विस्तृत उत्तर
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 में द्वितीया तिथि के श्राद्ध के विशेष काम्य फल का वर्णन है। शास्त्रीय आधार के अनुसार याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 में द्वितीया तिथि के श्राद्ध के फल का निरूपण करते हुए कहा गया है। श्लोक है कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून् वै सुसतानपि। द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफं चैकशफं तथा।
यह श्लोक प्रतिपदा से अष्टमी तक की तिथियों के क्रम से फल निर्दिष्ट करता है। नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः और अन्य टीकाओं के अनुसार इसका सटीक अन्वय और अर्थ इस प्रकार है। प्रतिपदि कन्यां यानी प्रतिपदा को श्राद्ध करने से उत्तम कन्याओं की प्राप्ति होती है। द्वितीयायां कन्यावेदिनश्च पशून् यानी जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे कन्यावेदिन यानी अपनी कन्याओं के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर यानी दामाद की प्राप्ति होती है।
श्लोक का प्रत्येक शब्द विशेष महत्व रखता है। पहला शब्द है कन्यां, जो प्रतिपदा का फल है यानी उत्तम कन्या। दूसरा शब्द है कन्यावेदिनश्च, जो द्वितीया का फल है यानी सुयोग्य दामाद। तीसरा शब्द है पशून् वै, जो भी द्वितीया का फल है यानी प्रचुर पशु-धन।
इसके बाद के शब्द अन्य तिथियों के फल हैं। सुसतानपि यानी सुपुत्र, जो पञ्चमी का फल है। द्यूतं यानी द्यूत में विजय, जो षष्ठी का फल है। कृषिं यानी कृषि में सफलता, जो सप्तमी का फल है। वाणिज्यं यानी व्यापार में लाभ, जो अष्टमी का फल है। द्विशफं चैकशफं यानी दो खुर और एक खुर वाले पशु, जो भी पशु-धन के अंतर्गत आते हैं।
इस श्लोक का सम्पूर्ण अर्थ देखें। प्रतिपदा से अष्टमी तक की तिथियों पर श्राद्ध करने से अलग-अलग काम्य फल मिलते हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी याज्ञवल्क्य स्मृति के आचाराध्याय यानी श्राद्ध प्रकरण में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की तिथियों पर श्राद्ध करने से मिलने वाले विशिष्ट फलों यानी काम्य फलों का अत्यंत विशद और प्रमाणिक वर्णन किया है।
द्वितीया का विशेष फल इस श्लोक में स्पष्ट है। द्वितीया से कन्यावेदिन और पशू वै दोनों मिलते हैं। यह दो विशेष काम्य फल हैं, जो अन्य किसी तिथि पर नहीं मिलते। इसलिए द्वितीया तिथि अत्यंत विशिष्ट है।
द्विशफं और एकशफं का अर्थ इस श्लोक का अंतिम भाग स्पष्ट करता है। द्विशफं का अर्थ है दो खुर वाला पशु यानी गाय, भैंस आदि। एकशफं का अर्थ है एक खुर वाला पशु यानी घोड़ा, गधा आदि। ये दोनों प्रकार के पशु-धन द्वितीया श्राद्ध से प्राप्त होते हैं।
वैदिक संदर्भ में पशु-धन का महत्व इस श्लोक से स्पष्ट है। कृषि प्रधान और गौ-आधारित वैदिक समाज में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था। इसीलिए द्वितीया श्राद्ध का फल पशू वै बताया गया है। यह उस समय की समाज-व्यवस्था के अनुसार सर्वोच्च समृद्धि का प्रतीक था।
याज्ञवल्क्य स्मृति का यह उद्घोष व्यापक है। याज्ञवल्क्य स्मृति का यह उद्घोष कि द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन और सुयोग्य दामाद की प्राप्ति होती है, इस तिथि के श्राद्ध को पारिवारिक सुख, सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने और आर्थिक समृद्धि के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना देता है।
इस श्लोक की सर्वोच्च व्याख्या नृसिंह प्रसाद ग्रन्थ में है। नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः यह एक विशिष्ट टीका-ग्रन्थ है, जो याज्ञवल्क्य स्मृति के श्राद्ध-सम्बन्धी श्लोकों की सटीक व्याख्या करता है। इस ग्रन्थ के अनुसार द्वितीया का सही अर्थ कन्यावेदिन और पशून् दोनों है।
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के साथ इसका सम्बन्ध भी विशेष है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 में श्राद्ध के सामान्य फल का उद्घोष है। आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पितः। यानी श्राद्ध से पूर्णतः तृप्त हुए पितर अपने वंशजों को दीर्घ आयु, उत्तम प्रजा यानी सन्तान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, समस्त सुख और यहाँ तक कि राज्य की भी प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं।
इन दो श्लोकों का सम्मिलित प्रभाव यह है कि श्राद्ध करने वाले को सामान्य फल और तिथि-विशिष्ट काम्य फल दोनों मिलते हैं। द्वितीया श्राद्ध करने वाले साधक को ये सभी सामान्य फल तो प्राप्त होते ही हैं, साथ ही उसे द्वितीया का विशिष्ट काम्य फल भी स्वतः प्राप्त हो जाता है।
इस श्लोक का व्यावहारिक संदेश यह है कि शास्त्रों ने हर तिथि का अपना फल निर्धारित किया है। यदि किसी विशेष कामना की पूर्ति चाहिए, तो उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए। द्वितीया विवाह सम्बन्धी और पशु-धन सम्बन्धी कामनाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
यह श्लोक पारिवारिक सुख की कामना वालों के लिए विशेष है। अतः स्पष्ट है कि जो गृहस्थ अपनी कन्या के विवाह को लेकर चिन्तित हैं अथवा पशु-धन यानी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भौतिक सम्पदा या वाहन की वृद्धि चाहते हैं, उनके लिए द्वितीया श्राद्ध का अनुष्ठान शास्त्रों में अमोघ उपाय बताया गया है। अमोघ का अर्थ है निश्चित रूप से सफल होने वाला।
इस श्लोक का धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह दर्शाता है कि सनातन धर्म के शास्त्र केवल आध्यात्मिक नहीं हैं, बल्कि लौकिक जीवन की समस्याओं के लिए भी समाधान देते हैं। कन्या का विवाह, पशु-धन की प्राप्ति - ये सब लौकिक समस्याएँ हैं, जिनका शास्त्रीय समाधान याज्ञवल्क्य स्मृति में है।
इस श्लोक के साथ अन्य तिथियों के फल भी जानने योग्य हैं। तृतीया से अश्व, चतुर्थी से क्षुद्र पशु, पञ्चमी से उत्तम पुत्र, षष्ठी से द्यूत में विजय, सप्तमी से कृषि सफलता, अष्टमी से व्यापार लाभ - ये सब प्रतिपदा से अष्टमी तक के काम्य फल हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 और नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 का श्लोक कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून् वै सुसतानपि। द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफं चैकशफं तथा। यह श्लोक प्रतिपदा से अष्टमी तक की तिथियों के क्रम से काम्य फल बताता है, और द्वितीया का विशेष फल कन्यावेदिन तथा पशू वै निर्दिष्ट करता है।
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