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छठ पूजा (सूर्य षष्ठी) व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक एवं प्रामाणिक पाठ

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श्री सूर्य षष्ठी (छठ पूजा) व्रत की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा

१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ

कथा-श्रवण का पारंपरिक विधानात्मक संदर्भ

सनातन धर्म की अत्यंत प्राचीन और लोक-आस्था के महापर्व श्री सूर्य षष्ठी (छठ पूजा) के पावन अवसर पर, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को अस्ताचलगामी भगवान सूर्यनारायण को प्रथम अर्घ्य समर्पित करने के उपरांत अथवा रात्रिकाल में वेदी के समीप जागरण करते समय इस परम पुनीत व्रत कथा का श्रवण किया जाता है । यह कथा केवल एक आख्यान नहीं है, अपितु इसे साक्षात् फलदायिनी श्रुति के रूप में मान्यता प्राप्त है। पारंपरिक विधानानुसार, कथा श्रवण से पूर्व सभी व्रती और श्रद्धालु पवित्र जल से आचमन करते हैं। तत्पश्चात अपने दाहिने हाथ में पवित्र अक्षत (चावल), पुष्प, कुशा और थोड़ा सा जल धारण कर अत्यंत एकाग्रचित्त और श्रद्धाभाव से इस कथा का श्रवण करते हैं । कथा की पूर्णता पर हाथों में धारण किए गए इस अक्षत और पुष्प को छठी मैया (षष्ठी देवी) की वेदी और सूप पर अर्पित कर दिया जाता है। लोक परंपरा में यह दृढ़ मान्यता है कि इस कथा के श्रवण के बिना श्री सूर्य षष्ठी का यह महान व्रत पूर्ण नहीं माना जाता ।

पारंपरिक आरंभिक आह्वान एवं मंगलाचरण

कथा का आरंभ सर्वदा देवताओं के आवाहन और मंगलाचरण से होता है। कथावाचक अथवा घर के वयोवृद्ध सदस्य कथा का आरंभ इन पारंपरिक वाक्यों के साथ करते हैं:

"ॐ श्री गणेशाय नमः। ॐ श्री सूर्याय नमः। ॐ श्री षष्ठी देव्यै नमः।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी॥

हे प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्यनारायण! हे चराचर जगत को जीवन देने वाले भास्कर! हे ब्रह्मा की मानस पुत्री, प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने वाली, बालकों की रक्षिका और नि:संतानों को संतान सुख प्रदान करने वाली हे भगवती देवसेना (छठी मैया)! हम आपका स्मरण करते हुए आपकी इस पावन और प्राचीन व्रत कथा का आरंभ कर रहे हैं। जिस प्रकार प्राचीन काल में आपने राजा प्रियव्रत, महारानी द्रौपदी, सुकन्या और दानवीर कर्ण के घोर संकटों का हरण किया, उसी प्रकार इस कथा को कहने वाले, हुंकारा भरने वाले और सुनने वाले सभी व्रतियों और भक्तों का कल्याण करना। सबके घर में सुख, शांति, संतति और समृद्धि का वास हो।"

छठ पूजा से संबंधित विभिन्न कल्पों और युगों की जो कथाएँ पारंपरिक व्रत-ग्रंथों, पुराणों और लोक-प्रचलित प्रामाणिक पाठों में उपलब्ध हैं, उनका क्रमबद्ध विवरण इस प्रकार है:

कथा का पारंपरिक संस्करण मुख्य पात्र पौराणिक/शास्त्रीय स्रोत मुख्य प्रसंग एवं फल
राजा प्रियव्रत की कथा राजा प्रियव्रत, रानी मालिनी, षष्ठी देवी ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खण्ड) मृत शिशु का पुनर्जीवन, संतान सुख की प्राप्ति एवं षष्ठी पूजा का लोक-प्रचलन ।
द्रौपदी एवं धौम्य ऋषि संवाद द्रौपदी, युधिष्ठिर, धौम्य ऋषि, भगवान सूर्य महाभारत (वन पर्व) / भविष्य पुराण अठासी हजार ऋषियों का सत्कार, अक्षय पात्र की प्राप्ति एवं खोए हुए राज्य की पुनर्प्राप्ति ।
सुकन्या एवं महर्षि च्यवन प्रसंग राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या, महर्षि च्यवन पौराणिक कथा / लोक परंपरा अंधत्व निवारण, वृद्ध शरीर का यौवन में परिवर्तन एवं पतिव्रता धर्म की रक्षा ।
दानवीर कर्ण की सूर्योपासना सूर्यपुत्र कर्ण (अंग देश के राजा) महाभारत / लोक कथा अर्घ्य दान की परंपरा का आरंभ, अजेय योद्धा बनने का वरदान एवं विपुल दान-पुण्य ।
श्री राम एवं माता सीता का व्रत भगवान श्री राम, माता सीता, मुद्गल ऋषि रामायण / लोक-प्रचलित पाठ रामराज्य की स्थापना, कुलदेवता की उपासना एवं राज्याभिषेक से पूर्व का शुद्धिकरण ।

२. मुख्य कथा: प्रथम खण्ड - राजा प्रियव्रत एवं षष्ठी देवी (छठी मैया) की प्रामाणिक कथा

यह परम पावन कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड से अवतरित है । इस कथा के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि लोक में भगवती षष्ठी (छठी मैया) की उपासना का प्राकट्य और सूर्य षष्ठी व्रत का आरंभ किस प्रकार हुआ。

राजा प्रियव्रत का परिचय एवं संतान-संकट

प्राचीन काल की बात है, स्वायम्भुव मनु के वंश में राजा प्रियव्रत नाम के एक अत्यंत प्रतापी, धर्मनिष्ठ और प्रजापालक चक्रवर्ती सम्राट हुए । राजा प्रियव्रत ने अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी और वे एक आदर्श शासक के रूप में संपूर्ण पृथ्वी पर शासन करते थे । राजा का विवाह अत्यंत रूपवती, शीलवान और गुणवान कन्या मालिनी के साथ संपन्न हुआ था। राजा प्रियव्रत के राज्य में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी। प्रजा पूर्ण रूप से सुखी थी और सर्वत्र धर्म का शासन था。

परंतु, इस अथाह ऐश्वर्य और सुख के मध्य राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी के जीवन में एक घोर और असहनीय दुःख था। विवाह के अनेक वर्ष व्यतीत हो जाने के पश्चात भी उनके घर में किसी संतान की किलकारी नहीं गूँजी थी । संतान के अभाव में उनका वह विशाल महल उन्हें सूना प्रतीत होता था। नि:संतान होने की पीड़ा से राजा और रानी दोनों अत्यंत दुखी, शोकाकुल और निराश रहते थे। उन्हें यह चिंता सताती रहती थी कि उनके पश्चात इस विशाल साम्राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा और उन्हें मृत्यु के उपरांत पिण्डदान कौन करेगा。

महर्षि कश्यप का मार्गदर्शन एवं पुत्रेष्टि यज्ञ

पुत्र प्राप्ति की तीव्र लालसा और अपने इस दारुण दुःख के निवारण हेतु राजा प्रियव्रत ने अनेक दान-पुण्य किए, परंतु कोई लाभ न हुआ। अंततः, निराश होकर वे परम ज्ञानी महर्षि कश्यप के आश्रम में पहुँचे और उनके चरणों में गिरकर अपने नि:संतान होने का दुःख प्रकट किया。

महर्षि कश्यप ने अपने दिव्य ज्ञान और योग दृष्टि से राजा के प्रारब्ध का अवलोकन किया। उन्होंने राजा को सांत्वना देते हुए कहा, "हे राजन! आप शोक न करें। ईश्वर की कृपा से आपके भाग्य में संतान का योग अवश्य है, परंतु इसके लिए आपको एक विशेष अनुष्ठान करना होगा। आप अपनी पत्नी मालिनी के साथ पूर्ण विधि-विधान और पवित्रता के साथ 'पुत्रेष्टि यज्ञ' (संतान प्राप्ति का यज्ञ) का आयोजन करें।"

महर्षि कश्यप के दिशा-निर्देशन और सान्निध्य में राजा प्रियव्रत ने अपने राज्य में एक अत्यंत विशाल और भव्य पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ में अनेक वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया। अग्निदेव को आहुतियाँ दी गईं और देवताओं का पूर्ण विधि से आवाहन किया गया। यज्ञ के निर्विघ्न संपन्न होने के पश्चात, महर्षि कश्यप ने मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित किया हुआ यज्ञ का पवित्र प्रसाद (चरु अथवा खीर) रानी मालिनी को ग्रहण करने के लिए प्रदान किया ।

मृत शिशु का जन्म एवं राजा का विलाप

यज्ञ के प्रसाद को अत्यंत श्रद्धापूर्वक ग्रहण करने के परिणामस्वरूप, ईश्वर की कृपा से रानी मालिनी गर्भवती हुईं । इस शुभ समाचार से पूरे राज्य में हर्षोल्लास की लहर दौड़ गई। प्रजा अपने भावी राजा के जन्म की प्रतीक्षा करने लगी। राजा प्रियव्रत ने भी अत्यधिक प्रसन्न होकर ब्राह्मणों को गोदान और स्वर्ण दान किए。

नौ मास की अवधि पूर्ण होने पर प्रसव का समय आया। परंतु नियति का विधान और प्रारब्ध का खेल कुछ और ही था—रानी मालिनी के गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह जन्म से ही मृत था । नवजात शिशु के शरीर में प्राणों का कोई संचार नहीं था。

यह दारुण दृश्य देखकर रानी मालिनी चीत्कार कर उठीं और विलाप करते हुए मूर्छित हो गईं। पूरे महल में जहाँ कुछ क्षण पूर्व उत्सव का वातावरण था, वहाँ हाहाकार मच गया। जब राजा प्रियव्रत को यह दुखद समाचार मिला, तो उनके हृदय पर मानो वज्रपात हो गया। उनका शोक से विदीर्ण हृदय इस असीम पीड़ा को सहन न कर सका। जीवन की समस्त आशाएँ अंधकार में विलीन हो गईं。

पुत्र-शोक में पूर्णतः सुध-बुध खो चुके राजा प्रियव्रत ने अपने उस प्राणहीन मृत शिशु को अपनी छाती से लगा लिया और विलाप करते हुए श्मशान घाट की ओर चल पड़े । श्मशान पहुँचकर राजा प्रियव्रत ने रुदन करते हुए कहा, "हे ईश्वर! यह कैसा कठोर न्याय है? पहले तो मुझे जीवन भर संतान के सुख से वंचित रखा, और जब संतान दी भी, तो मृत! इस प्राणहीन देह को लेकर मैं क्या करूँ? अब इस नि:संतान जीवन को जीने का मेरा कोई उद्देश्य शेष नहीं रह गया है। इस दारुण दुःख से तो मेरी मृत्यु ही भली है।" वियोग की इस चरम सीमा पर, अत्यंत नैराश्य में डूबकर राजा प्रियव्रत ने अपने मृत पुत्र के साथ स्वयं भी अपने प्राण त्यागने का दृढ़ संकल्प ले लिया ।

भगवती देवसेना (षष्ठी देवी) का प्राकट्य एवं कृपा

जैसे ही राजा प्रियव्रत अपने प्राण विसर्जित करने के लिए उद्यत हुए, उसी क्षण एक अद्भुत और अलौकिक घटना घटी। संपूर्ण श्मशान घाट एक दिव्य और तेजोमय प्रकाश से भर गया। उस दिव्य प्रकाश के मध्य, एक अत्यंत सुंदर, करुणामय और वात्सल्य से परिपूर्ण देवी एक मणिमय विमान में बैठकर राजा के समक्ष प्रकट हुईं । देवी का मुखमंडल करोड़ों सूर्यों के समान दीप्तिमान था और उनके नेत्रों से असीम करुणा प्रवाहित हो रही थी。

अत्यंत विस्मित, चकित और नतमस्तक होकर राजा प्रियव्रत ने देवी के चरणों में प्रणाम किया और अश्रुपूर्ण नेत्रों से पूछा, "हे दिव्य स्वरूपिणी! हे करुणामयी माता! आप कौन हैं? आपके दर्शन मात्र से ही मेरा हृदय एक विचित्र शांति का अनुभव कर रहा है। कृपया अपना परिचय दें।"

तब भगवती ने अत्यंत मधुर और अमृतमयी वचनों में अपना परिचय देते हुए कहा: "हे राजन! मैं परब्रह्म की मानस पुत्री हूँ। मेरी उत्पत्ति सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश (षष्ठांश) से हुई है, इसी कारण समस्त लोकों में मुझे 'षष्ठी देवी' के नाम से जाना जाता है । मातृकाओं में मैं परम श्रेष्ठ मानी जाती हूँ। मैं भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की पत्नी 'देवसेना' हूँ । प्रत्येक लोक में शिशुओं का पालन, संरक्षण और उनकी आयु की वृद्धि करना मेरा ही प्रधान कार्य है। मैं विष्णुभक्ता हूँ और प्रकृति का छठा अंश होने के कारण बालकों की रक्षिका हूँ । मैं नि:संतान दंपतियों को उनके पुण्यों और भक्ति के प्रभाव से संतान का सुख प्रदान करती हूँ। जो भी प्राणी सच्चे मन, शुद्ध श्रद्धा और पवित्रता के साथ मेरी उपासना करता है, मैं उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हूँ।"

इतना कहकर परम वात्सल्यमयी षष्ठी देवी ने आगे बढ़कर राजा प्रियव्रत के उस मृत शिशु को अपने दिव्य हाथों में ले लिया। माता के पावन और अमृतमय स्पर्श मात्र से ही वह मृत बालक तत्काल जीवित हो उठा । बालक ने अपने नेत्र खोल दिए और माता को देखकर मुस्कुराने लगा。

राजा प्रियव्रत की आँखों से आनंद और कृतज्ञता के अश्रु बह निकले। उन्होंने साष्टांग दंडवत होकर देवी षष्ठी की स्तुति की। देवी ने प्रसन्न होकर राजा से कहा, "हे राजन! तुम पृथ्वी पर मेरी पूजा का प्रचार-प्रसार करो और स्वयं भी प्रतिवर्ष मेरी उपासना करो, जिससे संसार के अन्य दुखी और नि:संतान प्राणियों का भी कल्याण हो सके।"

संकट-निवारण एवं षष्ठी व्रत का लोक-प्रचलन

माता की आज्ञा को शिरोधार्य कर राजा प्रियव्रत अपने जीवित और पूर्ण स्वस्थ पुत्र को लेकर हर्षोल्लास के साथ महल लौट आए। जब रानी मालिनी और प्रजा ने मृत बालक को जीवित देखा, तो सभी ने परम आश्चर्य और आनंद का अनुभव किया。

