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भैया दूज पूजा विधि: यम द्वितीया बहन-भाई पूजन की शास्त्रसम्मत विधि
Puja Vidhi

भैया दूज पूजा विधि: यम द्वितीया बहन-भाई पूजन

📿 पौराणिक•24 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 27 मार्च 2026
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भैया दूज (यम द्वितीया) की शास्त्रसम्मत पूजा-विधि — बहन-भाई पूजन, तिलक विधान, यम देवता पूजन एवं भ्रातृ द्वितीया अनुष्ठान।

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यम द्वितीया (भैया दूज): बहन-भाई पूजन की शास्त्रसम्मत विधि एवं अनुष्ठानिक मीमांसा

सनातन धर्म की सुदीर्घ व्रत एवं पर्व परंपरा में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला 'यम द्वितीया' (लोकभाषा में 'भैया दूज', 'भ्रातृ द्वितीया' अथवा 'भाई फोंटा') पर्व अत्यंत विशिष्ट स्थान रखता है। यह पर्व मात्र एक सामाजिक अथवा पारिवारिक उत्सव नहीं है, अपितु यह जीवन, मृत्यु और मानवीय संबंधों के मध्य आध्यात्मिक संतुलन स्थापित करने वाला एक गहन तांत्रिक एवं पौराणिक अनुष्ठान है। इस अनुष्ठान का मूल उद्देश्य अपमृत्यु (अकाल मृत्यु) का निवारण, आयु की वृद्धि तथा यम (मृत्यु एवं न्याय के अधिष्ठाता) एवं यमुना (जीवनदायिनी जलशक्ति एवं भक्ति) के मध्य के दिव्य भ्रातृ-भगिनी संबंध का लौकिक स्तर पर आरोपण करना है ।

निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु, स्कंद पुराण, पद्म पुराण तथा भविष्य पुराण जैसे प्रामाणिक एवं आधिकारिक ग्रंथों में इस दिन बहन द्वारा भाई के पूजन, यमराज एवं चित्रगुप्त के तर्पण, तथा विशेष भोजन विधान का अत्यंत सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है । प्रस्तुत शोध-प्रबंध यम द्वितीया के अवसर पर बहन-भाई पूजन की पूर्णतः शास्त्रसम्मत, तार्किक एवं प्रामाणिक अनुष्ठानिक प्रक्रिया की विस्तृत मीमांसा प्रस्तुत करता है, जिसमें व्रत-पूर्व तैयारी से लेकर फल-श्रुति तक के प्रत्येक चरण का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया गया है。

1. पर्व की शास्त्रीय पृष्ठभूमि एवं काल निर्णय

हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास का विशेष आध्यात्मिक महत्त्व है। इस मास में सत्वगुण की प्रधानता होती है। दीपावली के पंच-दिवसीय पर्व शृंखला का यह अंतिम दिन होता है। यम द्वितीया का अनुष्ठान मुख्य रूप से 'अपराह्न व्यापिनी' (दोपहर के बाद की) द्वितीया तिथि में किया जाना शास्त्रसम्मत माना गया है । धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु के अनुसार, यमराज का पूजन और भाई का तिलक अपराह्न काल में ही सर्वाधिक फलदायी होता है, क्योंकि यम और पितरों से संबंधित कार्य सामान्यतः सूर्य के पश्चिम की ओर ढलने के समय (अपराह्न) अधिक प्रभावशाली होते हैं ।

इस दिन सूर्यपुत्र यमराज अपनी बहन यमुना के आमंत्रण पर उनके घर गए थे। यमुना ने उनका सत्कार किया और उन्हें उत्तम भोजन कराया। इसी प्रसन्नता में यमराज ने वरदान दिया कि जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर उसके हाथों से बना भोजन ग्रहण करेगा और तिलक लगवाएगा, उसे यम का भय (अकाल मृत्यु) नहीं सताएगा तथा उसे नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलेगी ।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, इस दिन यमराज (जो तमोगुण और संहार के प्रतीक हैं) का स्वरूप अत्यंत सौम्य और शांत हो जाता है। उनमें संहारक ऊर्जा के स्थान पर तारक (रक्षक) और पोषी ऊर्जा जाग्रत होती है। बहन और भाई का यह सात्विक मिलन भूलोक में सत्वगुण की वृद्धि करता है, जिससे नकारात्मक शक्तियों का शमन होता है ।

2. व्रत-पूर्व तैयारी एवं स्नान-विधान

यम द्वितीया का अनुष्ठान शारीरिक एवं मानसिक शुद्धि के बिना अपूर्ण माना गया है। शास्त्रों में इस दिन प्रातःकाल के स्नान का विशेष महत्त्व बताया गया है, विशेषकर यमुना नदी में स्नान को साक्षात मोक्षदायक और यम-पाश से मुक्त करने वाला माना गया है ।

स्कंद पुराण के कार्तिक माहात्म्य के अनुसार स्नान के चार प्रकार बतलाए गए हैं: वायव्य (गोधूलि स्नान), वारुण (समुद्र/नदी/जल स्नान), ब्राह्म (वेदमंत्रों द्वारा), तथा दिव्य (वर्षा/सूर्य किरणों द्वारा)। इन सबमें यम द्वितीया के दिन 'वारुण स्नान' सर्वश्रेष्ठ माना गया है ।

