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श्राद्ध फल⏱ 5 मिनट पठन

प्रतिपदा से अष्टमी तक के तिथि-फल क्या हैं?

प्रतिपदा से अष्टमी तक की तिथियों पर श्राद्ध करने से अलग-अलग काम्य फल मिलते हैं।

संक्षिप्त उत्तर

याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार तिथि-वार काम्य फल हैं — प्रतिपदा को उत्तम कन्या, द्वितीया को सुयोग्य दामाद और पशु-धन, तृतीया को अश्व यानी वाहन, चतुर्थी को क्षुद्र पशु, पञ्चमी को उत्तम पुत्र, षष्ठी को द्यूत यानी क्रीड़ा में विजय, सप्तमी को कृषि में सफलता, और अष्टमी को वाणिज्य यानी व्यापार में लाभ।

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विस्तृत उत्तर

प्रतिपदा से अष्टमी तक की तिथियों पर श्राद्ध करने से अलग-अलग काम्य फल मिलते हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी याज्ञवल्क्य स्मृति के आचाराध्याय यानी श्राद्ध प्रकरण में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की तिथियों पर श्राद्ध करने से मिलने वाले विशिष्ट फलों यानी काम्य फलों का अत्यंत विशद और प्रमाणिक वर्णन किया है।

आठ प्रमुख तिथियों के काम्य फल इस प्रकार हैं। पहली तिथि प्रतिपदा का फल है उत्तम कन्या की प्राप्ति। जो व्यक्ति प्रतिपदा को काम्य भावना से श्राद्ध करता है, उसे उत्तम यानी श्रेष्ठ कन्या यानी पुत्री की प्राप्ति होती है।

दूसरी तिथि द्वितीया का फल है कन्या के लिए सुयोग्य वर यानी दामाद तथा प्रचुर पशु-धन की प्राप्ति। जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे कन्यावेदिन यानी अपनी कन्याओं के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर यानी दामाद की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त पशू वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन की प्राप्ति होती है।

तीसरी तिथि तृतीया का फल है अश्व यानी घोड़े आदि वाहनों की प्राप्ति। प्राचीन काल में अश्व सर्वश्रेष्ठ वाहन था, इसलिए तृतीया श्राद्ध से वाहन की कामना पूरी होती थी।

चौथी तिथि चतुर्थी का फल है क्षुद्र पशु यानी भेड़, बकरी आदि की प्राप्ति। ये छोटे पशु भी आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थे।

पाँचवीं तिथि पञ्चमी का फल है उत्तम पुत्रों की प्राप्ति। जो व्यक्ति पञ्चमी को श्राद्ध करता है, उसे श्रेष्ठ और आज्ञाकारी पुत्रों का आशीर्वाद मिलता है।

छठी तिथि षष्ठी का फल है द्यूत यानी क्रीड़ा या आमोद-प्रमोद में विजय। जो व्यक्ति षष्ठी को श्राद्ध करता है, उसे हर प्रकार की प्रतियोगिता और क्रीड़ा में विजय मिलती है।

सातवीं तिथि सप्तमी का फल है कृषि में अभूतपूर्व सफलता। जो व्यक्ति सप्तमी को श्राद्ध करता है, उसकी खेती-बाड़ी में असाधारण वृद्धि होती है।

आठवीं तिथि अष्टमी का फल है वाणिज्य यानी व्यापार में अत्यधिक लाभ। जो व्यक्ति अष्टमी को श्राद्ध करता है, उसके व्यापार में असाधारण उन्नति होती है।

इन आठों तिथियों के फलों का विश्लेषण करने से एक स्पष्ट चित्र बनता है। प्रतिपदा और द्वितीया परिवार के लिए हैं यानी कन्या और दामाद। तृतीया और चतुर्थी सम्पदा के लिए हैं यानी बड़े और छोटे पशु। पञ्चमी सन्तान के लिए है। षष्ठी आनन्द और विजय के लिए है। सप्तमी कृषि के लिए है। अष्टमी व्यापार के लिए है।

यह तिथि-वार विभाजन दर्शाता है कि सनातन धर्म ने जीवन के हर पहलू के लिए एक शास्त्रीय उपाय प्रदान किया है। परिवार, सम्पदा, सन्तान, आनन्द, कृषि, व्यापार - हर क्षेत्र के लिए एक विशेष तिथि निर्धारित है।

याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 का मूल श्लोक है कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून् वै सुसतानपि। द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफं चैकशफं तथा। श्लोक के अंत में द्विशफं चैकशफं भी है। द्विशफं का अर्थ है दो खुर वाला पशु यानी गाय, भैंस आदि। एकशफं का अर्थ है एक खुर वाला पशु यानी घोड़ा, गधा आदि। ये द्वितीया श्राद्ध के विशेष पशु-धन फल के अन्तर्गत आते हैं।

इन तिथि-वार फलों का व्यावहारिक उपयोग है। यदि किसी को कन्या के विवाह की चिन्ता है, तो द्वितीया पर श्राद्ध करे। यदि पुत्र की कामना है, तो पञ्चमी पर। यदि व्यापार में लाभ चाहिए, तो अष्टमी पर। यदि कृषि सफलता चाहिए, तो सप्तमी पर।

इन सामान्य काम्य फलों के साथ श्राद्ध के सामान्य फल भी मिलते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के अनुसार श्राद्ध से तृप्त पितर वंशज को आयु, सन्तान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य देते हैं। ये सामान्य फल हर तिथि पर मिलते हैं।

इन फलों की प्राप्ति की शर्त है काम्य भावना और पूर्ण विधि-विधान। यदि कर्ता काम्य भावना से और पूर्ण शास्त्र-सम्मत विधि से श्राद्ध करे, तो उस तिथि का विशेष फल अवश्य मिलता है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 और नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः प्रतिपदा से अष्टमी तक के तिथि-फल हैं - प्रतिपदा को उत्तम कन्या, द्वितीया को सुयोग्य दामाद और पशु-धन, तृतीया को अश्व, चतुर्थी को क्षुद्र पशु, पञ्चमी को उत्तम पुत्र, षष्ठी को द्यूत विजय, सप्तमी को कृषि सफलता, और अष्टमी को व्यापार लाभ।

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