घर लौटकर राजा प्रियव्रत ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को अत्यंत निष्ठा, कठोर नियमों, पवित्रता और पूर्ण विधि-विधान के साथ षष्ठी देवी (छठी मैया) और प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य की संयुक्त उपासना की । राजा प्रियव्रत द्वारा प्रारंभ की गई इस महान पूजा के प्रभाव से उनके राज्य में सभी के दुःख दूर हुए। तभी से यह लोक-मान्यता स्थापित हो गई कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन जो भी व्यक्ति सूर्य देव और छठी मैया का यह कठिन व्रत करता है, उसकी संतान की रक्षा होती है, नि:संतानों को पुत्र-रत्न की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है ।


३. मुख्य कथा: द्वितीय खण्ड - महारानी द्रौपदी एवं धौम्य ऋषि का प्रसंग (महाभारत काल)

महाभारत काल से जुड़ी यह परम प्रामाणिक कथा यह दर्शाती है कि अत्यंत कठिन और विकट परिस्थितियों में भी भगवान सूर्यनारायण और छठी मैया की आराधना किस प्रकार संकट-निवारण करती है और असंभव को संभव बना देती है । यह कथा विशेष रूप से पारिवारिक कल्याण, खोई हुई संपत्ति की पुनर्प्राप्ति और घोर विपत्तियों के नाश के लिए सुनी जाती है ।

पांडवों का राज्य-संकट एवं वनवास

द्वापर युग की बात है, कौरवों के साथ हुई द्यूत क्रीड़ा (जुए) में धर्मराज युधिष्ठिर छल के शिकार हुए और अपना संपूर्ण राज्य, इंद्रप्रस्थ का ऐश्वर्य, धन-वैभव और समस्त राजपाट हार गए । हार की शर्त के अनुसार, पांचों पांडवों (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव) को अपनी अर्धांगिनी महारानी द्रौपदी के साथ बारह वर्ष का कठोर वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगने के लिए विवश होना पड़ा。

वन के उस अत्यंत विकट और कष्टदायी जीवन में, जो पांडव कभी महलों में स्वर्ण शय्या पर शयन करते थे, वे अब भूमि पर शयन करते थे। उनके पास न तो कोई सेवक था और न ही कोई राजसी सुविधा। वे अत्यंत अभाव और सादगी में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे ।

अठासी हजार ऋषियों का आगमन एवं युधिष्ठिर की चिंता

उसी वनवास काल के दौरान एक दिन एक महान संकट आन पड़ा। अचानक अठासी हजार (88,000) ऋषि-मुनियों का एक विशाल समूह तीर्थाटन करता हुआ पांडवों के उस वन-आश्रम में आ पहुँचा ।

महाराज युधिष्ठिर धर्म के साक्षात् अवतार माने जाते थे और अतिथि सत्कार उनका सर्वोपरि धर्म था। परंतु उस निर्जन वन में, जहाँ उनके स्वयं के भोजन का कोई निश्चित प्रबंध नहीं था, उनके पास न तो अन्न का इतना भण्डार था और न ही कोई साधन जिससे वे इतने विशाल ऋषि समुदाय का आतिथ्य सत्कार कर सकें और उन्हें भरपेट भोजन करा सकें। महाराज युधिष्ठिर अत्यंत चिंतित और शोकाकुल हो गए कि यदि ब्राह्मणों और ऋषियों का सत्कार न हुआ, तो वे रुष्ट हो सकते हैं और उनका शाप पांडवों के बचे-खुचे पुण्यों को भी भस्म कर देगा । युधिष्ठिर की इस विवशता और घबराहट को देखकर सभी भाई मौन और उदास हो गए。

महारानी द्रौपदी का महर्षि धौम्य से संवाद

अपने पतियों की यह व्याकुलता, असहाय स्थिति और धर्म-संकट देखकर पतिव्रता महारानी द्रौपदी अत्यंत दुखी हुईं। उन्होंने अपने कुल पुरोहित और परम ज्ञानी महर्षि धौम्य को स्मरण किया । महर्षि धौम्य के समक्ष उपस्थित होकर द्रौपदी ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता और करुणा से प्रार्थना की:

"हे ऋषिवर! हे परमज्ञानी! हमारे समक्ष यह घोर संकट आन पड़ा है। हम साधनहीन वनवासी किस प्रकार इन अठासी हजार मुनियों का भरण-पोषण करें? हमारे पास अन्न का एक दाना भी शेष नहीं है। कृपया अपने तपोबल और ज्ञान से कोई ऐसा मार्ग या कोई ऐसा व्रत बताएँ जिससे हमारे इस दारुण दुःख और संकट का तत्काल अंत हो। कोई ऐसा उपाय बताएँ जिससे हम ब्राह्मणों व ऋषियों को भोजन कराने में समर्थ हो सकें, और हमारे परिवार का कल्याण हो तथा हमारा खोया हुआ राजपाट और धन-वैभव हमें पुनः प्राप्त हो सके।"

महर्षि धौम्य का उपदेश एवं रवि-षष्ठी व्रत का विधान

द्रौपदी की यह करुण पुकार सुनकर महर्षि धौम्य ने कुछ क्षण के लिए अपने नेत्र बंद किए और ध्यान लगाया। तत्पश्चात उन्होंने अत्यंत शांत और आश्वस्त करने वाले स्वर में कहा:

"हे कल्याणी पांचाली! तुम तनिक भी चिंता न करो। इस संसार में ऐसा कोई संकट नहीं है जिसका निवारण प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्यनारायण और उनकी बहन षष्ठी देवी की उपासना से न हो सके। सूर्य देव चराचर जगत के पालनहार हैं। तुम कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान सूर्य का 'रवि-षष्ठी' (छठ) व्रत पूर्ण निष्ठा के साथ करो । प्राचीन काल में इस परम पुण्यदायी व्रत को अनेक तपस्वियों, नागकन्याओं और राजघरानों ने किया है। इस व्रत को पूर्ण शुद्धता, सात्विकता और निष्ठा से करने पर सूर्य देव अवश्य प्रसन्न होंगे और तुम्हारी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करेंगे।"

द्रौपदी की घोर तपस्या एवं भगवान सूर्य का वरदान

महर्षि धौम्य के उपदेश और आज्ञानुसार, महारानी द्रौपदी ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी (नहाय-खाय) से लेकर सप्तमी (पारण) तक अत्यंत कठोर नियमों का पालन करते हुए सूर्य षष्ठी (छठ) का व्रत किया । द्रौपदी ने पूर्ण निर्जला उपवास रखा। अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य के समय द्रौपदी ने नदी के शीतल जल में अपनी कमर तक प्रवेश किया और घंटों जल में खड़े रहकर पूर्ण श्रद्धा और शुद्ध मन से सूर्य देव को अर्घ्य समर्पित किया तथा छठी मैया की भावपूर्ण आराधना की ।

द्रौपदी की इस अनन्य भक्ति, शुद्ध मन और कठोर तपस्या से भगवान सूर्यनारायण अत्यंत प्रसन्न हुए। सूर्य देव ने द्रौपदी को साक्षात् दर्शन दिए और उनकी सभी समस्याओं को दूर करने का अमोघ आशीर्वाद दिया। सूर्य देव की कृपा से द्रौपदी को एक ऐसा दिव्य 'अक्षय पात्र' (कभी न खाली होने वाला बर्तन) प्राप्त हुआ, जिसमें से भोजन कभी समाप्त नहीं होता था ।

उस अक्षय पात्र के प्रताप से द्रौपदी ने अठासी हजार ऋषियों को अत्यंत स्वादिष्ट और तृप्तिदायक भोजन कराया । ऋषियों ने प्रसन्न होकर पांडवों को आशीर्वाद दिया। इसी महान छठ व्रत के निरंतर प्रभाव और सूर्य देव के आशीर्वाद स्वरूप पांडवों को नव-ऊर्जा, असीम शक्ति और देव-कृपा प्राप्त हुई। अंततः महाभारत के धर्मयुद्ध में पांडवों ने कौरवों पर विजय प्राप्त की और अपना खोया हुआ राज्य, सम्मान और राजलक्ष्मी पुनः प्राप्त की ।


४. मुख्य कथा: तृतीय खण्ड - सुकन्या और महर्षि च्यवन की कथा

जब महर्षि धौम्य महारानी द्रौपदी को सूर्य षष्ठी व्रत करने का उपदेश दे रहे थे, तब उन्होंने इस व्रत की अति-प्राचीनता, अमोघ शक्ति और महिमा को पुष्ट करने हेतु राजपुत्री सुकन्या और भार्गव च्यवन ऋषि का यह परम प्रसिद्ध आख्यान द्रौपदी को सुनाया था । यह कथा सिद्ध करती है कि यह व्रत असाध्य रोगों को भी दूर करने वाला है。

राजा शर्याति का वन-विहार एवं एक भयानक भूल

अति प्राचीन काल की बात है, आनर्त देश के अत्यंत प्रतापी और सूर्यवंशी राजा शर्याति हुआ करते थे । राजा शर्याति की एक अत्यंत रूपवती, चंचल और गुणवान पुत्री थी, जिसका नाम सुकन्या था。

एक बार राजा शर्याति अपनी पुत्री सुकन्या, अपने मंत्रियों और अपनी विशाल सेना के साथ एक वन में विहार (भ्रमण) के लिए गए। जिस सघन वन में राजा ने अपना राजसी शिविर लगाया था, उसी वन के एक एकांत कोने में भार्गव कुल के महान तपस्वी च्यवन ऋषि घोर तपस्या में लीन थे । महर्षि च्यवन इतने दीर्घकाल से उस स्थान पर बिना हिले-डुले समाधिस्थ थे कि उनके शरीर के ऊपर दीमकों और चींटियों ने मिट्टी की एक विशाल बांबी (मिट्टी का ढेर) बना ली थी। उस मिट्टी के ढेर के भीतर ऋषि का पूरा शरीर छिप गया था, केवल उनकी दो चमकती हुई आँखें किसी जुगनू या तारे के समान दिखाई दे रही थीं ।