यदि यमुना नदी में प्रत्यक्ष स्नान संभव न हो, तो घर पर ही शुद्ध जल में गंगाजल अथवा अन्य तीर्थों का जल मिलाकर, वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के साथ समस्त पवित्र नदियों का मानसिक आवाहन करना चाहिए। इससे साधारण जल भी तीर्थ के समान फलदायी हो जाता है。

स्नान आवाहन मन्त्र एवं तार्किक प्रयोग:

"ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥"

"ॐ अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुकान्ते वसुन्धरे। मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्॥"

मन्त्रार्थ: हे गंगे, यमुने, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदे, सिन्धु और कावेरी! आप सभी मेरे इस स्नान के जल में पधारें। हे पृथ्वी माता, जो अश्वों, रथों और भगवान विष्णु के चरणों से आक्रान्त (पवित्र) हैं, मेरे द्वारा किये गए समस्त पापों और दुष्कर्मों का हरण करें。

स्नान के पश्चात् स्वच्छ एवं नवीन (अथवा धुले हुए शुद्ध) वस्त्र धारण करने चाहिए। इस दिन श्वेत अथवा हल्के पीले वस्त्रों को धारण करना सात्विकता का प्रतीक माना गया है, क्योंकि ये रंग आध्यात्मिक ऊर्जा को ग्रहण करने में अत्यंत सहायक होते हैं ।

3. अनुष्ठान का प्राण: विस्तृत संकल्प-विधि

सनातन धर्म की कर्मकांडीय एवं तांत्रिक परंपरा में 'संकल्प' के बिना किया गया कोई भी व्रत, दान, तप या पूजन निष्फल माना जाता है। संकल्प का अर्थ है—दिक् (दिशा), काल (समय), और प्रयोजन (उद्देश्य) को साक्षी मानकर ईश्वरीय सत्ता के समक्ष अपनी स्पष्ट कामना प्रस्तुत करना। जब तक कर्ता अपने मन, बुद्धि और चेतना को एक बिंदु पर केंद्रित कर संकल्प नहीं लेता, तब तक ब्रह्मांडीय ऊर्जा उस विशिष्ट कार्य के लिए संरेखित नहीं होती ।

बहन को अपने भाई की दीर्घायु, ऐश्वर्य वृद्धि और यम-दोष निवारण के लिए हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, कुमकुम और द्रव्य (सिक्का) लेकर निम्नलिखित शास्त्रोक्त विस्तृत संकल्प करना चाहिए:

विस्तृत संस्कृत संकल्प मन्त्र:

"ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे दण्डकारण्य देशे गोदावर्या दक्षिणे तीरे शालिवाहन शके बौद्धावतारे... (पंचांग अनुसार अपने स्थान का नाम लें)... अमुक संवत्सरे (संवत्सर का नाम)... अमुक मासे (कार्तिक मासे)... शुक्ल पक्षे... द्वितीया तिथौ... अमुक वासरे... अमुक नक्षत्रे... अमुक योगे... अमुक करणे... अमुक राशि स्थिते श्री चन्द्रे... अमुक राशि स्थिते श्री सूर्ये... अमुक गोत्रोत्पन्नोऽहं (अपना नाम लें) मम भ्रातुः (भाई का नाम लें) श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं, अपमृत्यु-दोष-निवारणार्थं, दीर्घायु-आरोग्य-ऐश्वर्य-अभिवृद्धयर्थं, सर्व-अरिष्ट-निवारण-पूर्वक-सकल-मनोरथ-सिद्धयर्थं, यम-यमुना-चित्रगुप्त प्रसन्नता सिद्धयर्थं भ्रातृ-पूजनं, यम-तर्पणं च अहं करिष्ये।"

संकल्प का यह विस्तृत स्वरूप ब्रह्मांडीय कालचक्र (ब्रह्मा के दिन, कल्प, मन्वन्तर, युग) से लेकर व्यक्तिगत समय (संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि) तक को आबद्ध करता है。

भावार्थ एवं मीमांसा: मैं (अमुक गोत्र और नाम वाली बहन), आज कार्तिक शुक्ल द्वितीया के शुभ दिन, उपर्युक्त ग्रह-नक्षत्रों की साक्षी में, अपने भाई (भाई का नाम) की अकाल मृत्यु के दोषों के निवारण, उसकी लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, आध्यात्मिक एवं भौतिक ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए, तथा समस्त विघ्नों के नाश एवं यमराज, यमुना जी और चित्रगुप्त भगवान को प्रसन्न करने के लिए यह भाई-पूजन और यम तर्पण का संकल्प लेती हूँ。

मन्त्रोच्चारण के पश्चात् संकल्प के जल को भगवान श्री गणेश, इष्टदेव अथवा सूर्यदेव के समक्ष भूमि पर या ताम्रपात्र में छोड़ देना चाहिए। यह जल-विसर्जन इस बात का प्रतीक है कि संकल्प अब ब्रह्मांड को सौंप दिया गया है ।

4. प्रथम चरण: सूक्ष्म शक्तियों का आवाहन (यम, यमुना एवं चित्रगुप्त पूजन)

