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विष्णु पुराण अध्याय 7: सत्त्व, रजस्, तमस् (त्रिगुण) और मोक्ष का रहस्य!
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण अध्याय 7: सत्त्व, रजस्, तमस् (त्रिगुण) और मोक्ष का रहस्य!

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श्रीविष्णु पुराण: प्रथम अंश: सप्तम अध्याय

श्रीविष्णु पुराण: प्रथम अंश: सप्तम अध्याय: गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) का विस्तृत वर्णन और परमेश्वर श्रीविष्णु की सर्वव्यापकता

यह गहन प्रतिवेदन परम पूज्य महर्षि पराशर जी द्वारा अपने शिष्य मैत्रेय जी को प्रदान किए गए दिव्य ज्ञान, श्रीविष्णु पुराण के प्रथम अंश, सप्तम अध्याय पर आधारित है। इसका उद्देश्य प्रत्येक शब्द और वाक्य के तात्त्विक अर्थ को विस्तारपूर्वक समझाना है, जिससे जिज्ञासुजन मोक्ष के परम मार्ग को पूर्ण रूप से आत्मसात् कर सकें।

१. प्रास्ताविक मंगलाचरण एवं तत्त्व जिज्ञासा का उदय

आदि पुरुष श्रीविष्णु का ध्यान एवं वन्दन (मंगलाचरण)

प्रारम्भ में, उस परम सत्य श्रीविष्णु का वन्दन किया जाता है, जो इस संपूर्ण जगत के आदि कारण हैं। वे नित्य, अक्षय (कभी क्षय न होने वाले), अव्यय (परिवर्तन रहित) तथा एकरस (समान, अपरिवर्तनीय स्वभाव वाले) हैं। वे ही परम सत्ता हैं, जो समस्त सृष्टि के भूत भावन (अर्थात् सभी भूतों—प्राणियों और तत्त्वों—को उत्पन्न करने वाले और धारण करने वाले) हैं।

उन परम पुरुष परमात्मा का स्वरूप योगियों के हृदय में सर्व-शुद्ध रूप में, प्रकाशमान और प्रसिद्ध रूप में स्थित है। वह काल की सीमा से परे हैं, मुहूर्त आदि काल के गोचर में वे ही एकमात्र शक्ति हैं, जो शुद्ध सत्त्व स्वरूप हैं, और इसलिए विष्णु परमेश्वर के रूप में प्रसिद्ध हैं। वे ही समस्त कारणों के कारण हैं, कार्यों के कारण हैं, और कार्य-कारण के भी कारण हैं। वे भोग (उपभोग की वस्तु), भोक्ता (उपभोग करने वाला) तथा सृष्टि के कार्यकर्ता स्वरूप को धारण करने वाले हैं। उन विशुद्ध, नित्य और अजन्मा परम पद श्रीविष्णु को हमारा नमन है।

यह मंगलाचरण इस बात की स्थापना करता है कि सृष्टि, स्थिति और संहार—तीनों क्रियाएँ—एक ही परमेश्वर (विष्णु) की शक्ति द्वारा संचालित हैं, भले ही वे भिन्न-भिन्न रूपों (त्रिदेव) में प्रकट होती हों। वे तत्त्वों के भी पार हैं, इसलिए योगियों द्वारा वे परमात्मा स्वरूप में ध्येय हैं।

मैत्रेय ऋषि की जिज्ञासा

पूर्व अध्यायों में, मैत्रेय ऋषि ने महर्षि पराशर से सृष्टि की स्थूल संरचना के विषय में विस्तृत ज्ञान प्राप्त किया था। अब वे आगे की गहन जिज्ञासा प्रस्तुत करते हैं।

मैत्रेय जी कहते हैं कि हे मुनिश्रेष्ठ! आपने पूर्व में मुझे समुद्रों, पर्वतों तथा देवता आदि की उत्पत्ति, पृथ्वी का अधिष्ठान (आधार), तथा सूर्य आदि ज्योतिर्गणों का परिमाण और उनका आधार —ये सब विस्तार से बताए हैं। इसके अतिरिक्त, आपने देवता आदि के वंशों, मनु, मन्वन्तरों, बार-बार आने वाले चारों युगों में विभक्त कल्पों, और कल्पों के विभागों के विषय में भी ज्ञान दिया है। आपने महामुनि व्यास जी द्वारा वेद शाखाओं के प्रणयन की रीति और ब्राह्मणों तथा आश्रमवासियों के धर्मों का भी वर्णन किया है।

इन सभी भौतिक एवं कालगत विवरणों को जानने के उपरान्त, मैत्रेय अब सूक्ष्म और नियामक तत्त्वों को जानने के लिए उत्कंठित हैं।

वे कहते हैं कि हे वासिष्ठनन्दन (पराशर)! मैं अब ऊर्ध्व लोकों, जैसे भुवर्लोक और अन्य लोकों का तथा उन लोकों में स्थित (आकाशीय ज्योतियों) के स्थान और परिमाण का वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ।

