विस्तृत उत्तर
द्वितीया श्राद्ध से कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशू वै यानी प्रचुर पशु-धन की विशेष प्राप्ति होती है। शास्त्रीय आधार के अनुसार याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 में द्वितीया तिथि के श्राद्ध के फल का निरूपण करते हुए कहा गया है। श्लोक है कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून् वै सुसतानपि। द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफं चैकशफं तथा।
इस श्लोक का अर्थ नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः और अन्य टीकाओं के अनुसार स्पष्ट है। प्रतिपदि कन्यां यानी प्रतिपदा को श्राद्ध करने से उत्तम कन्याओं की प्राप्ति होती है। द्वितीयायां कन्यावेदिनश्च पशून् यानी द्वितीया तिथि को श्राद्ध करने से कन्यावेदिन और पशू वै की प्राप्ति होती है।
द्वितीया के दो विशेष काम्य फल हैं। पहला फल है कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद। जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे कन्यावेदिन यानी अपनी कन्याओं के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर यानी दामाद की प्राप्ति होती है। दूसरा फल है पशू वै यानी पशु-धन। द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को पशून् वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है।
कन्यावेदिन का विश्लेषण विशेष है। कन्या का अर्थ है पुत्री, और वेदिन का अर्थ है पाने वाला या प्राप्त करने वाला। कन्यावेदिन यानी कन्या को प्राप्त करने वाला, अर्थात् सुयोग्य दामाद। यह वह वर है जो कन्या के लिए श्रेष्ठ, धर्मनिष्ठ और सुयोग्य हो।
कन्यावेदिन की तीन विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता है अत्यंत सुयोग्य होना। यानी हर दृष्टि से उपयुक्त। दूसरी विशेषता है श्रेष्ठ होना। यानी श्रेष्ठ चरित्र, गुण और संस्कार वाला। तीसरी विशेषता है धर्मनिष्ठ होना। यानी धर्म के अनुसार आचरण करने वाला, धर्म-परायण।
यह फल अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज भी अधिकांश परिवारों में कन्या के विवाह को लेकर चिन्ता रहती है। योग्य वर मिलना कठिन हो जाता है। ऐसे में द्वितीया श्राद्ध एक शास्त्र-सम्मत उपाय है, जिससे कन्या के लिए श्रेष्ठ दामाद की प्राप्ति होती है। यह सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करता है।
पशू वै का विश्लेषण भी विशेष है। पशू का अर्थ है पशु, यानी जानवर। वै एक निश्चय वाचक शब्द है, जिसका अर्थ है निश्चित रूप से। पशू वै यानी निश्चित रूप से पशु-धन की प्राप्ति। ये पशु उत्तम कोटि के होते हैं, जैसे गौ यानी गाय, अश्व यानी घोड़ा, आदि।
वैदिक काल में पशु-धन का महत्व अत्यंत उच्च था। कृषि प्रधान और गौ-आधारित वैदिक समाज में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था। गाय दूध, घी, मूत्र, गोबर - सब देती थी, और यज्ञ-कर्म में भी उपयोगी थी। घोड़ा यातायात और युद्ध में काम आता था। इसलिए पशु-धन का होना समृद्धि का प्रतीक था।
वर्तमान संदर्भ में पशू वै का अर्थ है समृद्धि। आज पशु-धन की जगह वाहन, घर, सम्पत्ति आदि भौतिक समृद्धि ले लेते हैं। द्वितीया श्राद्ध से इन सब प्रकार की समृद्धि की प्राप्ति होती है।
इन दोनों फलों का सम्मिलित प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। याज्ञवल्क्य स्मृति का यह उद्घोष कि द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन और सुयोग्य दामाद की प्राप्ति होती है, इस तिथि के श्राद्ध को पारिवारिक सुख, सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने और आर्थिक समृद्धि के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना देता है।
इन फलों के साथ सामान्य फल भी मिलते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के अनुसार आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पितः। श्राद्ध से पूर्णतः तृप्त हुए पितर अपने वंशजों को दीर्घ आयु, उत्तम प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, समस्त सुख और यहाँ तक कि राज्य की भी प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं। द्वितीया श्राद्ध करने वाले साधक को ये सभी सामान्य फल तो प्राप्त होते ही हैं, साथ ही उसे द्वितीया का विशिष्ट काम्य फल भी स्वतः प्राप्त हो जाता है।
इसके अतिरिक्त स्कन्द पुराण का पारलौकिक फल भी मिलता है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो मनुष्य महालय की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के पश्चात् कैलास धाम को प्राप्त करता है, और इस लोक में भी विपुल सम्पदा प्राप्त करता है।
पद्म पुराण का यम-द्वितीया से सम्बन्ध भी विशेष है। पद्म पुराण के अनुसार द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। इस तिथि पर श्राद्ध करने से यमराज प्रसन्न होते हैं, और पितरों को यमदूतों की यातना नहीं सहनी पड़ती।
इस सम्पूर्ण फल का सर्वोच्च संदेश यह है कि द्वितीया श्राद्ध न केवल पितरों को तृप्ति देता है, बल्कि वंशज को भी अद्वितीय फल प्रदान करता है। कन्यावेदिन और पशु-धन के साथ-साथ कैलास प्राप्ति, विपुल सम्पदा, और सब सामान्य फल मिलते हैं। यह तिथि वंशज के लिए सर्वांगीण समृद्धि का स्रोत है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264, याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270, स्कन्द पुराण नागर खण्ड और पद्म पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया श्राद्ध से दो विशेष काम्य फल मिलते हैं। पहला फल है कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद की प्राप्ति। दूसरा फल है पशू वै यानी प्रचुर पशु-धन की प्राप्ति। इन दो विशेष फलों के साथ श्राद्ध के सब सामान्य फल भी मिलते हैं।
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