भाई के प्रत्यक्ष भौतिक पूजन से पूर्व, सूक्ष्म जगत की उन शक्तियों का आवाहन और पूजन करना अनिवार्य है जो आयु, मृत्यु और कर्मों का नियंत्रण करती हैं अर्थात् यमराज, यमुना और कर्मों के लेखाकार भगवान चित्रगुप्त। बिना इनके पूजन के भाई का रक्षा-कवच सिद्ध नहीं होता ।

4.1 यमराज आवाहन एवं अर्घ्य विधान

घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) अथवा निर्धारित पूजन कक्ष में एक काठ की चौकी (पीठ) पर श्वेत या पीला वस्त्र बिछाकर यमराज एवं यमुना का मानसिक अथवा प्रतिमा/चित्र रूप में आवाहन करें। वहां एक कलश स्थापित करें और अष्टदल कमल (चावल या हल्दी से) बनाकर उस पर देवताओं की प्रतिष्ठा करें ।

यमराज को मृत्यु का देवता होने के कारण लोकमानस में सामान्यतः भय की दृष्टि से देखा जाता है, परंतु इस दिन वे 'धर्मराज' (न्याय के देवता) के रूप में पूजे जाते हैं। उन्हें तांबे के पात्र अथवा शंख से अर्घ्य (जल, पुष्प, रोली, अक्षत युक्त) प्रदान किया जाता है । यह अर्घ्य समर्पण उनकी संहारक ऊर्जा को शांत कर रक्षक ऊर्जा को जाग्रत करता है。

यमराज अर्घ्य मन्त्र (निर्णयसिंधु एवं धर्मसिंधु के प्रमाणानुसार):

"एह्येहि मार्तण्डज पाशहस्त यमान्तकालोकधरामरेश। भ्रातृद्वितीयाकृतदेवपूजां गृहाण चार्घ्यं भगवन्नमस्ते॥"

मन्त्र का शास्त्रीय अर्थ: हे सूर्यपुत्र (मार्तण्डज)! हे हाथ में पाश धारण करने वाले! हे यम, हे अंतक, हे लोकों को धारण करने वाले अमरेश! भ्रातृ द्वितीया के इस पावन अवसर पर मेरे द्वारा की गई यह देवपूजा और इस अर्घ्य को आप ग्रहण करें। हे भगवन्, आपको मेरा बारंबार नमस्कार है。

यमराज स्तुति मन्त्र:

"धर्मराज नमस्तुभ्यं नमस्ते यमुनाग्रज। पाहि मां किंकरैः सार्धं सूर्यपुत्र नमोऽस्तु ते॥"

इस स्तुति में यमराज को 'यमुनाग्रज' (यमुना के बड़े भाई) कहकर संबोधित किया गया है, जो उनकी क्रूरता को उनके भ्रातृ-प्रेम से प्रतिस्थापित कर देता है。

4.2 भगवान चित्रगुप्त एवं लेखनी-दवात (कलम-दवात) पूजन

यम द्वितीया के दिन यमराज के प्रधान सचिव और ब्रह्मांड के समस्त जीवों के कर्मों के अधिष्ठाता भगवान चित्रगुप्त की विशेष पूजा का विधान है। कायस्थ समाज एवं व्यापारी वर्ग के लिए यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसे नववर्ष की शुरुआत और बहीखातों के पूजन का दिन भी माना जाता है । चित्रगुप्त भगवान को ज्ञान, विद्या, और लेखनी का देवता माना जाता है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, वे ब्रह्मा जी की काया (शरीर) से उत्पन्न हुए थे, इसीलिए उनके वंशज 'कायस्थ' कहलाए । उनकी दो पत्नियाँ—इरावती (शोभावती) और सुदक्षिणा (नंदिनी) थीं, जिनसे १२ पुत्रों की उत्पत्ति हुई, जो विभिन्न कायस्थ कुलों के मूल पुरुष बने ।

पूजन प्रक्रिया: चौकी पर चित्रगुप्त भगवान की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष एक नई कलम (पेन), दवात (स्याही), और नया बहीखाता (अथवा कोरा पृष्ठ) रखें। हल्दी, चंदन, रोली, अक्षत, पुष्प और मिष्ठान्न (विशेषकर खीर) से उनका षोडशोपचार पूजन करें। यह मान्यता है कि इस दिन जो कलम भगवान चित्रगुप्त को अर्पित की जाती है, वह वर्ष भर बुद्धि, विद्या और व्यवसाय में उन्नति का संचार करती है ।

चित्रगुप्त प्रार्थना एवं लेखनी मन्त्र:

"मसिभाजनसंयुक्तं ध्यायेत्तं च महाबलम्। लेखिनीपट्टिकाहस्तं चित्रगुप्तं नमाम्यहम्॥"

"ॐ नमो विचित्राय धर्मलेखकाय यमवाहिकाधिकारिणे म्लव्यूं जन्मसम्पत्प्रलयं कथय कथय स्वाहा।"

अर्थ: जो स्याही के पात्र (मसिभाजन) से युक्त हैं, जो महाबलशाली हैं, जिनके हाथों में लेखनी (कलम) और पट्टिका (कागज/बहीखाता) सुशोभित है, ऐसे भगवान चित्रगुप्त को मैं नमस्कार करता/करती हूँ। हे विचित्र धर्मलेखक, जन्म और प्रलय का लेखा-जोखा रखने वाले देव, आपको आहुति समर्पित है。