इस क्रम में, मैत्रेय जी की जिज्ञासा एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक संक्रमण को दर्शाती है। वे ब्रह्माण्ड की भौतिक संरचना (लोकों का प्रमाण) को जानने के पश्चात , अब इस विस्तार को धारण करने वाली परम शक्ति के विषय में जानना चाहते हैं।

महर्षि पराशर ने ब्रह्माण्ड के अंड (ब्रह्मा के अंडे) और उसके आवरणों का उल्लेख पूर्व में किया था, अतः मैत्रेय अब विशेष रूप से भगवान विष्णु की शक्ति (ऊर्जा) के प्रभाव को विस्तृत रूप से सुनने का आग्रह करते हैं।

यह जिज्ञासा यह सिद्ध करती है कि भौतिक ब्रह्मांड की विशालता का ज्ञान प्राप्त करना केवल आध्यात्मिक सत्य को समझने का प्राथमिक चरण मात्र है। जब साधक भौतिक संरचना की विशालता को देखता है, तभी उसके मन में इस विशाल रचना के पीछे कार्यरत नियामक सिद्धांत—अर्थात् विष्णु की शक्ति—को जानने की उत्कंठा तीव्र होती है। यह शक्ति ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय की सूत्रधार है। इस प्रकार, जिज्ञासा का यह क्रम ही साधक को विष्णु के सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और गुणातीत स्वरूप की ओर ले जाता है।

२. ब्रह्मा द्वारा सृष्टि का क्रम (मानसी सृष्टि, रुद्र एवं मनु का प्राकट्य)

सप्तम अध्याय में महर्षि पराशर आगे ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि के प्रारम्भिक क्रम का वर्णन करते हैं, जो यह स्पष्ट करता है कि जैसे ही सृष्टि आरम्भ होती है, वह त्रिगुणों के प्रभाव के अधीन आ जाती है।

ब्रह्मा द्वारा मानस पुत्रों का सृजन

पराशर ऋषि बताते हैं कि जब ब्रह्मा जी ध्यान (मेधा) में लीन थे, तो उनके ध्यान में लीन रहने से उनके शरीर की प्रकृति से उत्पन्न स्वरूप और शक्तियों वाली, मन द्वारा उत्पन्न संतति का प्राकट्य हुआ। ये सभी देहधारी आत्माएं थीं, जो उस सर्वज्ञ देव के शरीर से उत्पन्न हुईं।

यह प्रथम सृष्टि, जिसे मानसी सृष्टि कहा जाता है, में उत्पन्न हुए समस्त प्राणी—देवताओं से लेकर स्थावर (जड़) पदार्थों तक—त्रिगुणों सत्त्व, रजस्, तमस् के आश्रयभूत थे। इसका तात्पर्य यह है कि सृष्टि के प्रारम्भिक क्षण से ही, संपूर्ण संसार प्रकृति के इन तीन गुणों के बंधन में आबद्ध हो गया।

चूँकि पहली मानसी सृष्टि ने स्वयं को वंशवृद्धि (अर्थात् गुणाश्रित कर्म में संलग्न होकर प्रजनन) नहीं किया, इसलिए ब्रह्मा जी ने अपने समान ही अन्य मानस पुत्र उत्पन्न किए। ये नौ प्रजापति, जिन्हें 'नौ ब्रह्मा' भी कहा जाता है, पुराणों में प्रसिद्ध हैं: भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अङ्गिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ। ये नव ब्रह्मा सृष्टि के विस्तार में सहायक बने।

सनन्दनादि का वैराग्य और रुद्र का प्राकट्य

ब्रह्मा जी के प्रथम सृजित पुत्रों में सनन्दन, सनक, सनातन और सनत्कुमार आदि भी थे।

विरक्ति का तत्त्व: इन कुमारों का एक विशिष्ट स्वभाव था। वे इच्छा और वासना से रहित थे। वे पवित्र ज्ञान से प्रेरित थे, इस ब्रह्मांड से विरक्त थे, और वंशवृद्धि करने की इच्छा नहीं रखते थे।

यह अवस्था अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह पुत्र सत्त्व गुण की अत्यधिक प्रधानता को दर्शाते हैं। सत्त्व गुण जहाँ ज्ञान और वैराग्य देता है, वहीं वह क्रियाशीलता (रजस्) के विपरीत होता है। चूँकि सृष्टि का उद्देश्य वंशवृद्धि और कर्म का विस्तार करना था, उनकी यह विरक्ति सृष्टि क्रम के लिए बाधक सिद्ध हुई। उनकी यह स्थिति उन्हें जन्म से ही निवृत्ति मार्ग (मोक्ष) की ओर ले जाती थी।

रुद्र की उत्पत्ति: जब ब्रह्मा जी ने अपने प्रथम मानस पुत्रों की इस विरक्ति को देखा, तो वे क्रोध से भर गए। ब्रह्मा का वह क्रोध इतना भयंकर था कि उसमें तीनों लोकों को भस्म कर देने की क्षमता थी। क्रोध की ज्वाला ने स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल (नरक) को एक माला की तरह घेर लिया।

तब ब्रह्मा जी के क्रोध से घनीभूत, क्रुद्ध भ्रकुटी से अत्यंत तेजस्वी, मध्याह्न सूर्य के समान दीप्तिमान, भयंकर और विशालकाय रुद्र प्रकट हुए। इनका स्वरूप आधा पुरुष और आधा स्त्री का था। ब्रह्मा ने उनसे 'स्वयं को विभाजित' करने को कहा, और ऐसा कह कर ब्रह्मा अंतर्धान हो गए।

रुद्र का विभाजन: ब्रह्मा के आदेश का पालन करते हुए, रुद्र ने स्वयं को दो भागों में विभाजित कर लिया: पुरुष प्रकृति और स्त्री प्रकृति। उन्होंने अपनी पुरुष प्रकृति को पुनः ग्यारह व्यक्तियों (एकादश रुद्रों) में विभाजित किया। इनमें कुछ स्वरूप सौम्य (कोमल), कुछ भयंकर, और कुछ उग्र थे। उन्होंने अपनी स्त्री प्रकृति को भी अनेक रूपों में बहुगुणित किया, जिनमें श्वेत और श्याम दोनों प्रकार के वर्ण थे।

द्वैत एवं लय का तात्कालिक समावेश: रुद्र का क्रोध से उत्पन्न होना और उनका द्वैधीकरण (नर-नारी, सौम्य-घोर) यह दर्शाता है कि सृष्टि की प्रक्रिया केवल उत्पत्ति (रजस्) तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके साथ ही लय (तमस्) का तत्त्व भी तत्काल समाहित हो जाता है। ब्रह्माण्ड के निर्माण के साथ ही, विनाश (लय) का तत्त्व (रुद्र) जन्म ले लेता है। यह द्वैत सृष्टि की मूलभूत प्रकृति है और यह सिद्ध करता है कि ब्रह्मा की सृष्टि त्रिगुणों के अधीन होने के कारण, स्वभावतः अस्थिर और परिवर्तनशील है।

स्वायम्भुव मनु और शतरूपा का सृजन

सृष्टि के निर्वाह और वंशवृद्धि को सुनिश्चित करने के लिए, ब्रह्मा ने स्वयं को स्वायम्भुव मनु के रूप में उत्पन्न किया। वे ब्रह्मा से ही जन्म लेने वाले और उन्हीं के स्वरूप के थे।

स्वायम्भुव मनु ने अपनी पत्नी शतरूपा को उत्पन्न किया। इन दोनों से ही मानव वंश का विस्तार हुआ, जिससे महान पुत्रों जैसे प्रियव्रत और उत्तानपाद आदि का जन्म हुआ। ये मनु और उनकी संतानें ही पृथ्वी पर सत्य मार्ग का अनुसरण करने वाले वीर संरक्षक हैं, जो जगत की स्थिति (पालन) के नित्य कारण माने जाते हैं।

इसके अतिरिक्त, दक्ष प्रजापति ने अपनी कन्याओं (जैसे अदिति, दिति) का सृजन किया, जिनका विवाह धर्म और अधर्म आदि तत्त्वों से हुआ।

३. सृष्टि का शाश्वत चक्र (नित्य सर्ग, दुःख का तत्त्व और प्रलय)

सप्तम अध्याय में यह वर्णन किया गया है कि त्रिगुणों के अधीन हुई सृष्टि किस प्रकार अनिवार्य रूप से दुःख, मृत्यु और संहार के तत्त्वों से युक्त होती है।

धर्म, अधर्म, दुःख और मृत्यु का प्राकट्य

सृष्टि के प्रारम्भ में ही, प्रजापतियों द्वारा धर्म और अधर्म दोनों का प्राकट्य होता है।

अधर्म की संतति (विनाशक तत्त्व): अधर्म से भय और पीडा उत्पन्न हुईं। भय और पीडा के संयोग से दुःख उत्पन्न हुआ ।

इसके पश्चात मृत्यु के पुत्रों का वर्णन आता है, जो सृष्टि में विनाशक शक्तियों के रूप में कार्य करते हैं। मृत्यु के पुत्र थे: व्याधि , जरा , शोक, लोभ और क्रोध । यह सभी स्वरूप दुःख से युक्त और दुष्टता से चिह्नित थे।

ये सभी विनाशक तत्त्व न तो किसी पत्नी से युक्त हुए, न उनका कोई पुत्र हुआ, और न ही उन्होंने अपने वीर्य को धारण किया। हे श्रेष्ठ मुनिनन्दन, ये सभी श्रीविष्णु के अत्यंत भयंकर स्वरूप हैं, जो इस संसार में विनाश के शाश्वत कारण बनकर विद्यमान हैं।

इसके विपरीत, दक्ष, मरीचि, अत्रि, भृगु और अन्य प्रजापति सृष्टि की उत्पत्ति के नित्य कारण हैं, जबकि मनु और उनके पुत्र सत्य के मार्ग पर चलने वाले होने के कारण, पृथ्वी के वीर संरक्षक एवं विश्व की स्थिति (पालन) के नित्य कारण हैं।

इस विवरण से यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा की मानसी सृष्टि में, जो गुणों के अधीन हुई, उसके आरम्भ में ही दुःख, व्याधि और मृत्यु (अर्थात् अधर्म की संतति) की उत्पत्ति हो गई। यह सृष्टि के चक्र की अपूर्णता को दर्शाती है, जहाँ भौतिक संसार (प्रवृत्ति मार्ग) मूलतः दुःखमय है और अस्थिरता से युक्त है।

नित्य सृष्टि और प्रलय का विज्ञान

विष्णु पुराण में सृष्टि की प्रक्रिया को केवल एक बार घटित होने वाली घटना के रूप में नहीं, अपितु एक शाश्वत चक्र के रूप में देखा जाता है।

नित्य सृष्टि: वह सृष्टि जिसमें प्राणी प्रतिदिन जन्म लेते और प्रतिदिन मरते रहते हैं, उसे पुराणों के अर्थ में कुशल महानुभावों ने नित्य सृष्टि कहा है। यह जगत अनवरत रूप से चलता रहता है, जहाँ जीवन और मृत्यु का प्रवाह दिन-रात चलता रहता है।

प्रलय के प्रकार: पुराणों में प्रलय के विभिन्न प्रकार बताए गए हैं, जो सृष्टि की अनित्यता और विष्णु के परम तत्त्व के गुणों से परे होने को सिद्ध करते हैं:

  1. नैमित्तिक प्रलय: यह सामयिक विलय (लय) है, जो ब्रह्मा के एक कल्प (कल्पान्त) की समाप्ति पर होता है। इस समय समस्त तत्त्व अपनी आदिम अवस्था में लौट जाते हैं। हालांकि, इस प्रलय के दौरान कुछ ऊर्ध्व लोक (जैसे जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक) नष्ट नहीं होते, केवल महर्लोक विरक्त होता है।
  2. आत्यन्तिक प्रलय: यह सबसे महत्त्वपूर्ण और परम विलय है। यह व्यक्तिगत मुक्ति की अवस्था है, जहाँ जीवात्मा सर्वोच्च ज्ञान के माध्यम से परम ब्रह्म (विष्णु) में विलीन हो जाती है, और जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाती है।

आत्यन्तिक प्रलय का ज्ञान ही यज्ञ, तप और दान आदि करने से प्राप्त होने वाले पुण्य फल से भी कहीं अधिक महत्त्व रखता है। जो योगी इस परम रहस्य को जान जाता है, उसे वेदों के पठन-पाठन या अन्य अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं रह जाती, क्योंकि वह सीधे परमात्मा से जुड़ जाता है।

विष्णु पुराण का उद्देश्य केवल ब्रह्मांडीय संरचना का वर्णन करना नहीं, बल्कि इस ज्ञान के माध्यम से साधक को यह समझाना है कि भौतिक संसार (सृष्टि) और यहाँ होने वाले सभी चक्र (नैमित्तिक प्रलय सहित) दुःखमय और अस्थिर हैं। अंतिम लक्ष्य, केवल आत्यन्तिक प्रलय (मोक्ष)की प्राप्ति है।

४. त्रिगुण मीमांसा: वैष्णवी शक्ति द्वारा सृष्टि, स्थिति एवं संहार

यह सप्तम अध्याय का केंद्रीय दार्शनिक खण्ड है, जो यह व्याख्या करता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का परिचालन परमेश्वर श्रीविष्णु की त्रिगुणमयी शक्ति (माया) द्वारा किस प्रकार होता है, और जीवात्मा इस बंधन से कैसे मुक्त हो सकती है।

वैष्णवी शक्ति और त्रिगुणों का समन्वय

महर्षि पराशर मैत्रेय से कहते हैं कि तत्त्वों के सारभूत, महान् विष्णु समस्त शरीरों में स्थित रहते हैं। वे ही परमेश्वर हैं जो जगत की उत्पत्ति (सृष्टि), स्थिति (पालन) और प्रलय (संहार) को संचालित करते रहते हैं।

शक्ति का नित्य संचार: हे मैत्रेय! सृष्टि, स्थिति और विनाश की ये वैष्णवी शक्तियाँ (विष्णु की क्षमताएँ) समस्त देहधारियों में, अहर्निश (दिन-रात, अनवरत) समान भाव से संचारित होती रहती हैं।

