विस्तृत उत्तर
श्राद्ध से अनेक अमूल्य चीज़ें प्राप्त होती हैं, जिनका वर्णन याज्ञवल्क्य स्मृति, मार्कण्डेय पुराण और विष्णु पुराण में स्पष्ट रूप से किया गया है। शास्त्रीय आधार के अनुसार मार्कण्डेय पुराण एवं विष्णु पुराण में भी इसी भाव को पुष्ट करते हुए कहा गया है, आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्। पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।
इस श्लोक का सटीक अर्थ यह है कि पितरों की श्रद्धापूर्वक पूजा अर्थात् श्राद्ध करने से मनुष्य को लंबी आयु, आज्ञाकारी पुत्र, संसार में निर्मल यश, स्वर्गलोक, उत्तम कीर्ति, शारीरिक पुष्टि अर्थात् स्वास्थ्य, बल, अपार ऐश्वर्य, पशु-धन जैसे गौ आदि, लौकिक सुख, और धन-धान्य की निश्चित प्राप्ति होती है।
श्राद्ध से प्राप्त होने वाली ग्यारह प्रमुख चीज़ें इस प्रकार हैं। पहली है आयु, अर्थात् लंबी आयु। दूसरी है पुत्र, अर्थात् आज्ञाकारी पुत्र। तीसरी है यश, अर्थात् संसार में निर्मल यश। चौथी है स्वर्ग, अर्थात् स्वर्गलोक। पाँचवीं है कीर्ति, अर्थात् उत्तम कीर्ति। छठी है पुष्टि, अर्थात् शारीरिक स्वास्थ्य। सातवीं है बल, अर्थात् शारीरिक और मानसिक बल। आठवीं है श्रियम्, अर्थात् अपार ऐश्वर्य। नवीं है पशु, अर्थात् पशु-धन जैसे गौ आदि। दसवीं है सौख्य, अर्थात् लौकिक सुख। ग्यारहवीं है धन-धान्य, अर्थात् धन और अनाज की प्राप्ति।
याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार आठ फल भी विशेष हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य ने श्राद्ध के फल का अत्यंत स्पष्ट और वैज्ञानिक श्लोक प्रस्तुत किया है। इसके अनुसार पितर मनुष्यों को आठ प्रकार की अमूल्य संपदाएं प्रदान करते हैं। ये आठ हैं दीर्घ आयु, सुयोग्य और स्वस्थ संतान, प्रचुर संपत्ति, श्रेष्ठ ज्ञान, मरणोपरांत स्वर्ग, अंतिम मुक्ति, सभी प्रकार के लौकिक सुख, और राज्य-सत्ता।
इन फलों की प्राप्ति की शर्त यह है कि पितर पूर्णतः तृप्त और प्रसन्न होने चाहिए। श्राद्ध से पूर्णतः तृप्त और प्रसन्न होकर पितर मनुष्यों को आठ प्रकार की अमूल्य संपदाएं प्रदान करते हैं। यदि श्राद्ध सच्ची श्रद्धा, शुद्ध सामग्री और सही विधि से किया जाए, तो पितर तृप्त होते हैं, और ये फल मिलते हैं।
इन फलों का गहरा अर्थ देखें तो ये केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी हैं। आयु, धन, संतान, सुख, यश, कीर्ति आदि भौतिक फल हैं। स्वर्ग, मोक्ष, विद्या आदि आध्यात्मिक फल हैं। श्राद्ध से दोनों प्रकार के फल मिलते हैं, जो जीवन को सम्पूर्ण बनाते हैं।
मातामह श्राद्ध का विशेष फल भी है। शास्त्रों में यह माना गया है कि जो दौहित्र प्रतिपदा के दिन अपने नाना-नानी का तर्पण और पिण्डदान करता है, उसके घर में असीम सुख, शांति और सम्पन्नता का वास होता है। यह नाना-नानी के श्राद्ध का विशिष्ट फल है।
इसके विपरीत श्राद्ध न करने पर अभाव होता है। शास्त्रों में यह विशेष रूप से उल्लिखित है कि जो व्यक्ति प्रतिपदा के दिन मातृकुल का श्राद्ध करता है, उसके घर में कभी क्लेश नहीं होता और वह पितृ दोष से सर्वथा मुक्त होकर एक समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है। श्राद्ध न करने वाले व्यक्ति को पितृ दोष का भागी बनना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप संतान-हीनता, दरिद्रता, और गंभीर शारीरिक व्याधियों का सामना करना पड़ सकता है।
इन सब फलों का सम्मिलित संदेश यह है कि पितर अपने तृप्त होकर वंशज को सर्वांगीण विकास प्रदान करते हैं। यह विकास भौतिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक — सब क्षेत्रों में होता है। इसलिए श्राद्ध करना मानव जीवन की पूर्णता का आधार है।
श्राद्ध और इसके फलों का सम्बन्ध सनातन धर्म की एक अद्भुत विशेषता है। यह सिद्ध करता है कि पूर्वजों का सम्मान वंशज के लिए अमूल्य आशीर्वाद का स्रोत है, और यह आशीर्वाद ही जीवन में सब प्रकार की समृद्धि लाता है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति, मार्कण्डेय पुराण और विष्णु पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः श्राद्ध से लंबी आयु, आज्ञाकारी पुत्र, निर्मल यश, स्वर्गलोक, उत्तम कीर्ति, शारीरिक पुष्टि, बल, अपार ऐश्वर्य, पशु-धन, लौकिक सुख, धन-धान्य, श्रेष्ठ ज्ञान, मोक्ष, और राज्य-सत्ता आदि सब प्राप्त होते हैं।
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