पूजन के उपरांत हल्दी से रंगे एक सादे पृष्ठ पर उसी नई कलम से "ॐ श्री गणेशाय नमः" तथा "ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः" ११ बार लिखना अत्यंत शुभ माना गया है, जो वाणी और विद्या की शुद्धि करता है ।

4.3 यमुना प्रार्थना मन्त्र

यमराज और चित्रगुप्त के पश्चात यमुना माता की स्तुति की जाती है, जो वात्सल्य और विशुद्ध प्रेम की प्रतीक हैं।

"यमस्वसर्नमस्तेऽस्तु यमुने लोकपूजिते। वरदा भव मे नित्यं सूर्यपुत्रि नमोऽस्तु ते॥"

अर्थ: हे यम की बहन, हे तीनों लोकों में पूजित यमुने! आपको नमस्कार है। हे सूर्यपुत्री, आप मेरे लिए नित्य वरदायिनी बनें。

देव/शक्ति पूजन का उद्देश्य प्रयुक्त मन्त्र/स्तुति प्रमुख पूजन सामग्री
यमराज (धर्मराज) अपमृत्यु से रक्षा, आयु वृद्धि, नरक भय से मुक्ति। "एह्येहि मार्तण्डज पाशहस्त..." जल, अक्षत, रोली युक्त शंख/ताम्र अर्घ्य।
भगवान चित्रगुप्त विद्या, बुद्धि, लेखनी की शक्ति, व्यापार में उन्नति। "मसिभाजनसंयुक्तं ध्यायेत्तं..." नई कलम, दवात, कोरा पृष्ठ, बहीखाता, खीर।
माता यमुना भ्रातृ-प्रेम में वृद्धि, पापनाश, वात्सल्य प्राप्ति। "यमस्वसर्नमस्तेऽस्तु यमुने..." पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य।

5. द्वितीय चरण: बहन द्वारा भाई का चरणबद्ध पूजन-विधि (भ्रातृ-पूजन)

सूक्ष्म शक्तियों के आवाहन और तर्पण के पश्चात् मुख्य लौकिक अनुष्ठान अर्थात् भ्रातृ-पूजन का आरंभ होता है। यह एक अत्यंत भावपूर्ण मनोवैज्ञानिक और तांत्रिक प्रक्रिया है, जिसमें बहन अपने भीतर 'यमुना' के विशुद्ध भाव का और भाई के भीतर 'यम' (धर्मराज) के धर्मनिष्ठ भाव का दर्शन करती है。

5.1 आसन एवं दिशा विधान (दिक्-निर्णय)

शास्त्रों में दिशाओं का विशिष्ट ऊर्जा प्रवाह माना गया है। भाई को घर के आंगन अथवा पूजन कक्ष में पूर्व से शुद्ध किए गए स्थान पर बैठाना चाहिए। पिसे हुए चावल (ऐपन) या हल्दी से बनाए गए अष्टदल कमल या चौक (मण्डल) के ऊपर एक शुद्ध काठ के पाटे (पीढ़े) या ऊनी आसन पर भाई को विराजमान करें ।

  • भाई का मुख पूर्व (प्राची) अथवा उत्तर (उदीची) दिशा की ओर होना चाहिए, क्योंकि ये दिशाएं क्रमशः सूर्य (प्राण ऊर्जा) और कुबेर/ईशान (समृद्धि एवं ज्ञान) की दिशाएं हैं ।
  • तिलक करते समय बहन का मुख तदनुसार पश्चिम अथवा दक्षिण दिशा की ओर होता है।

5.2 तिलक-विधान एवं शास्त्रोक्त मन्त्र

बहन कुमकुम, रोली, अक्षत, हल्दी, केसर और चंदन के मिश्रित लेप से भाई के भाल (मस्तक) पर तिलक करती है। योगशास्त्र और तंत्रशास्त्र के अनुसार, मस्तक के मध्य में 'आज्ञा चक्र' (थर्ड आई) स्थित होता है। केसर और चंदन का तिलक इस चक्र को शीतलता प्रदान करता है तथा एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा को जाग्रत करता है ।

तिलक करते समय बहन को अत्यंत भावपूर्ण होकर निम्नलिखित शास्त्रोक्त मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए, जो इस संपूर्ण पर्व का हृदय (प्राणतत्व) है:

भ्रातृ-तिलक मन्त्र (स्कंद पुराण एवं पारंपरिक संदर्भ):

"भ्रातस्तवानुजाताहं भुंक्ष्व भक्तमिमं शुभम्। प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः॥"

मन्त्रार्थ एवं गहन मीमांसा: "हे भ्राता! मैं तुम्हारी अनुजा (छोटी बहन / अथवा आत्मिक बहन) हूँ। तुम मेरे द्वारा श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत इस शुभ अन्न (भोजन) और सत्कार को ग्रहण करो। मेरा यह कृत्य विशेष रूप से यमराज और यमुना जी की प्रसन्नता के लिए है।"

विश्लेषण: इस मन्त्र में अत्यंत गूढ़ दर्शन छिपा है। यह मन्त्र रक्त-संबंधों की सीमाओं को पार कर जाता है। 'अनुजाताहं' कहकर बहन अपना पूर्ण समर्पण व्यक्त करती है। इसमें सगी, चचेरी, ममेरी, या धर्म-बहन सभी समाहित हैं। यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि यह केवल दो मनुष्यों का मिलन नहीं है, बल्कि यम और यमुना की प्रसन्नता के लिए किया गया एक दिव्य यज्ञ है ।

