विस्तृत उत्तर
हाँ, द्वितीया श्राद्ध से अश्व जैसे वाहन भी मिल सकते हैं, परंतु अश्व यानी घोड़े आदि वाहनों का मुख्य काम्य फल तृतीया श्राद्ध से सम्बन्धित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को पशून् वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है।
यह स्पष्ट है कि द्वितीया का पशू वै फल अश्व को भी समाहित करता है। श्लोक में स्पष्ट कहा गया है गौ, अश्व आदि की प्राप्ति। यानी पशु-धन में अश्व यानी घोड़ा भी शामिल है। इसलिए द्वितीया श्राद्ध से अश्व जैसे वाहन की प्राप्ति का संकेत है।
परंतु तृतीया श्राद्ध का मुख्य काम्य फल अश्व है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार तृतीया श्राद्ध से अश्व यानी घोड़े आदि वाहनों की प्राप्ति होती है। यह तृतीया का विशिष्ट फल है।
प्रतिपदा से अष्टमी तक के तिथि-वार फल इस प्रकार हैं। प्रतिपदा को श्राद्ध से उत्तम कन्याओं की प्राप्ति होती है। द्वितीया को श्राद्ध से कन्या के लिए सुयोग्य वर यानी दामाद तथा प्रचुर पशु-धन की प्राप्ति होती है। तृतीया को श्राद्ध से अश्व यानी घोड़े आदि वाहनों की प्राप्ति होती है। चतुर्थी को क्षुद्र पशु यानी भेड़, बकरी आदि की प्राप्ति होती है।
पञ्चमी को उत्तम पुत्रों की प्राप्ति होती है। षष्ठी को द्यूत यानी क्रीड़ा या आमोद-प्रमोद में विजय होती है। सप्तमी को कृषि में अभूतपूर्व सफलता मिलती है। अष्टमी को वाणिज्य यानी व्यापार में अत्यधिक लाभ होता है।
इन तिथि-वार फलों से स्पष्ट है कि अश्व का मुख्य फल तृतीया है। परंतु द्वितीया के पशू वै में भी अश्व समाहित है, क्योंकि अश्व एक प्रकार का पशु है।
वाहन का आधुनिक संदर्भ में अर्थ विस्तृत है। प्राचीन काल में वाहन का अर्थ अश्व यानी घोड़ा था। आज वाहन का अर्थ कार, मोटरसाइकिल, बस, ट्रक, हवाई जहाज आदि है। शास्त्रों के फलों का संदर्भ बदला है, परंतु मूल अर्थ नहीं बदला।
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के मूल श्लोक में दोनों ध्वनित हैं। श्लोक है कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून् वै सुसतानपि। द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफं चैकशफं तथा। श्लोक के अंत में द्विशफं चैकशफं भी है। द्विशफं का अर्थ है दो खुर वाला यानी गाय, भैंस आदि। एकशफं का अर्थ है एक खुर वाला यानी घोड़ा, गधा आदि। यानी द्वितीया श्राद्ध से दो खुर वाले और एक खुर वाले दोनों प्रकार के पशु-धन की प्राप्ति होती है।
एकशफं अश्व का प्रतिनिधित्व करता है। एकशफं यानी एक खुर वाले पशु। इनमें मुख्यतः घोड़ा आता है। आधुनिक संदर्भ में एकशफं का अर्थ है तेज गति वाले वाहन, जैसे कार, मोटरसाइकिल आदि।
द्विशफं का अर्थ देखें तो द्विशफं का अर्थ है दो खुर वाले पशु। इनमें मुख्यतः गाय, भैंस, बकरी आदि आते हैं। आधुनिक संदर्भ में द्विशफं का अर्थ है आर्थिक स्रोत वाली सम्पदा।
इस तरह द्वितीया श्राद्ध से दोनों प्रकार की समृद्धि मिलती है। पहली प्रकार है द्विशफं यानी गाय आदि का धन। दूसरी प्रकार है एकशफं यानी अश्व या वाहन। दोनों मिलकर सम्पूर्ण समृद्धि देते हैं।
वाहन की प्राप्ति का मार्ग भी समान है। यदि कर्ता को वाहन की कामना है, तो उसे काम्य भावना से द्वितीया या तृतीया तिथि पर पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करना चाहिए। दोनों तिथियाँ वाहन के लिए लाभकारी हैं।
पितरों का आशीर्वाद इसमें मूल भूमिका निभाता है। जब पितर तृप्त होते हैं, तो वे वंशज को आर्थिक समृद्धि देते हैं, जिसमें वाहन भी शामिल है। पुराने समय में अश्व आज के वाहन के समान था, और आज की कार-मोटरसाइकिल वैसी ही उपयोगी है।
याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के सामान्य फल में भी धन शामिल है। आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पितः। यानी श्राद्ध से तृप्त पितर वंशज को धन देते हैं। वाहन इस सामान्य धन का एक रूप है।
स्कन्द पुराण का विपुल सम्पदा फल भी प्रासंगिक है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार प्रसन्न होकर भगवान शिव श्राद्धकर्ता को इस लोक में भी विपुल सम्पदा यानी विपुलां सम्पदं प्रदान करते हैं। यह विपुल सम्पदा वाहन सहित सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि देती है।
इस सम्पूर्ण विश्लेषण से स्पष्ट है कि द्वितीया श्राद्ध से वाहन की प्राप्ति का संकेत है, क्योंकि पशू वै में अश्व यानी घोड़ा शामिल है। परंतु वाहन का मुख्य काम्य फल तृतीया श्राद्ध से जुड़ा है। यदि कर्ता को विशेष रूप से वाहन की कामना है, तो वह तृतीया तिथि का श्राद्ध करे। यदि सामान्य पशु-धन या भौतिक समृद्धि की कामना है, तो द्वितीया श्राद्ध करे।
प्रतिपदा से अष्टमी तक की तिथियाँ अलग-अलग कामनाओं के लिए हैं। अतः स्पष्ट है कि जो गृहस्थ अपनी कन्या के विवाह को लेकर चिन्तित हैं अथवा पशु-धन यानी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भौतिक सम्पदा या वाहन की वृद्धि चाहते हैं, उनके लिए द्वितीया श्राद्ध का अनुष्ठान शास्त्रों में अमोघ उपाय बताया गया है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः हाँ, द्वितीया श्राद्ध से अश्व जैसे वाहन की प्राप्ति का संकेत है, क्योंकि पशू वै फल में अश्व यानी घोड़ा शामिल है। परंतु वाहन का मुख्य काम्य फल तृतीया श्राद्ध से जुड़ा है। आधुनिक संदर्भ में द्वितीया का पशू वै सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि का प्रतीक है, जिसमें वाहन भी समाहित है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक


