विस्तृत उत्तर
पराशर स्मृति महर्षि पराशर द्वारा रची गई है। शास्त्रीय आधार के अनुसार कलियुग के धर्म-नियंता महर्षि पराशर द्वारा रचित पराशर स्मृति में भी पितरों के श्राद्ध और सूतक-पातक अशौच के समय शुद्धिकरण के कठोर नियमों का वर्णन है।
महर्षि पराशर का परिचय देखें तो वे कलियुग के धर्म-नियंता हैं। धर्म-नियंता का अर्थ है धर्म का संचालक या नियामक। प्रत्येक युग का अपना धर्म-नियंता होता है, जो उस युग के अनुसार धर्म के नियम निर्धारित करता है। कलियुग के लिए महर्षि पराशर ने धर्म के नियम निर्धारित किए हैं, इसलिए उन्हें कलियुग का धर्म-नियंता कहा जाता है।
पराशर स्मृति की विशेषताएँ हैं। यह स्मृति विशेष रूप से कलियुग के लिए रची गई है। कलियुग में मनुष्य के पास समय, साधन और सामर्थ्य कम होते हैं, इसलिए महर्षि पराशर ने कलियुग के अनुसार सरल और व्यावहारिक नियम निर्धारित किए। इसमें श्राद्ध, सूतक-पातक, अशौच, शुद्धिकरण आदि के नियम विस्तार से वर्णित हैं।
पराशर स्मृति में दो मुख्य विषय हैं। पहला विषय है पितरों का श्राद्ध। श्राद्ध कैसे करना चाहिए, किस तिथि को करना चाहिए, कौन कर सकता है, क्या सामग्री लगती है, ये सब विस्तार से वर्णित है। दूसरा विषय है सूतक-पातक अशौच के समय शुद्धिकरण। सूतक का अर्थ है जन्म के समय की अशुद्धि, और पातक का अर्थ है मृत्यु के समय की अशुद्धि। दोनों के समय कैसे शुद्धि करनी है, इसके कठोर नियम पराशर स्मृति में हैं।
इन नियमों को कठोर कहा गया है क्योंकि ये अत्यंत स्पष्ट और निश्चित हैं। पराशर स्मृति में कोई संदेह या अस्पष्टता नहीं है, बल्कि हर बात का स्पष्ट निर्देश है। यही कारण है कि कलियुग में पराशर स्मृति का विशेष महत्व है, क्योंकि कलियुग के व्यक्तियों के लिए स्पष्ट नियम आवश्यक हैं।
पराशर स्मृति का अन्य धर्मशास्त्रों के साथ संबंध भी विशेष है। धर्मशास्त्रों, विशेषकर याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति और विभिन्न पुराणों में अकाल मृत्यु या अन्य विशेष अवस्थाओं के लिए पृथक तिथियों का कड़ा निर्देश है। अर्थात् पराशर स्मृति याज्ञवल्क्य स्मृति और अन्य पुराणों के साथ मिलकर श्राद्ध के सम्पूर्ण नियमों को स्पष्ट करती है।
श्राद्ध में आचरण के नियमों का भी पराशर स्मृति में स्पष्ट वर्णन है। इन स्मृतियों के अनुसार, श्राद्ध कर्म के दौरान यदि कोई व्यक्ति क्रोध करता है, मार्ग गमन करता है, या अनुचित आचरण करता है, तो पितर निराश होकर लौट जाते हैं। यहाँ इन स्मृतियों में पराशर स्मृति भी शामिल है, अर्थात् यह सिद्धांत पराशर स्मृति का भी है।
युगों के अनुसार धर्म-नियंताओं का क्रम इस प्रकार है। सत्ययुग के लिए मनु, त्रेतायुग के लिए गौतम, द्वापरयुग के लिए शंख-लिखित, और कलियुग के लिए पराशर। इस प्रकार महर्षि पराशर का स्थान युग-धर्म-नियंताओं की परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पराशर स्मृति का व्यावहारिक महत्व यह है कि यह कलियुग के व्यक्तियों के लिए सीधा मार्गदर्शन देती है। श्राद्ध और सूतक-पातक के समय क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, ये सब इसमें स्पष्ट हैं। इसलिए हर सनातन धर्मानुयायी को पराशर स्मृति का ज्ञान आवश्यक है।
पराशर स्मृति के कठोर नियमों के पीछे करुणा भी है। ये नियम कठोर इसलिए हैं ताकि लोग उन्हें सटीक रूप से पालन कर सकें, और भ्रम में न पड़ें। कलियुग में सरलता आवश्यक है, और स्पष्ट नियम सरलता का प्रतीक हैं। इसलिए पराशर स्मृति के नियम कठोर होते हुए भी व्यावहारिक हैं।
श्राद्ध के विषय में पराशर स्मृति का विशेष योगदान यह है कि यह तिथियों, मुहूर्तों, सामग्रियों, और आचरण के सम्पूर्ण नियमों को स्पष्ट करती है। याज्ञवल्क्य स्मृति के साथ मिलकर ये दोनों स्मृतियाँ श्राद्ध के सम्पूर्ण विज्ञान का आधार बनती हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में पराशर स्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति दोनों स्वतंत्र प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः पराशर स्मृति को कलियुग के धर्म-नियंता महर्षि पराशर ने रचा है। इसमें पितरों के श्राद्ध और सूतक-पातक अशौच के समय शुद्धिकरण के कठोर नियमों का विस्तार से वर्णन है।
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