तिलक के उपरांत भाई के मस्तक पर अक्षत (चावल, जो खंडित न हों) लगाए जाते हैं और उसके सिर पर पुष्पों की वर्षा करते हुए यह वैदिक/पौराणिक मन्त्र पढ़ा जा सकता है:

"ब्रह्मा विष्णु रुद्र लोकपाल रक्षन्तु सर्व गात्राला तिलकी कृते।"

(अर्थ: ब्रह्मा, विष्णु, शिव और दसों दिशाओं के लोकपाल तिलक धारण किए हुए इस भाई के समस्त अंगों की हर प्रकार के बाह्य एवं आंतरिक संकटों से रक्षा करें।)

यदि कोई बहन इस लंबे संस्कृत मन्त्र का उच्चारण करने में असमर्थ हो, तो वह पंचाक्षरी मन्त्र "ॐ नमः शिवाय" अथवा सामान्य कल्याण मन्त्र का स्मरण करते हुए भी तिलक कर सकती है ।

5.3 आरती एवं रक्षा सूत्र (कलावा)

तिलक के पश्चात् बहन घी अथवा कर्पूर का दीपक जलाकर भाई की विधिपूर्वक आरती उतारती है । अग्नि को सनातन धर्म में सर्वाधिक पवित्र और शुद्धिकर्ता माना गया है। आरती उतारने की क्रिया (घड़ी की सुई की दिशा में) भाई के आभामंडल (Aura) से अंधकार, तामसिक शक्तियों और बुरी दृष्टि को दूर करने का एक तांत्रिक विधान है。

तदुपरांत दाहिने हाथ की कलाई पर रक्षा सूत्र (कलावा/मौली) बांधा जाता है। यह त्रि-रंगी या पंच-रंगी धागा बहन के प्रेम और संकल्प का भौतिक स्वरूप है, जो त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की शक्तियों को आकृष्ट कर एक सुरक्षा कवच (Protection circle) के रूप में कार्य करता है ।

कई विशिष्ट क्षेत्रीय परंपराओं (जैसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा, और राजस्थान) में एक विशेष प्रथा है जहाँ एक सूखा नारियल (जिसे 'गोला' कहा जाता है), जिस पर रक्षा सूत्र लपेटा होता है, भाई को भेंट किया जाता है या आरती के समय प्रयुक्त होता है । इस गोले को यमराज का प्रतीक माना जाता है। अनुष्ठान के पश्चात इस गोले को घर में खाया या रखा नहीं जाता, अपितु किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान कर दिया जाता है अथवा बहते जल में विसर्जित कर दिया जाता है । यह इस बात का प्रतीक है कि मृत्यु के देवता (प्रतीकात्मक रूप से) अपना आशीर्वाद देकर विदा हो गए हैं。

6. तृतीय चरण: मिष्ठान्न, अन्न अर्पण एवं भोजन-विधान

आरती के पश्चात् बहन भाई को अपने हाथों से मिष्ठान्न (मिठाई, बताशे, पान, सुपारी, काले चने) खिलाती है । यम द्वितीया के दिन भाई को अपनी बहन के घर ही पूर्ण सात्विक भोजन करना चाहिए। भोजन में चावल (अन्न) का होना अत्यंत आवश्यक माना गया है, क्योंकि चावल को 'अक्षत' (पूर्णता का प्रतीक) और चंद्रमा (मन का कारक) से संबंधित माना जाता है ।

भोजन ग्रहण करने का मन्त्र:

अन्न को उपनिषदों में 'ब्रह्म' (अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्) कहा गया है। भाई को भोजन ग्रहण करने से पूर्व अन्न देवता का स्मरण कर कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए:

"ॐ अन्नपते अन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः। प्र प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥"

अर्थ: हे अन्न के स्वामी परमात्मा! हमें रोगरहित, दोषरहित और पुष्टिकारक अन्न प्रदान करें। अन्न का दान करने वाले (यहाँ बहन) की आयु और कल्याण में निरंतर वृद्धि करें। हमारे सभी द्विपद (मनुष्य) और चतुष्पद (पशु) प्राणियों को शक्ति और ऊर्जा प्रदान करें。

भोजन करते समय वैदिक शांति पाठ का मानसिक या वाचिक उच्चारण भाई-बहन के मध्य आध्यात्मिक ऊर्जा और ओज को बढ़ाता है तथा किसी भी प्रकार के प्रारब्धगत द्वेष का शमन करता है:

"ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥"

(हम दोनों की साथ-साथ रक्षा हो, हम साथ-साथ अन्न का उपभोग करें, हम साथ-साथ पराक्रम करें, हमारी विद्या/बुद्धि तेजस्विनी हो, और हम कभी परस्पर द्वेष न करें।)

