विस्तृत उत्तर
मार्कंडेय पुराण के देवी माहात्म्य के 85वें अध्याय में इस घटना का विस्तृत वर्णन है। जब शुंभ और निशुंभ ने देवताओं को स्वर्ग से निर्वासित कर दिया तो इन्द्र आदि देवताओं को हिमालय जाकर भगवती अपराजिता (विष्णुमाया / पार्वती) की स्तुति करनी पड़ी। देवताओं की इस स्तुति के फलस्वरूप हिमालय के ऊपर से देवी कात्यायनी प्रकट हुईं। देवी ने शुंभ-निशुंभ के दूत धूम्रलोचन से युद्ध किया और उसका वध किया। इसके बाद देवी ने 'कौशिकी' रूप में चंड और मुंड का वध किया और 'काली' का रूप धारण कर रक्तबीज का वध किया। अंततः देवी ने महासंग्राम में शुंभ और निशुंभ दोनों महाअसुरों का वध किया। इन महाअसुरों के वध के पश्चात देवराज इन्द्र और सभी देवताओं को पुनः स्वर्लोक का आधिपत्य प्राप्त हुआ। देवताओं ने देवी की स्तुति की और यज्ञ-भाग पुनः प्राप्त किए।
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