विस्तृत उत्तर
याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार श्राद्धकर्ता का आचरण और चरित्र विशेष रूप से पवित्र होना चाहिए। शास्त्रीय आधार के अनुसार याज्ञवल्क्य स्मृति के आचार अध्याय में श्राद्ध को धर्म का अभिन्न अंग बताया गया है। याज्ञवल्क्य के अनुसार श्राद्धकर्ता को पवित्र आचरण वाला, पत्नी के प्रति निष्ठावान और क्रोध-रहित होना चाहिए।
श्राद्धकर्ता के तीन प्रमुख गुण हैं। पहला गुण है पवित्र आचरण वाला होना। अर्थात् कर्ता का सम्पूर्ण जीवन धर्म के अनुसार होना चाहिए। उसके आचरण में पवित्रता, सच्चाई, और धर्म-निष्ठा होनी चाहिए। बिना पवित्र आचरण के श्राद्ध फलहीन हो जाता है।
दूसरा गुण है पत्नी के प्रति निष्ठावान होना। अर्थात् कर्ता को अपनी पत्नी के प्रति वफादार और निष्ठावान होना चाहिए। पत्नी के प्रति निष्ठा गृहस्थ धर्म का मूल आधार है, और इसके बिना कोई भी धार्मिक अनुष्ठान सफल नहीं होता।
तीसरा गुण है क्रोध-रहित होना। अर्थात् कर्ता में क्रोध नहीं होना चाहिए। क्रोध मन को अशांत करता है, और शांत मन से ही श्राद्ध संपन्न होता है। क्रोधी व्यक्ति का श्राद्ध सफल नहीं होता।
इन तीनों गुणों का गहरा महत्व है। श्राद्ध केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं है, बल्कि कर्ता के आंतरिक गुणों पर भी निर्भर करता है। यदि कर्ता का आचरण पवित्र नहीं है, तो उसके द्वारा किया गया श्राद्ध भी पवित्र नहीं होगा। यदि वह पत्नी के प्रति निष्ठावान नहीं है, तो उसका जीवन ही धर्म-विरुद्ध है। यदि वह क्रोधी है, तो उसकी मानसिक शांति नहीं होगी, और श्राद्ध में सच्ची श्रद्धा नहीं आएगी।
श्राद्ध के समय आचरण की महत्ता और भी विशेष है। यदि कोई व्यक्ति क्रोध करता है, मार्ग गमन करता है, या अनुचित आचरण करता है, तो पितर निराश होकर लौट जाते हैं। अर्थात् श्राद्ध के दिन भी विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
श्राद्ध के दिन तीन बातें वर्जित हैं। पहली है क्रोध करना। दूसरी है मार्ग गमन करना, अर्थात् व्यर्थ इधर-उधर घूमना। तीसरी है अनुचित आचरण करना, अर्थात् धर्म-विरुद्ध व्यवहार। यदि श्राद्ध कर्ता ये तीनों कार्य करता है, तो पितर निराश होकर लौट जाते हैं। पितरों का निराश लौटना सबसे बड़ी हानि है, क्योंकि उनके आशीर्वाद के बिना श्राद्ध निष्फल हो जाता है।
याज्ञवल्क्य स्मृति के विशेष महत्व को देखें तो याज्ञवल्क्य स्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों के व्याख्याकारों ने यह स्पष्ट किया है कि पौत्र पुत्र का पुत्र और दौहित्र पुत्री का पुत्र दोनों समान रूप से अपने पूर्वजों को नरक से तारने की क्षमता रखते हैं। यह दर्शाता है कि याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध के विषय में अत्यंत सूक्ष्म और गहन विचार किया गया है।
याज्ञवल्क्य स्मृति का स्पष्ट कथन है कि ये तीन पूर्वज क्रमशः वसु, रुद्र और आदित्य देवताओं के समान माने जाते हैं। यह सिद्ध करता है कि श्राद्ध के सूक्ष्म रहस्यों का विस्तृत वर्णन याज्ञवल्क्य स्मृति में है, और श्राद्धकर्ता को इन रहस्यों को समझकर ही अनुष्ठान करना चाहिए।
याज्ञवल्क्य स्मृति के फल वर्णन भी विशेष हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति अध्याय 1, श्लोक 270 में महर्षि याज्ञवल्क्य ने श्राद्ध के फल का अत्यंत स्पष्ट और वैज्ञानिक श्लोक प्रस्तुत किया है, जिसमें श्राद्ध से आयु, संतान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य की प्राप्ति बताई गई है। परंतु ये फल केवल पवित्र आचरण वाले, पत्नी-निष्ठ और क्रोध-रहित कर्ता को ही मिलते हैं।
श्राद्ध की मूल भावना श्रद्धा है। श्राद्ध शब्द का अर्थ ही है श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्, और सच्ची श्रद्धा केवल पवित्र आचरण वाले व्यक्ति में ही उत्पन्न हो सकती है। इसलिए कर्ता के गुण श्राद्ध की सफलता का मूल आधार हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः याज्ञवल्क्य के अनुसार श्राद्धकर्ता को तीन प्रमुख गुणों से युक्त होना चाहिए। पहला, पवित्र आचरण वाला। दूसरा, पत्नी के प्रति निष्ठावान। तीसरा, क्रोध-रहित। इन गुणों के बिना श्राद्ध सफल नहीं होता।
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