7. दक्षिणा, उपहार अर्पण एवं विशिष्ट दान-विधान

भोजन और सत्कार ग्रहण करने के पश्चात्, यह भाई का परम धर्म है कि वह अपनी बहन को वस्त्र, आभूषण, द्रव्य (धन), या अन्य उपयोगी सामग्री उपहार स्वरूप भेंट करे । यह उपहार मात्र एक भौतिक लेन-देन नहीं है, अपितु यह भाई द्वारा बहन की सुरक्षा, सम्मान और उसके अखंड सौभाग्य की वृद्धि का संकल्प है। भाई को बहन के चरण स्पर्श कर उसका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए (चाहे बहन आयु में छोटी ही क्यों न हो, क्योंकि इस दिन वह साक्षात यमुना का स्वरूप होती है) ।

7.1 विशिष्ट ज्योतिषीय एवं तांत्रिक दान (वार के अनुसार)

यद्यपि मूल शास्त्रों में इसका सीधा उल्लेख नहीं मिलता, परंतु पारंपरिक ज्योतिषीय आचार्यों और लोक-परंपराओं के अनुसार यम द्वितीया जिस वार (दिन) को पड़ती है, उसके अनुसार भोजन और उपहार के विधान से विशिष्ट ग्रहों की शांति होती है :

वार (दिन) ग्रह बहन द्वारा निर्मित विशिष्ट भोजन भाई द्वारा बहन को देय उपहार फल-श्रुति
रविवार सूर्य गुड़ की खीर लाल चुनरी / ताम्र वस्तु भाई-बहन दोनों की दीर्घायु और तेज वृद्धि।
सोमवार चंद्र दलिया की खीर / चावल चाँदी की वस्तु / आभूषण यश वृद्धि एवं मानसिक शांति।
मंगलवार मंगल आटे का हलवा तांबे का पात्र / लाल वस्त्र संकटों का निवारण एवं रक्त-दोष शांति।
बुधवार बुध पिस्ता युक्त मूंग का हलवा हरे रंग का वस्त्र / कच्चा नारियल सौभाग्य के द्वार खुलना एवं बुद्धि वृद्धि।
गुरुवार गुरु चने की दाल का हलवा पीले फल / पीत वस्त्र / स्वर्ण धर्म एवं ऐश्वर्य में वृद्धि।
शुक्रवार शुक्र दही वड़ा / रायता श्वेत वस्त्र / डायमंड / स्फटिक ऐश्वर्य एवं भौतिक सुखों की प्राप्ति।
शनिवार शनि खिचड़ी / दही वड़ा नीले रंग की वस्तु / कांच का पात्र समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति एवं अकाल मृत्यु से रक्षा।

7.2 यम दीपदान एवं विसर्जन विधान

यम द्वितीया का समापन सायंकाल (प्रदोष काल) के 'यम दीपदान' के साथ होता है। सूर्यास्त के पश्चात् घर की देहली (Threshold) पर या घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर मुख करके यमराज के निमित्त एक चौमुखी (चार बत्तियों वाला) दीपक प्रज्वलित करना चाहिए ।

इस दीपक में तिल के तेल का प्रयोग सर्वाधिक प्रशस्त माना गया है, क्योंकि तिल और तिल का तेल पितरों एवं यमराज को अत्यंत प्रिय है । यह दीपदान यमराज को सम्मानपूर्वक विदा करने और घर से नकारात्मक शक्तियों (अपमृत्यु, दरिद्रता, रोग) को दूर रखने का तांत्रिक कार्य करता है ।

पूजन में प्रयुक्त गोला (नारियल), चावल, और वस्त्र पर दक्षिणा रखकर अगले दिन किसी सुपात्र ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान कर देना चाहिए, अथवा शुद्ध जल/भूमि में विसर्जित कर देना चाहिए। इसे स्वयं के उपयोग में लेना शास्त्रों में निषिद्ध है ।

8. व्रत के नियम, निषेध एवं पात्रता (अभाव विधि)

यम द्वितीया के अनुष्ठान के अत्यंत सूक्ष्म नियम हैं, जिनका उल्लंघन करने पर यम-दोष की पूर्णतः निवृत्ति नहीं होती。

8.1 व्रत के नियम एवं कर्तव्य

  • उपवास विधान: बहन को भाई के घर आने और उसे विधिवत तिलक एवं भोजन कराने तक निराहार (अथवा स्वास्थ्य अनुसार जलाहार/फलाहार पर) रहना चाहिए ।
  • भोजन का स्थान: भाई को इस दिन अपने घर (स्वगृह) या पत्नी के हाथ का बना भोजन सर्वथा त्याग देना चाहिए। उसे बहन के घर जाकर ही भोजन करना चाहिए ।
  • स्वर्ण-रजत-वस्त्र का आदान-प्रदान: सधवा बहन को उत्तम सौभाग्य सामग्री (वस्त्र, आभूषण) प्रदान करने से भाई के जीवन में दरिद्रता का नाश होता है और पितृ प्रसन्न होते हैं ।

8.2 निषेध (क्या न करें)

  • दोपहर (अपराह्न) से पूर्व भ्रातृ-पूजन सामान्यतः वर्जित माना गया है, क्योंकि यम-पूजन और पितृ-कर्म का शास्त्रोक्त काल दोपहर के पश्चात का ही है ।
  • भाई को बहन के घर कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए और बहन द्वारा दिए गए सत्कार का (चाहे वह कितना ही अल्प क्यों न हो) किसी भी परिस्थिति में अनादर नहीं करना चाहिए।
  • इस पावन दिन कलह, द्वेष, असत्य भाषण, और तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, उड़द की दाल) का सर्वथा निषेध है ।

