विस्तृत उत्तर
संध्यावन्दन में गायत्री जप के साथ ध्यान अनिवार्य अंग है। मंत्रजप बिना ध्यान के अधूरा माना गया है।
ध्यान का स्थान
प्राणायाम और अघमर्षण के बाद, गायत्री जप से पूर्व और जप के दौरान ध्यान किया जाता है।
ध्यान विधि
1गायत्री देवी का ध्यान (सगुण)
कुछ परम्पराओं में गायत्री देवी के रूप का ध्यान किया जाता है:
- ▸प्रातः: बालरूप गायत्री (ब्रह्माणी) — लाल वर्ण, हंस वाहन।
- ▸मध्याह्न: युवारूप सावित्री (वैष्णवी) — श्वेत वर्ण, गरुड वाहन।
- ▸सायं: वृद्धरूप सरस्वती (शाम्भवी) — कृष्ण वर्ण, वृषभ वाहन।
(ये रूप भिन्न शाखाओं में भिन्न हो सकते हैं।)
2सविता/सूर्य मण्डल का ध्यान
ॐ ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः।
सूर्य मण्डल के मध्य में विराजमान नारायण का ध्यान करें।
3निर्गुण ध्यान (अद्वैत)
आदि शंकराचार्य परम्परा में आत्मतत्व (सत्-चित्-आनन्द ब्रह्म) का ध्यान:
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम्।
4ध्यान की व्यावहारिक विधि
- ▸आँखें बन्द करें।
- ▸श्वास सामान्य रखें।
- ▸भ्रूमध्य (आज्ञा चक्र) या हृदय पर ध्यान केन्द्रित करें।
- ▸गायत्री मंत्र जपते हुए सविता (सूर्य/प्रकाश) की भावना करें — 'तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि' — उस सविता के दिव्य तेज का ध्यान करें।
- ▸'धियो यो नः प्रचोदयात्' — वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे — यह भावना रखें।
जप संख्या
28, 32, 54 या 108 बार गायत्री मंत्र जप। ओठ हिलें, स्वर सूक्ष्म हो — 'उपांशु जप'।
उद्देश्य
मन को ईश्वर में स्थिर करना, बुद्धि शुद्धि, और आत्मबोध।




