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संध्या वंदन में मार्जन प्राशन और अघमर्षण क्या है?

मार्जन = जल छिड़ककर बाह्य शुद्धि ('ॐ आपो हि ष्ठा. . . ' मंत्र से शरीर पर)। प्राशन = जल का आचमन करके आन्तरिक शुद्धि।

संक्षिप्त उत्तर

मार्जन = जल छिड़ककर बाह्य शुद्धि ('ॐ आपो हि ष्ठा...' मंत्र से शरीर पर)। प्राशन = जल का आचमन करके आन्तरिक शुद्धि। अघमर्षण = 'ॐ ऋतं च सत्यं च...' मंत्र से पाप नाश — हाथ में जल लेकर, नासिका से लगाकर, पाप बाहर निकालने की भावना से बाईं ओर फेंकें। तीनों = गायत्री जप की तैयारी।

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विस्तृत उत्तर

मार्जन, प्राशन और अघमर्षण संध्यावन्दन के प्रारम्भिक शुद्धिकरण अंग हैं। ये पंचकोष (आचमन, शिखाबन्धन, प्राणायाम, अघमर्षण, न्यास) में सम्मिलित हैं।

1मार्जन (शुद्धिकरण हेतु जल छिड़कना)

मार्जन' का अर्थ है शुद्ध करना/धोना। इसमें:
  • ▸वैदिक मंत्रों ('ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः...' — 9 मंत्र) का पाठ करते हुए शरीर, आसन और पूजा सामग्री पर जल छिड़का जाता है।
  • ▸फिर 'ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः...' मंत्र से मस्तक पर जल छिड़कते हैं।
  • ▸यह बाह्य शुद्धि का प्रतीक है — जैसे स्नान से शरीर शुद्ध होता है, मार्जन से सूक्ष्म अशुद्धियाँ दूर होती हैं।

2प्राशन (जल का आचमन)

प्राशन' का अर्थ है पान करना/ग्रहण करना। इसमें:
  • ▸हथेली में जल लेकर विशिष्ट मंत्र के साथ आचमन (जल पीना) किया जाता है।
  • ▸यह आन्तरिक शुद्धि का प्रतीक है — शरीर के भीतर की अशुद्धियों का निवारण।
  • ▸मंत्र: 'ॐ सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च...' (सूर्य और मन्यु देवता से प्रार्थना कि मेरे पापों का नाश हो)।

3अघमर्षण (पापों का नाश)

अघ' = पाप, 'मर्षण' = नाश करना। अघमर्षण = पापों का नष्ट करना।

विधि:

  • ▸दाहिने हाथ में जल लेकर बाएँ हाथ से ढकें।
  • ▸गायत्री या अघमर्षण सूक्त ('ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत...') का तीन बार पाठ करें।
  • ▸भावना करें कि जल नासिका के बाएँ छिद्र से भीतर जाकर अन्तःकरण के पापों को दाएँ छिद्र से बाहर निकाल रहा है।
  • ▸उस जल को बिना देखे बाईं ओर भूमि पर फेंक दें (शिला पर पाप को पटककर नष्ट करने की भावना)।

तीनों का सम्मिलित उद्देश्य

मार्जन = बाह्य शुद्धि, प्राशन = आन्तरिक शुद्धि, अघमर्षण = पाप नाश। ये तीनों मिलकर साधक को गायत्री जप के योग्य पवित्र बनाते हैं।

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