8.3 पात्रता एवं विकल्पों का शास्त्रीय विधान (अभाव विधि)

अक्सर समाज में यह प्रश्न उठता है कि यदि किसी की अपनी सगी (सहोदरा) बहन न हो, तो वह इस पर्व का पालन कैसे करे? स्कंद पुराण, भविष्य पुराण और धर्मशास्त्रों में इसका अत्यंत सुंदर और तार्किक समाधान दिया गया है:

  • यदि सगी बहन न हो, तो चचेरी (चाचा की पुत्री), ममेरी (मामा की पुत्री), फुफेरी (बुआ की पुत्री), मौसेरी, अथवा रक्षाबंधन द्वारा बनाई गई धर्म-बहन के घर जाकर भोजन करना चाहिए ।
  • यदि किसी कुटुंब में कोई भी बहन उपलब्ध न हो, तो किसी भी समान वर्ण की स्त्री को बहन मानकर उसका सत्कार किया जा सकता है ।
  • गूलर वृक्ष, गौ-माता एवं नदी पूजन (अंतिम विकल्प): सबसे विशिष्ट शास्त्रीय विधान यह है कि यदि कोई भी स्त्री विकल्प के रूप में न हो, तो गूलर के वृक्ष (औदुंबर) अथवा किसी पवित्र नदी (जैसे यमुना या गंगा) या गौ-माता को ही बहन मानकर उनके समीप बैठकर भोजन करना चाहिए। इसके पश्चात वृक्ष या गौ माता की परिक्रमा एवं उनका विधिवत पूजन करना चाहिए । स्कंद पुराण के अनुसार, गूलर के वृक्ष (जिसमें शुक्र और दत्तात्रेय का वास माना जाता है) की पूजा साक्षात अपमृत्यु का निवारण करने वाली और आयुवर्धक बताई गई है ।

9. कथा-संदर्भ (पौराणिक आधार)

किसी भी अनुष्ठान की पूर्णता के लिए उससे जुड़ी पौराणिक कथा का श्रवण करना अनिवार्य है। बहन-भाई को पूजन के उपरांत साथ बैठकर यम-यमुना की कथा श्रवण करनी चाहिए ।

स्कंद पुराण, पद्म पुराण और भविष्य पुराण के संदर्भों के अनुसार, भगवान सूर्य देव और उनकी पत्नी संज्ञा (सरण्यू) की दो जुड़वां संतानें थीं—यमराज और यमुना । यमुना अपने भाई यमराज से अत्यंत स्नेह करती थीं और उनसे निरंतर निवेदन करती थीं कि वे उनके घर आकर भोजन करें। यमराज चूँकि कर्मों के दंडाधिकारी और 'मृत्यु के देवता' थे, अतः लोग उनसे भयभीत रहते थे और कोई उन्हें अपने घर आमंत्रित नहीं करना चाहता था। यमराज भी अपने इस निष्ठुर कार्य के कारण संकोचवश बहन के घर जाने से बचते थे ।

अंततः कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमराज ने अपने कर्तव्यों से विश्राम लिया, नरक के जीवों को कुछ समय के लिए यातनाओं से मुक्त कर दिया और अपनी बहन के घर पहुँचे। यमुना ने अपार हर्षोल्लास के साथ उनका स्वागत किया, भाल पर तिलक लगाया और विविध प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन परोसे। बहन के इस निश्छल सत्कार से भावविभोर होकर यमराज ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा。

तब यमुना ने कहा— "हे भ्राता! आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे घर आएं, और जो भी बहन इस दिन मेरी ही भांति अपने भाई का सत्कार कर उसे अपने हाथों से भोजन कराएगी, और जो भाई बहन के घर जाकर यह सत्कार स्वीकार करेगा, उसे कभी आपका (अकाल मृत्यु का) भय न रहे, और उसे यमलोक की यातनाएं न झेलनी पड़ें।" यमराज ने 'तथास्तु' कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण दिए। तभी से इस कल्याणकारी पर्व की शाश्वत परंपरा आरंभ हुई ।

10. फल-श्रुति (अनुष्ठान का आध्यात्मिक एवं लौकिक परिणाम)

शास्त्रीय ग्रंथों, विशेषकर स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में यम द्वितीया के व्रत और पूजन की अत्यंत दुर्लभ फल-श्रुति (परिणाम) बताई गई है, जो इसके महत्त्व को द्विगुणित कर देती है:

  • अपमृत्यु एवं नरक से पूर्ण रक्षा: जो भाई इस दिन पूर्ण श्रद्धा के साथ अपनी बहन के हाथ का भोजन करता है और तिलक लगवाता है, उसके अकाल मृत्यु (Untimely death) के समस्त योग कट जाते हैं। उसे यमपाश तथा नरक की भयानक यातनाओं से सदा के लिए मुक्ति मिलती है ।
  • आयु, आरोग्य एवं ऐश्वर्य की असाधारण प्राप्ति: बहन द्वारा भाई के भाल पर किया गया तिलक और खिलाया गया अन्न भाई के शरीर और सूक्ष्म कोषों में सात्विक ऊर्जा का महा-संचार करता है, जिससे उसकी आयु बढ़ती है, जीवन के भयंकर कष्ट दूर होते हैं, और वह आरोग्य प्राप्त करता है ।
  • पारिवारिक कलह का शमन एवं कन्या-रक्षण: स्कंद पुराण के अंतर्गत स्पष्ट उल्लेख है कि जिस घर में यह अनुष्ठान वैदिक रीति से और श्रद्धापूर्वक किया जाता है, वहां पारिवारिक द्वेष और कलह सदा के लिए समाप्त हो जाता है। उस घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती, और सबसे महत्वपूर्ण बात, उस परिवार में कन्याओं का सदैव रक्षण होता है तथा उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती ।
  • पाप-क्षय एवं मोक्ष की प्राप्ति: कार्तिक मास में यमुना नदी में स्नान और यमराज-चित्रगुप्त के शास्त्रोक्त पूजन से जन्म-जन्मांतर के जाने-अनजाने में हुए पाप कर्मों का शमन होता है। जीव का पारलौकिक मार्ग प्रशस्त होता है और वह आवागमन के चक्र से मुक्त होकर अंततः उत्तम लोक को प्राप्त करता है ।

11. समग्र निष्कर्ष

यम द्वितीया (भैया दूज) का पर्व भारतीय दर्शन और धर्मशास्त्रों की उस उच्चतम अनुष्ठानिक एवं दार्शनिक मीमांसा का प्रतीक है, जहाँ मृत्यु (यम) को अंधकार या भय का कारण नहीं, अपितु धर्म (धर्मराज) और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का अभिन्न अंग माना गया है। बहन के निश्छल प्रेम, पवित्रता और वात्सल्य (यमुना) के उग्र ताप के समक्ष स्वयं मृत्यु के देवता भी नतमस्तक हो जाते हैं। यह पर्व अत्यंत स्पष्ट रूप से यह उद्घोष करता है कि मानवीय और पारिवारिक संबंधों में यदि पूर्ण सत्य, निश्छल समर्पण और निस्वार्थ प्रेम विद्यमान हो, तो वह लौकिक सीमाओं को लांघकर मृत्युंजय अवस्था (मृत्यु पर विजय) को प्राप्त कर सकता है。

धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु और अठारह पुराणों में वर्णित संकल्प, स्नान, यम-तर्पण, तिलक-आरती, और भोजन-विधान केवल कर्मकांड के निर्जीव नियम नहीं हैं, बल्कि ये मानव मन, शरीर और आत्मा को सकारात्मक ऊर्जा (सत्वगुण) से भरने के अत्यंत परिष्कृत मनोवैज्ञानिक और तांत्रिक उपकरण हैं। अतः प्रत्येक सनातन धर्मावलंबी का यह पुनीत कर्तव्य है कि वह इस दिन शास्त्र-निर्दिष्ट विधि से, पूर्ण शुद्धता, पवित्रता और निष्ठा के साथ, इस मंगलमयी पर्व का अनुष्ठान करे, जिससे संपूर्ण समाज और राष्ट्र में अद्वैत प्रेम, सद्भाव, सुरक्षा और आयु-आरोग्य की निरंतर अभिवृद्धि हो सके。

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

त्योहार पूजा

भैया दूज पर यमराज की पूजा क्यों करते हैं?

भैया दूज यमराज: यम-यमुना कथा (बहन ने भोजन कराया→यम ने वर='अकाल मृत्यु नहीं'), यम=मृत्यु देवता (भाई रक्षा), यमुना स्नान=यम भय मुक्ति। बहन→तिलक→भोजन→दक्षिणा। रक्षाबंधन पूरक।

पर्व

भैया दूज पर पूजा कैसे करें

भैया दूज: कार्तिक शुक्ल द्वितीया। बहन भाई को तिलक (रोली-चावल) → आरती → मिठाई/फल → भोजन खिलाए। भाई उपहार दे। कथा: यमुना ने यमराज का तिलक किया — वरदान: तिलक करवाने वाले को यमभय नहीं। भाई-बहन स्नेह बन्धन।

पर्व

भैया दूज पर बहन तिलक कैसे लगाए

भैया दूज तिलक: बहन स्नान → चौकी पर लाल कपड़ा → भाई बिठाएँ → अनामिका से रोली तिलक (भ्रूमध्य) + अक्षत → आरती → मिठाई → दक्षिणा। कथा: यमुना ने यमराज को तिलक → अकाल मृत्यु भय नाश।

व्रत एवं त्योहार

दीपावली पर पाँच दिन कौन-कौन से त्योहार हैं?

दीपावली के पाँच दिन हैं: धनतेरस (धन्वंतरि पूजा), नरक चतुर्दशी (नरकासुर वध स्मृति), दीपावली (लक्ष्मी-गणेश पूजन), गोवर्धन पूजा (अन्नकूट), और भाई दूज (यम द्वितीया)।

श्राद्ध विधि

दूज श्राद्ध किस दिशा में करें?

दूज श्राद्ध दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य कोण की दिशा में मुख करके करना चाहिए। साथ ही कर्ता का जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएँ कंधे पर होना चाहिए। आसन रेशम, कम्बल, काठ यानी लकड़ी या कुशा का होना चाहिए। लोहे का आसन सर्वथा वर्जित है। दक्षिण दिशा यमलोक और पितृलोक की दिशा है, इसलिए नैऋत्य पितृ-कर्म के लिए शास्त्र-सम्मत है।

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