राजकुमारी सुकन्या अपनी सखियों के साथ खेलते-कूदते और वन के पुष्पों को निहारते हुए उसी स्थान पर जा पहुँची जहाँ च्यवन ऋषि तपस्या कर रहे थे। सुकन्या ने जब उस ऊँचे मिट्टी के ढेर के भीतर दो चमकती हुई वस्तुओं को देखा, तो वह बाल-सुलभ कौतूहल और अज्ञानतावश उन्हें कोई अद्भुत कीड़ा या चमकता हुआ जुगनू समझ बैठी। जिज्ञासा के वशीभूत होकर सुकन्या ने तुरंत पास की एक झाड़ी से एक तीखा काँटा उठाया और उन दोनों चमकती हुई आँखों में चुभो दिया ।

काँटा चुभते ही महर्षि की समाधि टूट गई और मिट्टी के उस ढेर से तीव्र गति से लाल रक्त की धारा बह निकली । यह वीभत्स दृश्य देखकर और किसी के कराहने की ध्वनि सुनकर सुकन्या अत्यंत भयभीत हो गई। वह काँपती हुई दौड़कर अपने पिता राजा शर्याति के पास पहुँची और रोते हुए सारा वृत्तांत कह सुनाया。

राजा शर्याति को जैसे ही यह ज्ञात हुआ, वे भागते हुए उस स्थान पर आए। जब सैनिकों ने सावधानी से वह मिट्टी हटाई, तो सभी ने देखा कि महान महर्षि च्यवन आँखों से रक्त रंजित अवस्था में बैठे हैं और काँटे चुभने के कारण उनकी दृष्टि पूर्णतः जा चुकी है। यह देखकर राजा शर्याति भय से काँप उठे। उन्हें लगा कि महर्षि के क्रोध की अग्नि उनके संपूर्ण राज्य को भस्म कर देगी। राजा ने महर्षि के चरणों में गिरकर अत्यंत करुण स्वर में क्षमा याचना की。

सुकन्या का विवाह और पतिव्रता धर्म

महर्षि च्यवन ने अपने क्रोध को शांत करते हुए कहा, "हे राजन! तुम्हारी कन्या ने अज्ञानतावश ही सही, परंतु मुझे अंधा कर दिया है। अब इस वृद्धावस्था, जर्जर शरीर और अंधत्व में वन के भीतर मेरी देखभाल कौन करेगा? यदि तुम्हारी कन्या सुकन्या मेरे साथ विवाह करके आजीवन मेरी सेवा करने का प्रण ले, तो मैं इस भयंकर अपराध को क्षमा कर दूँगा, अन्यथा मेरा शाप तुम्हारे कुल का नाश कर देगा।"

राजकुमारी सुकन्या अत्यंत संस्कारवान थी। उसने अपने कृत्य का पश्चाताप करते हुए और अपने पिता तथा राज्य को शाप से बचाने के लिए सहर्ष उस वृद्ध, जर्जर और दृष्टिहीन ऋषि से विवाह करना स्वीकार कर लिया। विवाह के पश्चात राजा शर्याति भारी मन से अपनी राजधानी लौट गए。

सुकन्या ने उसी क्षण से अपने सभी राजसी वस्त्र, बहुमूल्य आभूषण और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। उसने वल्कल वस्त्र (वृक्ष की छाल) और मृगचर्म धारण कर लिया और पूर्ण पतिव्रता धर्म के साथ ऋषि च्यवन की सेवा में लीन हो गई । वह प्रतिदिन वन से कंद-मूल लाती, महर्षि को स्नान कराती और उनकी प्रत्येक आवश्यकता का ध्यान रखती。

अश्विनी कुमारों की परीक्षा एवं नागकन्याओं का उपदेश

एक दिन उस वन के मार्ग से देवताओं के वैद्य 'अश्विनी कुमार' गुजर रहे थे । उनकी दृष्टि अत्यंत रूपवती सुकन्या पर पड़ी जो मैले कपड़ों में एक वृद्ध अंधे ऋषि की सेवा कर रही थी। अश्विनी कुमारों ने सुकन्या के पास आकर कहा, "हे भद्रे! तुम इतनी सुंदर और नवयौवना हो। तुम इस घोर वन में इस वृद्ध और अंधे पति के साथ अपना जीवन क्यों नष्ट कर रही हो? इस जर्जर पति से तुम्हें क्या सुख मिलेगा? हम देवताओं के वैद्य हैं, तुम हम दोनों में से किसी एक का वरण कर लो और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो।"

परंतु पतिव्रता सुकन्या ने उनके इस प्रस्ताव को अत्यंत दृढ़ता से ठुकरा दिया और कहा, "मेरे पति चाहे वृद्ध हों या नेत्रहीन, वे ही मेरे सर्वस्व हैं। मैं अपने पतिव्रता धर्म से कभी विचलित नहीं हो सकती।"

सुकन्या की यह अविचल निष्ठा और उसका कष्ट देखकर वन में निवास करने वाली नागकन्याएँ उसके पास आईं। नागकन्याओं ने सुकन्या के धर्म की प्रशंसा की और उसे उपदेश दिया कि यदि वह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान सूर्य का 'रवि-षष्ठी' (छठ) व्रत पूर्ण निष्ठा और पवित्रता के साथ करेगी, तो भगवान सूर्यदेव और छठी मैया की कृपा से उसके पति की दृष्टि पुनः लौट आएगी और उनके सभी कष्ट दूर हो जाएँगे ।

