विस्तृत उत्तर
वैदिक काल में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था और इसका महत्व अत्यंत उच्च था। शास्त्रीय आधार के अनुसार कृषि प्रधान और गौ-आधारित वैदिक समाज में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था।
वैदिक समाज की दो मूल विशेषताएँ थीं। पहली विशेषता है कृषि प्रधान होना। वैदिक समाज मुख्यतः कृषि पर आधारित था। खेती-बाड़ी ही जीविका का मुख्य साधन थी। दूसरी विशेषता है गौ-आधारित होना। समाज की संरचना में गाय का केन्द्रीय स्थान था। गाय न केवल आर्थिक स्रोत थी, बल्कि धार्मिक और सामाजिक प्रतीक भी।
इन दोनों विशेषताओं के कारण पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था। सर्वोच्च का अर्थ है सबसे ऊपर, सबसे अधिक मूल्यवान। आज जैसे धन या सोना-चांदी सम्पत्ति के मानक हैं, वैसे ही वैदिक काल में पशु-धन सम्पत्ति का मानक था।
वैदिक काल में पशु-धन के मुख्य प्रकार थे। पहला प्रकार है गाय। गाय सबसे महत्वपूर्ण पशु थी। वह दूध, दही, घी, मक्खन, मूत्र, गोबर - सब देती थी। हर परिवार के पास गाय का होना आवश्यक माना जाता था। दूसरा प्रकार है बैल। बैल कृषि का मूल आधार था। हल चलाने, बीज बोने, फसल काटने - सब में बैलों की भूमिका थी। तीसरा प्रकार है घोड़ा। घोड़ा यातायात और युद्ध में काम आता था। चौथा प्रकार है भेड़, बकरी आदि अन्य पशु। ये भी आर्थिक स्रोत थे।
गाय का विशेष महत्व था। गाय सनातन धर्म में अत्यंत पूजनीय है। पंचबलि में सबसे पहले गो-बलि निकाली जाती है। गाय पवित्रता और देवत्व का प्रतीक है। शास्त्रों में गाय में सब देवताओं का निवास माना जाता है।
गाय के पाँच दान विशेष महत्वपूर्ण थे। पहला है दूध। दूध न केवल खाद्य था, बल्कि घी, दही, मक्खन भी इसी से बनते थे। दूसरा है घी। घी यज्ञ-कर्म में अनिवार्य था। बिना घी के यज्ञ नहीं हो सकता था। तीसरा है मूत्र। गोमूत्र को पवित्र माना जाता था, और शुद्धिकरण में प्रयोग होता था। चौथा है गोबर। गोबर खाद के रूप में कृषि में काम आता था, और घर लीपने में भी। पाँचवाँ है दही। दही पाचन में सहायक और पौष्टिक भोजन था।
गाय का धार्मिक महत्व भी विशेष था। यज्ञ में गाय के पंच गव्यों यानी पाँच पवित्र पदार्थों का प्रयोग होता था। ये पांच गव्य हैं दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर। इनके बिना कोई बड़ा यज्ञ सम्पन्न नहीं हो सकता था।
वैदिक समाज में गाय गिनकर ही धन की गणना होती थी। जिसके पास जितनी अधिक गायें थीं, वह उतना ही धनवान माना जाता था। राजा-महाराजा भी गाय की संख्या से अपनी सम्पन्नता मापते थे।
पशु-धन का सामाजिक महत्व भी विशेष था। पशु-धन का दान सबसे श्रेष्ठ दान माना जाता था। श्राद्ध में गाय का दान अत्यंत पुण्य कार्य था। विवाह में भी गाय का उपहार दिया जाता था। यह सब पशु-धन के सामाजिक महत्व को दर्शाता है।
पशु-धन का यज्ञीय महत्व भी अद्वितीय था। यज्ञ में पशु का विशेष स्थान था। हालांकि कलियुग में पशु-बलि वर्जित है, परंतु वैदिक और प्राचीन पौराणिक काल में यज्ञ में रुरु नामक मृग आदि का यज्ञीय प्रयोग होता था। यह कलिवर्ज्य अब निषिद्ध है।
इसी कारण द्वितीया श्राद्ध का पशू वै फल अत्यंत महत्वपूर्ण था। याज्ञवल्क्य स्मृति का यह उद्घोष कि द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन और सुयोग्य दामाद की प्राप्ति होती है, इस तिथि के श्राद्ध को पारिवारिक सुख, सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने और आर्थिक समृद्धि के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना देता है।
वैदिक काल में पशु-धन की समृद्धि के विभिन्न मापदण्ड थे। एक मापदण्ड था कितनी गाय हैं। दूसरा था कितने बैल हैं। तीसरा था कितने घोड़े हैं। चौथा था कितनी भूमि है, क्योंकि भूमि और पशु-धन का सीधा सम्बन्ध था।
पशु-धन और कृषि का सम्बन्ध भी विशेष था। बिना पशुओं के कृषि सम्भव नहीं थी। बैल हल चलाते थे, गाय खाद देती थी, और दूध-घी से कृषक का परिवार पुष्ट होता था। इसलिए पशु-धन कृषि का मूल आधार था।
वर्तमान संदर्भ में पशु-धन का स्वरूप बदला है। आज पशु-धन की जगह वाहन, घर, सम्पत्ति, उद्योग, और निवेश ने ले ली है। परंतु पशु-धन का दार्शनिक अर्थ यानी सर्वोच्च सम्पत्ति आज भी प्रासंगिक है।
द्वितीया श्राद्ध का पशू वै फल भी आधुनिक समृद्धि के लिए लागू होता है। आधुनिक संदर्भ में पशू वै का अर्थ है सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि - वाहन, घर, व्यापार, उद्योग, सम्पत्ति आदि। द्वितीया श्राद्ध से इन सब की प्राप्ति होती है।
इस सम्पूर्ण विश्लेषण का संदेश यह है कि शास्त्रीय फलों का संदर्भ समय के साथ बदलता है, परंतु उनका मूल अर्थ नहीं बदलता। वैदिक काल में पशु-धन सर्वोच्च सम्पत्ति थी, आज उसका रूप बदला है, परंतु द्वितीया श्राद्ध का फल यानी सर्वोच्च समृद्धि की प्राप्ति आज भी समान रूप से प्रासंगिक है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः वैदिक काल में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था। कृषि प्रधान और गौ-आधारित वैदिक समाज में गाय, बैल, घोड़ा आदि पशु आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन के मूल आधार थे। इसी कारण द्वितीया श्राद्ध का पशू वै फल अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया, जो आर्थिक समृद्धि और पारिवारिक सुख का प्रतीक है।
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