विस्तृत उत्तर
द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन पितरों के आशीर्वाद से प्राप्त होता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को पशून् वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है।
पशू वै शब्द का विश्लेषण इस प्रकार है। पशू का अर्थ है पशु यानी जानवर। वै एक निश्चय वाचक शब्द है, जिसका अर्थ है निश्चित रूप से या वास्तव में। पशू वै यानी निश्चित रूप से पशु-धन की प्राप्ति। यह वाक्य द्वितीया श्राद्ध के फल को सुनिश्चित और निश्चित बताता है।
पशु-धन की कोटि भी विशेष है। ये पशु उत्तम कोटि के होते हैं। उत्तम कोटि का अर्थ है सर्वश्रेष्ठ। उदाहरण के रूप में गौ यानी गाय और अश्व यानी घोड़ा शास्त्रों में बताए गए हैं। ये दोनों पशु प्राचीन काल में सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे।
वैदिक काल में पशु-धन का महत्व अत्यंत उच्च था। कृषि प्रधान और गौ-आधारित वैदिक समाज में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था। गाय न केवल दूध, घी, मूत्र, गोबर देती थी, बल्कि यज्ञ-कर्म में भी उपयोगी थी। घोड़ा यातायात, कृषि, और युद्ध में काम आता था। इसलिए पशु-धन का होना समृद्धि का प्रतीक था।
पशु-धन के प्रकार और उनका महत्व देखें। पहला प्रकार है गाय। गाय सनातन धर्म में अत्यंत पूजनीय है। पंचबलि में सबसे पहले गो-बलि निकाली जाती है। गाय पवित्रता और देवत्व का प्रतीक है। दूसरा प्रकार है घोड़ा। घोड़ा शक्ति और गति का प्रतीक है। तीसरा प्रकार है अन्य पशु-धन जैसे भेड़, बकरी आदि।
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के मूल श्लोक में दोनों फल हैं। श्लोक है कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून् वै सुसतानपि। द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफं चैकशफं तथा। यानी द्वितीया से कन्यावेदिन और पशू वै दोनों मिलते हैं। ये दोनों फल सम्बन्धित हैं।
श्लोक के अंत में द्विशफं चैकशफं भी है। द्विशफं का अर्थ है दो खुर वाला यानी गाय, भैंस आदि। एकशफं का अर्थ है एक खुर वाला यानी घोड़ा, गधा आदि। यानी द्वितीया श्राद्ध से दो खुर वाले और एक खुर वाले दोनों प्रकार के पशु-धन की प्राप्ति होती है।
वर्तमान संदर्भ में पशू वै का अर्थ विस्तृत है। आज पशु-धन की जगह वाहन, घर, सम्पत्ति, उद्योग आदि भौतिक समृद्धि ले लेते हैं। द्वितीया श्राद्ध से इन सब प्रकार की समृद्धि की प्राप्ति होती है। यानी पशू वै आधुनिक संदर्भ में सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि का प्रतीक है।
पशु-धन की प्राप्ति का मार्ग पाँच चरणों में समझा जा सकता है। पहला चरण है काम्य भावना। कर्ता को द्वितीया श्राद्ध करते समय यह संकल्प करना चाहिए कि उसे पशु-धन या भौतिक समृद्धि चाहिए। दूसरा चरण है पूर्ण विधि-विधान। श्राद्ध शास्त्र-सम्मत पूर्ण विधि से किया जाना चाहिए।
तीसरा चरण है पवित्र सामग्री का प्रयोग। कुश, काले तिल, सत्तू, घृत, मधु - सब पवित्र पदार्थ प्रयोग होने चाहिए। चौथा चरण है पञ्चबलि और ब्राह्मण भोजन। पञ्चबलि में पाँच ग्रास निकाले जाते हैं, और सुपात्र ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। पाँचवाँ चरण है पिण्डदान। तीन पिण्ड पार्वण में या एक पिण्ड एकोद्दिष्ट में अर्पित किए जाते हैं।
इन सब विधियों के पूर्ण होने पर पितर तृप्त होते हैं। तृप्त पितर अपने वंशज को विशेष आशीर्वाद देते हैं। इन्हीं आशीर्वादों में से एक है पशु-धन की प्राप्ति।
द्वितीया तिथि का विशेष आधार यह है कि याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 ने इसी तिथि का काम्य फल पशू वै बताया है। प्रतिपदा को कन्या मिलती है, और द्वितीया को कन्यावेदिन के साथ-साथ पशु-धन भी मिलता है। यानी द्वितीया दो प्रकार के फल देती है।
पितरों के आशीर्वाद का सूक्ष्म प्रभाव अत्यंत गहरा है। जब पितर प्रसन्न होते हैं, तो वे अपने वंशज के जीवन में आर्थिक समृद्धि भी बढ़ाते हैं। पशु-धन के साथ-साथ अन्य सम्पदा भी आती है। व्यापार, कृषि, उद्योग - सब क्षेत्रों में सफलता मिलती है।
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के सामान्य फल में भी धन शामिल है। आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पितः। यानी श्राद्ध से तृप्त पितर वंशज को धन देते हैं। पशू वै इस सामान्य धन का एक विशेष रूप है।
पशु-धन का दार्शनिक संदेश भी विशेष है। यह दर्शाता है कि सनातन धर्म में लौकिक समृद्धि की भी एक मान्य भूमिका है। पितर अपने वंशजों को भौतिक समृद्धि भी देते हैं, ताकि वे जीवन को सुखमय जी सकें। यह पारलौकिक के साथ-साथ लौकिक का सन्तुलन है।
इस फल का व्यापक प्रभाव सम्पूर्ण परिवार पर पड़ता है। जब परिवार में पशु-धन या आर्थिक समृद्धि आती है, तो परिवार के सब सदस्य सुखी होते हैं। बच्चों की शिक्षा, माता-पिता की देखभाल, घर का निर्माण, और अन्य आवश्यकताएँ पूरी होती हैं।
इस फल के लिए श्राद्ध की निरंतरता भी आवश्यक है। यदि एक बार में पूर्ण फल नहीं मिले, तो प्रतिवर्ष द्वितीया पर श्राद्ध करना चाहिए। निरंतर श्रद्धा और भक्ति से पितर अवश्य प्रसन्न होते हैं, और पशु-धन का आशीर्वाद देते हैं।
स्कन्द पुराण का पारलौकिक फल भी विपुल सम्पदा है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार प्रसन्न होकर भगवान शिव श्राद्धकर्ता को इस लोक में भी विपुल सम्पदा यानी विपुलां सम्पदं प्रदान करते हैं। यह विपुल सम्पदा पशू वै के साथ मिलकर सम्पूर्ण समृद्धि देती है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264, याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 और स्कन्द पुराण नागर खण्ड इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन पितरों के आशीर्वाद से प्राप्त होता है। यह पशू वै यानी निश्चित रूप से उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति है। आधुनिक संदर्भ में यह सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि का प्रतीक है।
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