विस्तृत उत्तर
श्राद्ध के समय क्रोध करने से पितर निराश होकर लौट जाते हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार इन स्मृतियों के अनुसार, श्राद्ध कर्म के दौरान यदि कोई व्यक्ति क्रोध करता है, मार्ग गमन करता है, या अनुचित आचरण करता है, तो पितर निराश होकर लौट जाते हैं।
श्राद्ध के समय तीन बातें विशेष रूप से वर्जित हैं। पहली बात है क्रोध करना। दूसरी बात है मार्ग गमन करना, अर्थात् व्यर्थ इधर-उधर घूमना या यात्रा करना। तीसरी बात है अनुचित आचरण करना, अर्थात् धर्म-विरुद्ध या अशोभनीय व्यवहार करना। ये तीनों कार्य श्राद्ध के दिन सर्वथा वर्जित हैं।
इन कार्यों का दुष्परिणाम भी स्पष्ट है। पितर निराश होकर लौट जाते हैं। पितर अपने वंशजों के द्वार पर तृप्ति की आशा से आते हैं, परंतु यदि वंशज का आचरण अनुचित हो, तो वे निराश होकर लौट जाते हैं। यह सबसे दुखद परिणाम है, क्योंकि श्राद्ध का मूल उद्देश्य पितरों को तृप्ति देना और उनके आशीर्वाद प्राप्त करना है।
पितरों के निराश लौटने का अर्थ कई प्रकार से समझा जा सकता है। पहला अर्थ है कि पितर श्राद्ध का अंश ग्रहण नहीं करते। अर्थात् श्राद्ध निष्फल हो जाता है। दूसरा अर्थ है कि पितर वंशज को आशीर्वाद नहीं देते। श्राद्ध से जो आठ फल मिलने चाहिए थे, अर्थात् आयु, संतान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख, राज्य, वे सब नहीं मिलते। तीसरा अर्थ है कि वंशज पितृ ऋण से मुक्त नहीं होता।
क्रोध का विशेष महत्व इसलिए है कि यह मन की शांति को नष्ट करता है। श्राद्ध एक आध्यात्मिक यज्ञ है, और इसमें मन की शांति आवश्यक है। श्राद्ध केवल कुछ मंत्रों का उच्चारण नहीं है, यह एक पूर्ण आध्यात्मिक यज्ञ है जिसमें काल, दिशा, सामग्री और मन की शुद्धि का अत्यंत महत्त्व है। मन की शुद्धि क्रोध से नष्ट हो जाती है।
मार्ग गमन का अर्थ है व्यर्थ यात्रा करना या इधर-उधर घूमना। श्राद्ध के दिन कर्ता को अपने स्थान पर ही रहना चाहिए, और श्राद्ध के अनुष्ठान में लीन रहना चाहिए। यदि वह व्यर्थ यात्रा करता है, तो उसका मन भटकता है, और श्राद्ध की पवित्रता खंडित होती है।
अनुचित आचरण में कई बातें शामिल हैं। झूठ बोलना, गाली देना, अधार्मिक कार्य करना, मांसाहार करना, मादक पदार्थों का सेवन करना, अश्लील व्यवहार आदि सब अनुचित आचरण हैं। श्राद्ध के दिन इन सबसे बचना चाहिए।
याज्ञवल्क्य के अनुसार श्राद्धकर्ता को पवित्र आचरण वाला, पत्नी के प्रति निष्ठावान और क्रोध-रहित होना चाहिए। यह तीन गुण श्राद्धकर्ता के लिए अनिवार्य हैं। यदि कर्ता क्रोधी है, तो उसका जीवन ही श्राद्ध के योग्य नहीं है। श्राद्ध के दिन तो विशेष रूप से क्रोध न आने देना चाहिए।
इस सिद्धांत के पीछे का दर्शन यह है कि पितर सूक्ष्म रूप में आते हैं, और वे वंशज के मन और भाव को देखते हैं। पितर वायु रूप में आते हैं, क्योंकि वायु पुराण के अनुसार पितर चंद्रलोक से दक्षिण दिशा से वायु रूप में अपने वंशजों के घर के द्वार पर आते हैं। वायु रूप में होने के कारण वे शुद्ध भावना और शांति को महसूस करते हैं। यदि वंशज क्रोध में हो, तो वे उस अशांत वातावरण में नहीं ठहर सकते, और निराश होकर लौट जाते हैं।
श्राद्ध के दिन की पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ नियम हैं। पहला, स्नान कर पूर्णतः शुद्ध हो जाएं। दूसरा, श्वेत धोती धारण करें। तीसरा, अनामिका में पवित्री पहनें। चौथा, जनेऊ अपसव्य अवस्था में रखें। पाँचवाँ, दक्षिण दिशा में मुख करें। छठा, पूरे दिन क्रोध, मार्ग गमन, और अनुचित आचरण से बचें। सातवाँ, सच्ची श्रद्धा से अनुष्ठान करें।
पितरों की प्रसन्नता के लिए कर्ता का व्यवहार विशेष महत्वपूर्ण है। पितर तृप्त होकर वंशजों को आयु, संतान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य देते हैं। परंतु यदि कर्ता क्रोध करे या अनुचित आचरण करे, तो ये सब फल नष्ट हो जाते हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति और अन्य धर्मशास्त्र इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः श्राद्ध के समय क्रोध करने, मार्ग गमन करने, या अनुचित आचरण करने से पितर निराश होकर लौट जाते हैं। इसलिए कर्ता को श्राद्ध के दिन क्रोध-रहित, शांत, और धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिए।
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