यह वैष्णवी शक्ति, जो भगवान विष्णु की (दिव्य स्त्री ऊर्जा) या potency है, सृष्टि और पालन के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह शक्ति ही विष्णु को प्रकट होने और अपनी भक्ति को व्यक्त करने की क्षमता प्रदान करती है।

त्रिगुणों की अनिवार्यता: यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि हे ब्राह्मण! ये तीनों महती शक्तियाँ त्रिगुणमयी हैं। इसका अर्थ है कि विष्णु की शक्ति (माया), जिसके द्वारा सृष्टि का संचालन होता है, सत्त्व, रजस् और तमस्—इन तीन गुणों से अनिवार्य रूप से मिश्रित है। गुणों के इस मिश्रण और अस्थिरता के कारण ही संसार में प्राणियों और गतिविधियों का विकास होता है, जिससे जीवात्मा को अपने कर्मों का क्षय करने का अवसर मिलता है।

अतः, विष्णु के तीन कार्य (सृष्टि, स्थिति, संहार) उनकी शक्ति के माध्यम से त्रिगुणों के परिचालन पर आधारित हैं।

त्रिगुणों का गहन दार्शनिक एवं व्यावहारिक स्वरूप

गुण शब्द का मूल अर्थ 'तंतु' या 'धागा' है। यह तीनों गुण प्रकृति के मूलभूत हैं, जो भौतिक अस्तित्व की मैट्रिक्स का निर्माण करते हैं। ये तीनों गुण हर वस्तु और हर प्राणी में हमेशा मौजूद रहते हैं, किन्तु उनकी प्रधानता अलग-अलग होती है, जो किसी व्यक्ति के चरित्र, स्वभाव, और कर्मों को निर्धारित करती है।

त्रिगुणों का स्वरूप:

  1. सत्त्व गुण:
    • दार्शनिक आधार: सत्त्व संस्कृत के मूल शब्द 'सत्' से आता है, जिसका अर्थ है "अस्तित्व" । यह सद्भाव और संतुलन का सिद्धांत है।
    • मुख्य लक्षण: यह गुण शुद्धता, ज्ञान, और प्रकाश का प्रतिनिधित्व करता है। सात्त्विक व्यक्ति का दृष्टिकोण सकारात्मक होता है और वह हर वस्तु में आनंद और प्रसन्नता पाता है । सात्त्विक ऊर्जा व्यक्ति के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आभामंडल (प्रभाव मंडल) का निर्माण करती है, जो नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करता है।
    • आचरण: सात्त्विक जीव त्रुटि होने पर उसे स्वीकार करता है, बहाने नहीं बनाता और उसे अपने रजस् और तमस् गुणों का ज्ञान रहता है।
    • बंधन: श्रीमद्भगवद्गीता (जिसका ज्ञान पुराणों में भी समाहित है) के अनुसार, सत्त्व गुण ज्ञान और सुख के प्रति आसक्ति के माध्यम से आत्मा को बाँधता है। यद्यपि यह मोक्ष के लिए आवश्यक स्थितियाँ उत्पन्न करता है, यह भी एक बंधन है।
    • सृष्टि में भूमिका: स्थिति (संरक्षण)।
  2. रजस् गुण:
    • दार्शनिक आधार: यह 'रंज्' मूल से उत्पन्न है, जिसका अर्थ है "रंगे होना, प्रभावित होना, उत्तेजित होना" । यह गतिशीलता और क्रियाशीलता का सिद्धांत है।
    • मुख्य लक्षण: रजस् कर्म, उत्साह, महत्वाकांक्षा, और स्व-लाभ की तीव्र इच्छा उत्पन्न करता है। यह गुण उत्तेजक और गतिशील माना जाता है।
    • आचरण: रजोगुणी जीव में त्रुटि होने पर वह उसका दोषारोपण किसी अन्य प्राणी या परिस्थिति पर करता है। वह अपनी गलती नहीं मानता। यह व्यक्ति को उपयुक्त समय पर भी उपयुक्त कार्य करने से रोक सकता है, यदि उसे अपने लाभ (जैसे पदोन्नति) की चिंता हो।
    • बंधन: रजस् गुण देहधारी आत्मा को कर्म और इच्छा के प्रति आसक्ति के माध्यम से बाँधता है।
    • सृष्टि में भूमिका: सृष्टि (उत्पत्ति)।
  3. तमस् गुण :
    • दार्शनिक आधार: यह 'अंधकार का गुण' कहलाता है, जो जड़ता और अज्ञान के सिद्धांत को संदर्भित करता है।
    • मुख्य लक्षण: यह गुण अंधकार, विनाश, आलस्य, प्रमाद, निद्रा और सांसारिक इच्छाओं में आसक्ति उत्पन्न करता है।
    • आचरण: तमस् प्रधान व्यक्ति को सत्य और असत्य का ज्ञान नहीं होता; वह अज्ञान के अंधकार में रहता है। उसे यह जानने की जिज्ञासा भी नहीं होती कि क्या सही है और क्या गलत है । तमस् गुण के प्रभाव में व्यक्ति निष्क्रिय और आवरणकारी होता है।
    • बंधन: तमस् गुण लापरवाही, आलस्य और निद्रा के माध्यम से आत्मा को बाँधता है।
    • सृष्टि में भूमिका: संहार (विलय)।
त्रिगुणों का दार्शनिक एवं व्यावहारिक स्वरूप
गुण दार्शनिक स्वरूप मुख्य लक्षण (स्वभाव) बंधन का प्रकार सृष्टि में भूमिका
सत्त्व अस्तित्व, सद्भाव, प्रकाश शुद्धता, ज्ञान, संतुलन, वैराग्य की ओर प्रवृत्ति सुख और ज्ञान की आसक्ति। स्थिति (संरक्षण)
रजस् क्रिया, प्रवृत्ति, उत्तेजना कर्म, उत्साह, कामना, स्व-लाभ की इच्छा क्रिया और इच्छा की आसक्ति। सृष्टि (उत्पत्ति)
तमस् जड़ता, आवरण, अज्ञान आलस्य, प्रमाद, अज्ञान का अंधकार लापरवाही और जड़ता की आसक्ति। संहार (विलय)

