पितर कन्या के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर का संकेत देते हैं।
कन्यावेदिन का अर्थ है सुयोग्य दामाद यानी कन्या के लिए श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर। कन्या का अर्थ है पुत्री, और वेदिन का अर्थ है पाने वाला। ऐसा वर जो हर दृष्टि से उपयुक्त, श्रेष्ठ चरित्र वाला, और धर्म-कर्म में समर्पित हो। द्वितीया श्राद्ध काम्य भावना से और पूर्ण विधि-विधान से करने पर पितरों के आशीर्वाद से ऐसे कन्यावेदिन की प्राप्ति होती है।
द्वितीया श्राद्ध से दो विशेष काम्य फल मिलते हैं - कन्यावेदिन यानी अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ दामाद की प्राप्ति, और पशू वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 में यह स्पष्ट है। यह तिथि सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने और आर्थिक समृद्धि के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
प्रतिपदा को मातृकुल नाना-नानी का श्राद्ध करने से तीन प्रमुख लाभ मिलते हैं। पहला, घर में कभी क्लेश नहीं होता। दूसरा, पितृ दोष से सर्वथा मुक्ति। तीसरा, समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन। साथ ही घर में असीम सुख, शांति और सम्पन्नता का वास होता है। यह दो कुलों पितृकुल और मातृकुल के बीच आध्यात्मिक सेतु बनाता है।
पितृ दोष से तीन प्रमुख परेशानियाँ आती हैं। पहली, संतान-हीनता या संतान सम्बन्धी समस्याएँ। दूसरी, दरिद्रता और धन की कमी। तीसरी, गंभीर शारीरिक व्याधियाँ। पितृ दोष पितरों के असंतोष से उत्पन्न होता है, जब वंशज श्राद्ध नहीं करता। श्राद्ध करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।
श्राद्ध न करने वाले व्यक्ति को पितृ दोष का भागी बनना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप संतान-हीनता, दरिद्रता, और गंभीर शारीरिक व्याधियों का सामना करना पड़ सकता है। पितृ दोष पितरों के असंतोष से उत्पन्न होता है, और यह वंशज के सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करता है।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार श्राद्ध से ग्यारह फल मिलते हैं। ये हैं लंबी आयु, आज्ञाकारी पुत्र, निर्मल यश, स्वर्गलोक, उत्तम कीर्ति, शारीरिक पुष्टि स्वास्थ्य, बल, अपार ऐश्वर्य, पशु-धन गौ आदि, लौकिक सुख, और धन-धान्य। यह विष्णु पुराण के साथ भी पुष्ट है।
पितर प्रसन्न होकर वंशज को आठ अमूल्य संपदाएं प्रदान करते हैं। ये हैं दीर्घ आयु, सुयोग्य संतान, प्रचुर संपत्ति, श्रेष्ठ ज्ञान, मरणोपरांत स्वर्ग, अंतिम मुक्ति, सभी प्रकार के लौकिक सुख, और राज्य-सत्ता। याज्ञवल्क्य स्मृति में इनका विस्तार से वर्णन है। ये संपदाएं अमूल्य हैं, अर्थात् किसी भी मूल्य से नहीं खरीदी जा सकतीं।
श्राद्ध से प्राप्त होते हैं — लंबी आयु, आज्ञाकारी पुत्र, निर्मल यश, स्वर्गलोक, उत्तम कीर्ति, शारीरिक पुष्टि, बल, अपार ऐश्वर्य, पशु-धन, लौकिक सुख, धन-धान्य, श्रेष्ठ ज्ञान, मोक्ष, और राज्य-सत्ता। याज्ञवल्क्य स्मृति में आठ अमूल्य संपदाओं का वर्णन है, और मार्कण्डेय तथा विष्णु पुराण में भी इसकी पुष्टि की गई है।
हाँ, श्राद्ध से लंबी आयु मिलती है। यह श्राद्ध के आठ प्रमुख फलों में से पहला फल है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार पितर तृप्त और प्रसन्न होकर मनुष्यों को सबसे पहले दीर्घ आयु प्रदान करते हैं। मार्कण्डेय और विष्णु पुराण भी इसी की पुष्टि करते हैं।
याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार श्राद्ध से तृप्त और प्रसन्न पितर मनुष्यों को आठ अमूल्य संपदाएं प्रदान करते हैं। ये हैं आयु दीर्घ आयु, प्रजा सुयोग्य संतान, धन प्रचुर संपत्ति, विद्या श्रेष्ठ ज्ञान, स्वर्ग मरणोपरांत स्वर्ग, मोक्ष अंतिम मुक्ति, सुख लौकिक सुख, और राज्य राज्य-सत्ता।