सुकन्या का व्रत एवं महर्षि का नवयौवन

नागकन्याओं के बताए विधान के अनुसार, सुकन्या ने अत्यंत श्रद्धा, कठोर नियम और संयम के साथ कार्तिक शुक्ल षष्ठी का व्रत किया। उसने निराहार रहकर भगवान सूर्यदेव की उपासना की और जल में खड़े होकर अर्घ्य अर्पण किया ।

पतिव्रता सुकन्या के व्रत के प्रताप और सूर्य देव के आशीर्वाद से एक अद्भुत चमत्कार घटित हुआ। महर्षि च्यवन की आँखों की खोई हुई ज्योति पुनः वापस आ गई। और न केवल उनकी दृष्टि वापस आई, अपितु सूर्य देव की प्रत्यक्ष कृपा और अश्विनी कुमारों की औषधियों के प्रभाव से महर्षि च्यवन का वह वृद्ध और जर्जर शरीर पूर्ण रूप से रोगमुक्त होकर एक अत्यंत कांतिमान, युवा और तेजस्वी रूप में परिवर्तित हो गया । सुकन्या का वैवाहिक जीवन अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि से परिपूर्ण हो गया । इसी कथा को सुनकर महारानी द्रौपदी ने भी छठ व्रत किया था。


५. मुख्य कथा: चतुर्थ खण्ड - सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण और अर्घ्य विधान की उत्पत्ति

लोक-परंपरा और महाभारत के ऐतिहासिक कथानकों में छठ पूजा के दौरान जो अत्यंत पवित्र 'अर्घ्य दान' की परंपरा है, उसका सीधा संबंध महाभारत काल के महान योद्धा और सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण से माना जाता है । यह कथा छठ पर्व में जल के भीतर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व को स्थापित करती है。

महाभारत काल में दानवीर कर्ण को भगवान सूर्य का परम भक्त और सूर्योपासना का प्रथम महान साधक माना गया है । कर्ण साक्षात् भगवान सूर्य के ही अंश और पुत्र थे। दुर्योधन की मित्रता के फलस्वरूप जब कर्ण को 'अंग देश' (जो वर्तमान में मुंगेर, भागलपुर और बिहार का समीपवर्ती क्षेत्र माना जाता है) का राजा घोषित किया गया, तब उन्होंने अपने राज्य और प्रजा के कल्याण तथा अपनी आत्मिक शक्ति की वृद्धि के लिए सूर्योपासना को अपने जीवन का सबसे अनिवार्य अंग बना लिया ।

दानवीर कर्ण का यह नित्य नियम था कि वे प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय से बहुत पूर्व उठ जाते थे और अंग देश की पवित्र नदी के जल में प्रवेश करते थे। वे अत्यंत शीत ऋतु में भी जल में घंटों अपनी कमर तक खड़े रहकर भगवान सूर्य की घोर उपासना और मंत्रों का जाप करते थे ।

जब पूर्व दिशा में लालिमा छा जाती और सूर्य की प्रथम रश्मियाँ (किरणें) पृथ्वी पर पड़ती थीं, तब कर्ण जल में खड़े होकर ही पूर्ण श्रद्धा, अनुशासन और एकाग्रता के साथ सूर्य देव को जल की अंजलि (अर्घ्य) अर्पित करते थे । यह मान्यता है कि कर्ण की इस कठोर साधना, जल में खड़े रहने के तप, और उनकी इस अगाध पितृ-भक्ति से भगवान सूर्य देव अत्यंत प्रसन्न रहते थे। सूर्य की इसी विशेष कृपा और अर्घ्य के प्रभाव से ही कर्ण को जन्म से ही अभेद्य कवच-कुंडल प्राप्त हुए थे और वे एक ऐसे महान योद्धा बने जिनका तेज सूर्य के समान था ।

कर्ण का नियम केवल अर्घ्य देने तक ही सीमित नहीं था। जब वे अपनी सूर्योपासना और अर्घ्य दान पूर्ण कर जल से बाहर आते थे, तो उस समय जो भी याचक, दीन-दुखी या ब्राह्मण उनके समक्ष उपस्थित होकर जो कुछ भी माँगता था, कर्ण उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे। वे विपुल धन, स्वर्ण और यहाँ तक कि अपने प्राण भी दान करने में संकोच नहीं करते थे。

अंग देश (बिहार) में कर्ण द्वारा जल में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य देने और आराधना करने की जो यह पवित्र परंपरा प्रारंभ की गई, उसी ने कालान्तर में जन-मानस में 'छठ पूजा' के अर्घ्य-विधान का वृहत रूप ले लिया । आज भी छठ महापर्व में लाखों श्रद्धालु जब नदी या सरोवर के जल में कमर तक खड़े होकर भगवान भास्कर को अर्घ्य अर्पित करते हैं, तो वे अचेतन रूप से सूर्यपुत्र कर्ण की उसी महान सूर्योपासना, समर्पण और अगाध आस्था की जीवंत परंपरा का ही निर्वहन कर रहे होते हैं । कर्ण की इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, मनुष्य को अपनी आस्था, अनुशासन और दान-धर्म से कभी विमुख नहीं होना चाहिए ।