प्रत्येक व्यक्ति में ये सूक्ष्म गुण प्रबल होते हैं, और जिस गुण की प्रधानता होती है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व प्रदर्शित होता है। व्यक्ति भले ही ऊपरी तौर पर स्वयं को छिपाने का प्रयास करे, परन्तु उसका मूल स्पंदन (मूल स्वरूप) उसके प्रबल सूक्ष्म गुण के अनुसार ही प्रक्षेपित होता रहता है।

त्रिगुणों का अतिक्रमण (गुणातीत स्थिति)

विष्णु पुराण में इस बात पर बल दिया गया है कि मोक्ष की प्राप्ति केवल गुणों के अतिक्रमण से ही संभव है।

मोक्ष की शर्त: महर्षि पराशर स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति इन तीनों महान त्रिगुणमयी शक्तियों के प्रभाव से स्वयं को मुक्त कर लेता है (अर्थात् गुणातीत हो जाता है), वह परम पद को प्राप्त करता है। इस परम पद को प्राप्त करने के बाद वह कभी भी जन्म-मरण के चक्र में लौटकर नहीं आता।

गुणातीत अवस्था: वह है, जहाँ योगी प्रकृति के गुणों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, जिससे उसका वास्तविक स्वरूप (आत्मा) प्रकट होता है ।

पराभक्ति का मार्ग: योगिक ग्रंथ और महान गुरु सदैव सात्त्विक स्थितियों के विकास पर बल देते हैं, क्योंकि सत्त्व गुण मोक्ष के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनाता है। किन्तु सर्वोच्च अवस्था इन तीनों गुणों के भी परे है।

गुणातीत स्थिति प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग अनन्य भक्ति (पराभक्ति) है। ऐसी भक्ति मन की सहज, निर्बाध प्रवृत्ति है, जो निरंतर ईश्वर (विष्णु, अंतरात्मा) की ओर उन्मुख रहती है। यह भक्ति एक सच्चे भक्त के हृदय में ईश्वर के नाम या उनके गुणों के श्रवण मात्र से उत्पन्न होती है। जिस भक्त में ऐसी पराभक्ति होती है, वह स्वर्ग के सुख को भी अस्वीकार कर देता है, क्योंकि उसकी एकमात्र इच्छा सभी परिस्थितियों में—सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु, मान-अपमान—केवल ईश्वर से प्रेम करना होता है।

जो मनुष्य हर परिस्थिति में बिना विचलित हुए, अनन्य भाव से भगवान विष्णु की भक्ति में स्थिर रहता है, वह भक्त प्रकृति के तीनों गुणों को अति शीघ्र पार करके ब्रह्म पद पर स्थित हो जाता है।

यह तथ्य कि वैष्णवी शक्ति स्वयं त्रिगुणमयी है , यह स्थापित करता है कि सृष्टि का चक्र (ब्रह्मांडीय स्तर पर) और व्यक्ति का कर्म-चक्र (वैयक्तिक स्तर पर) एक ही शक्ति के अधीन है। जीवात्मा जब तक प्रकृति के अधीन है, वह इन गुणों से प्रभावित रहेगा। मोक्ष प्राप्त करने का अर्थ है इस शक्ति के क्रियाशील प्रभाव क्षेत्र (माया) से बाहर निकलकर, शक्ति के स्रोत (विष्णु) के शुद्ध स्वरूप में लीन हो जाना।

