विस्तृत उत्तर
संध्यावन्दन दिन में तीन बार — प्रातः, मध्याह्न और सायं — करने का विधान है। प्रातः और सायं संध्या में मूल प्रक्रिया समान है, किन्तु कुछ महत्वपूर्ण भेद हैं।
समानताएँ
दोनों में आचमन, शिखा बन्धन, प्राणायाम, मार्जन, प्राशन, अघमर्षण, गायत्री जप, और समर्पण — ये मुख्य अंग समान हैं।
प्रमुख अन्तर
1समय
- ▸प्रातः संध्या: सूर्योदय से कुछ पूर्व आरम्भ कर सूर्य दिखने तक। आदर्श समय ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से ~1.5 घंटे पहले)।
- ▸सायं संध्या: सूर्यास्त के समय, जब तक तारे न दिखें।
2दिशा
- ▸प्रातः: पूर्व दिशा की ओर मुख।
- ▸सायं: पश्चिम दिशा की ओर मुख (सूर्यास्त की दिशा)।
3अर्घ्य
- ▸प्रातः: उगते सूर्य को अर्घ्य — सूर्य देवता की स्तुति प्रधान।
- ▸सायं: अस्त होते सूर्य को अर्घ्य — वरुण देवता की उपासना प्रधान।
4उपस्थान (देवता स्तुति)
- ▸प्रातः: मित्र देवता का उपस्थान ('मित्रस्य चर्षणीधृतः...')।
- ▸सायं: वरुण देवता का उपस्थान ('इमं मे वरुण...')।
5गायत्री जप
दोनों संध्याओं में गायत्री मंत्र जप समान — 28, 32, 54 या 108 बार। किन्तु प्रातः में गायत्री का 'बाल रूप' और सायं में 'वृद्ध रूप' का ध्यान करने की परम्परा कुछ शाखाओं में है।
6माध्याह्निक (तीसरी संध्या)
मध्याह्न में भी संध्या का विधान है — सूर्य के मध्य में रहते हुए। इसमें सविता/सूर्य का उपस्थान होता है। यह प्रायः लघु रूप में की जाती है।
मनुस्मृति में
ब्राह्मण के लिए त्रिकाल संध्या अनिवार्य नित्यकर्म है। 'संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु' — जो संध्या नहीं करता वह अपवित्र है।