६. मुख्य कथा: पंचम खण्ड - भगवान श्री राम एवं माता सीता का व्रत प्रसंग

रामायण और लोक-श्रुतियों में भी छठ पूजा के संबंध में एक अत्यंत पावन प्रसंग प्राप्त होता है। भगवान श्री राम सूर्यवंशी कुल के ही गौरव थे और उनके आराध्य तथा कुलदेवता भगवान सूर्यनारायण ही थे ।

जब भगवान श्री राम लंका के राजा रावण का वध करके और चौदह वर्ष का अपना वनवास पूर्ण करके माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, तो राज्याभिषेक से पूर्व उन्हें रावण (जो कि एक ब्राह्मण था) के वध के पाप से मुक्त होने और राज्य की सुख-शांति के लिए अनुष्ठान करने का परामर्श दिया गया ।

मुद्गल ऋषि के निर्देशानुसार, भगवान राम और माता सीता ने मुंगेर (बिहार) स्थित उनके आश्रम में रहकर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को अपने कुलदेवता भगवान सूर्य की पूर्ण विधि-विधान से उपासना की । माता सीता ने यह अत्यंत कठिन और पवित्र छठ व्रत रखा और भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया । इसी पूजा के पश्चात रामराज्य की स्थापना हुई, जहाँ कोई भी दुखी या दरिद्र नहीं था。


७. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति (व्रत कथा का अंतिम फल-वचन)

सभी पारंपरिक आख्यानों और प्रसंगों के सविस्तार वाचन के पश्चात, छठ व्रत कथा का समापन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट 'फलश्रुति' के साथ किया जाता है। फलश्रुति वह पारंपरिक वचन है जो यह सुनिश्चित करता है कि इस महान व्रत को करने वाले और इस कथा को सुनने वाले को किस फल की प्राप्ति होगी ।

कथा-श्रवण के उपरांत कथावाचक निम्न फल-वचनों का वाचन करते हैं:

"इति श्री स्कंद पुराणोक्त प्रतिहार सूर्य षष्ठी व्रत कथा संपूर्णा।"


"जो कोई भी भक्त, नर अथवा नारी, पूर्ण श्रद्धा, शुद्धता, सात्विकता और नियम-संयम के साथ इस श्री सूर्य षष्ठी (छठ) व्रत की महिमा और इस पावन कथा को सुनता है अथवा पढ़ता है, छठी मैया और भगवान सूर्यदेव उसके समस्त पापों का नाश करते हैं ।


इस महान व्रत के प्रभाव और इस कथा श्रवण के प्रताप से:
जिनके घर में संतान नहीं है, छठी मैया की कृपा से उन्हें सुयोग्य, निरोगी और दीर्घायु संतान की प्राप्ति होती है ।
जो निर्धन हैं, उन्हें अपार धन-धान्य, ऐश्वर्य और जीवन में अक्षय सुख की प्राप्ति होती है ।
जो रोगों से पीड़ित हैं, भगवान सूर्यदेव उन्हें निरोगी काया और उत्तम स्वास्थ्य का वरदान देते हैं ।
जिनके जीवन में राज-भय हो या जिनकी संपत्ति का नाश हो गया हो, उन्हें उनका खोया हुआ सम्मान और संपत्ति उसी प्रकार पुनः प्राप्त होती है, जिस प्रकार महारानी द्रौपदी और पांडवों को प्राप्त हुई ।
सुकन्या के समान इस व्रत को करने वाली सुहागिन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य, पारिवारिक शांति और पति की दीर्घायु का वरदान मिलता है ।
सच्चे मन से जो भी भक्त अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देते समय छठी मैया के दरबार में अपनी जो भी मनोकामना रखता है, यह परम कल्याणकारी व्रत उस मनोरथ को निश्चित ही पूर्ण करता है ।


जिसने भी आज इस कथा का श्रवण किया है और भगवान का गुणगान सुना है, उनकी आत्मा पुण्यमयी हो गई है और उनका जीवन महान हो गया है । सूर्य देव अपनी जीवनदायिनी ऊर्जा से और छठी मैया अपने मातृत्व स्वरूप से उन पर सदैव अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती हैं । उनके घर-आंगन में सदा सुख और समृद्धि की शहनाई बजती रहती है ।


हे छठी मैया! हे दीनानाथ (सूर्य देव)! इस कथा को कहने वाले, सुनने वाले, कथा में हुंकारा भरने वाले और इस महान व्रत को धारण करने वाले सभी वृती श्रद्धालुओं की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करना। जो भूल-चूक हो गई हो, उसे क्षमा करना और अपनी कृपा दृष्टि सदा बनाए रखना।"

(कथा समाप्ति पर सभी श्रद्धालु अपने हाथों में रखा हुआ अक्षत और पुष्प श्रद्धापूर्वक छठी मैया की वेदी पर अर्पित करते हैं और सूर्य देव को प्रणाम करते हैं।)

बोलिए छठी मैया की जय!

बोलिए भगवान सूर्यनारायण की जय!

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