५. ईश्वर की सर्वव्यापकता एवं गुणातीत महिमा

सप्तम अध्याय का अंतिम खण्ड विष्णु तत्त्व की असीमता और परम स्थिति को स्थापित करता है।

सप्त लोकों की संरचना में विष्णु का अधिष्ठान

मैत्रेय की जिज्ञासा के उत्तर में, महर्षि पराशर ब्रह्मांड की संरचना का विस्तार से वर्णन करते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि विष्णु ही संपूर्ण लोकों के आधार हैं।

भूलोक से भुवर्लोक तक: पृथ्वी का गोला (भूलोक), जिसमें इसके महासागर, पर्वत और नदियाँ सम्मिलित हैं, वहाँ तक फैला हुआ है जहाँ तक सूर्य और चंद्रमा की किरणें इसे प्रकाशित करती हैं। इसी सीमा तक, व्यास और परिधि दोनों में, आकाश का क्षेत्र (भुवर्लोक) इसके ऊपर फैला हुआ है (स्वर्गलोक या ग्रह मंडल तक)।

ग्रहों का स्थान और परिमाण:

  • सूर्य मंडल पृथ्वी से एक लाख योजन की दूरी पर स्थित है।
  • चन्द्रमा का मंडल सूर्य से उतनी ही दूरी पर है (अर्थात् सूर्य से एक लाख योजन ऊपर)।
  • चंद्रमा से समान अंतराल पर (अर्थात् एक लाख योजन ऊपर) समस्त नक्षत्रों का कक्षा मंडल स्थित है।
  • बुध ग्रह नक्षत्र मंडलों से दो लाख योजन ऊपर स्थित है।
  • शुक्र ग्रह बुध से समान दूरी पर (अर्थात् दो लाख योजन ऊपर) स्थित है।
  • मंगल ग्रह शुक्र से उतनी ही दूरी पर है; और देवताओं के पुरोहित बृहस्पति मंगल से उतनी ही दूरी पर हैं।
  • शनि ग्रह बृहस्पति से ढाई लाख योजन ऊपर स्थित है।
  • सप्तऋषि मंडल शनि से एक लाख योजन ऊपर स्थित है।
  • ध्रुव सप्तऋषि मंडल से समान ऊँचाई (एक लाख योजन) पर स्थित है।

स्वर्गीय क्षेत्र : सूर्य और ध्रुव के बीच का अंतराल, जो चौदह लाख योजन तक फैला हुआ है, ब्रह्मांड की व्यवस्था जानने वालों द्वारा स्वर्गलोक कहा जाता है।

लोकों की नश्वरता: महर्षि पराशर लोकों को उनकी आयु के अनुसार विभाजित करते हैं:

  • क्षणभंगुर : भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक (ये तीन)।
  • शाश्वत : जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक (ये तीन सर्वोच्च लोक)।
  • मिश्रित: महर्लोक, जो क्षणभंगुर और शाश्वत के बीच स्थित है। यद्यपि यह कल्प के अंत में विरक्त हो जाता है, यह पूर्णतः नष्ट नहीं होता।

महर्षि पराशर निष्कर्ष निकालते हैं कि ये सात लोक (और उनके नीचे पाताल लोक) मिलकर संपूर्ण विश्व का विस्तार बनाते हैं। इस प्रकार, ब्रह्मांड की यह विशाल संरचना भी काल और प्रलय के अधीन है, जो विष्णु को छोड़कर संपूर्ण ब्रह्मांडीय संरचना की अनित्यता को सिद्ध करता है।

विष्णु तत्त्व की असीमता एवं परम स्थिति

ब्रह्मांड की संरचना और त्रिगुणों के प्रभाव का वर्णन करने के पश्चात्, महर्षि पराशर परम सत्य (विष्णु तत्त्व) के अद्वैत स्वरूप का प्रतिपादन करते हैं।

परम ब्रह्म का स्वरूप: वह परम तत्त्व (ब्रह्म) ही विष्णु की सर्वोच्च स्थिति है, जो समस्त दृश्य और अदृश्य का सार है। यह वह तत्त्व है जिसके साथ सब कुछ एकरूप है, और जिससे सभी चेतन और अचेतन अस्तित्व व्युत्पन्न होते हैं।

अद्वैत का प्रतिपादन: वे ही आदि प्रकृति हैं। गोचर (प्रत्यक्ष) रूप में वे ही यह जगत हैं, और अंततः सब कुछ उन्हीं में विलीन हो जाता है। सब कुछ उन्हीं के माध्यम से धारण किया जाता है और स्थायी रहता है।

विष्णु पुराण का यह सिद्धांत त्रिगुणों के परिचालन में त्रिदेवों की भूमिका को स्पष्ट करता है, जहाँ विष्णु केवल पालक नहीं, अपितु गुणातीत परम तत्त्व हैं। ब्रह्मा, रुद्र और त्रिगुणों का संपूर्ण खेल (सृष्टि, स्थिति, संहार) उनकी शक्ति (वैष्णवी शक्ति) का प्रकटीकरण मात्र है।

वैष्णवी शक्ति द्वारा त्रिगुणों का परिचालन एवं त्रिदेव का दार्शनिक सम्बन्ध
वैष्णवी शक्ति का कार्य त्रिदेव स्वरूप प्रमुख गुण कार्य की प्रकृति विष्णु तत्त्व से सम्बन्ध (अध्याय 7)
सृष्टि (उत्पत्ति) ब्रह्मा रजस् गति एवं निर्माण विष्णु की क्रियाशील शक्ति, जिसके माध्यम से मानसी सृष्टि होती है और वंशवृद्धि होती है।
स्थिति (पालन) विष्णु सत्त्व संरक्षण एवं संतुलन विष्णु का विशुद्ध स्वरूप, जो गुणों के अधीन हुए जगत को भी धारण करता है और मोक्ष का आधार है।
संहार (लय) रुद्र तमस् आवरण एवं विनाश विष्णु की संहारक शक्ति, जो ब्रह्मा के क्रोध से प्रकट होकर द्वैत को समाप्त करती है और लय लाती है।

विष्णु की सर्वव्यापकता का चरम वर्णन इस प्रकार है: वे ही अनुष्ठान (यज्ञ) के कर्ता हैं; वे ही अनुष्ठान (क्रिया) हैं; वे ही वह फल (पुण्य) हैं जो अनुष्ठान प्रदान करता है; और वे ही वह उपकरण (साधन) हैं जिसके द्वारा वह सम्पन्न किया जाता है ।

यह परम सत्य है कि उस असीम हरि (विष्णु) के अलावा कुछ भी नहीं है। जो योगी इस रहस्य को समझ लेता है, वह यह जान जाता है कि उसे बाहरी अनुष्ठानों या ग्रंथों के अध्ययन की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह ज्ञान सीधे आत्यन्तिक प्रलय (परम मुक्ति) की ओर ले जाता है।

६. उपसंहार एवं परम फलश्रुति

गुणातीत ज्ञान का महत्त्व

श्रीविष्णु पुराण के प्रथम अंश का यह सातवाँ अध्याय इस परम शिक्षा पर समाप्त होता है कि जीवात्मा को संसार में प्रचलित त्रिगुणों के बंधन (सत्त्व से सुख, रजस् से कर्म, तमस् से अज्ञान) को पहचानना चाहिए और निरंतर आध्यात्मिक प्रयास द्वारा उनका अतिक्रमण करना चाहिए।

गुणातीत स्थिति प्राप्त करने का उपाय केवल भगवान की अनन्य भक्ति में निहित है। जो मनुष्य हर परिस्थिति में बिना विचलित हुए, पूर्ण रूप से अनन्य भाव से भगवान विष्णु की भक्ति में स्थिर रहता है, वह भक्त प्रकृति के तीनों गुणों को अति शीघ्र पार करके ब्रह्म पद पर स्थित हो जाता है।

वह अविनाशी ब्रह्म पद (अमृत स्वरूप), शाश्वत धर्म स्वरूप और परम आनंद स्वरूप है। भगवान श्रीविष्णु ही उस परम पद के एकमात्र आश्रय हैं।

यह ज्ञान उन सभी प्राणियों के लिए कल्याणकारी है जो जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होना चाहते हैं। जो प्राणी इन तीनों गुणों को एक साथ नियंत्रित कर अनन्य भाव से संकीर्तन अथवा भक्ति करता है, वह जीवित रहते हुए समस्त सुखों को प्राप्त करता है, और मृत्यु के उपरान्त बिना किसी बाधा के सीधे मोक्ष को प्राप्त होता है। वह जीवन-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

अध्याय की फलश्रुति

महर्षि पराशर ने मैत्रेय को यह दिव्य तत्त्वज्ञान प्रदान कर, परम पद की प्राप्ति का मार्ग स्पष्ट किया है। यह ज्ञान उन वैष्णवी शक्तियों का विवरण देता है जो सृष्टि, स्थिति और विनाश का कारण हैं, और साथ ही यह भी बताता है कि इन शक्तियों के त्रिगुणमयी प्रभाव को कैसे पार किया जा सकता है।

परम पद की प्राप्ति के बाद, जीवात्मा फिर कभी भी जन्म-मरण आदि के चक्र में नहीं पड़ता है। यह आत्यन्तिक प्रलय की अवस्था है, जहाँ आत्मा शुद्ध रूप से विष्णु तत्त्व में विलीन हो जाती है।

इति श्री विष्णुपुराणे प्रथमेऽंशे सप्तमोऽध्यायः।
(इस प्रकार, श्री विष्णु पुराण के प्रथम अंश का यह सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।)

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