विस्तृत उत्तर
प्रतिपदा को मातृकुल का श्राद्ध करने से अनेक विशेष लाभ मिलते हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार शास्त्रों में यह विशेष रूप से उल्लिखित है कि जो व्यक्ति प्रतिपदा के दिन मातृकुल का श्राद्ध करता है, उसके घर में कभी क्लेश नहीं होता और वह पितृ दोष से सर्वथा मुक्त होकर एक समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।
मातृकुल श्राद्ध के तीन प्रमुख लाभ हैं। पहला लाभ है घर में क्लेश का अभाव। अर्थात् कलह, झगड़े, मनमुटाव आदि घर में नहीं होते। परिवार में सुख और शांति बनी रहती है। दूसरा लाभ है पितृ दोष से सर्वथा मुक्ति। पितृ दोष के सब प्रभाव दूर हो जाते हैं, और जीवन शुद्ध हो जाता है। तीसरा लाभ है समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन। अर्थात् धन-वैभव के साथ-साथ मानसिक शांति भी मिलती है।
इन लाभों का गहरा अर्थ है। घर में क्लेश का अभाव अर्थात् पारिवारिक सद्भाव। यह आज के समय में बहुत मूल्यवान है, क्योंकि अधिकांश घरों में आपसी कलह और मनमुटाव होते हैं। मातृकुल श्राद्ध से यह सब समाप्त हो जाता है। पितृ दोष से सर्वथा मुक्ति का अर्थ है पूर्ण मुक्ति। सर्वथा अर्थात् पूरी तरह, हर तरह से। एक बार पितृ दोष से मुक्ति मिल जाने पर, उसके सब दुष्परिणाम जैसे संतान-हीनता, दरिद्रता, और शारीरिक व्याधियाँ भी दूर हो जाते हैं। समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन का अर्थ है भौतिक और मानसिक दोनों प्रकार की समृद्धि। केवल धन ही नहीं, बल्कि शांति भी मिलती है, जो सच्ची समृद्धि है।
मातामह श्राद्ध का दूसरा विशेष फल भी है। शास्त्रों में यह माना गया है कि जो दौहित्र प्रतिपदा के दिन अपने नाना-नानी का तर्पण और पिण्डदान करता है, उसके घर में असीम सुख, शांति और सम्पन्नता का वास होता है। यह एक ऐसा श्राद्ध है जो केवल कर्तव्य-पूर्ति नहीं, बल्कि दो कुलों पितृकुल और मातृकुल के मध्य आध्यात्मिक सेतु का निर्माण करता है।
मातृकुल श्राद्ध की विशिष्टता यह है कि यह दो कुलों के बीच आध्यात्मिक सेतु बनाता है। पितृकुल अर्थात् पिता का कुल, और मातृकुल अर्थात् माता का कुल। दोनों कुलों के पितरों को सम्मान देना सम्पूर्ण कर्तव्य है। मातामह श्राद्ध इसी सम्पूर्णता को प्राप्त करने का साधन है।
मातामह श्राद्ध का अधिकारी दौहित्र होता है। मातामह का अर्थ है नाना अर्थात् माता के पिता और दौहित्र का अर्थ है पुत्री का पुत्र अर्थात् नाती। यदि किसी व्यक्ति के नाना-नानी के कुल में श्राद्ध करने वाला कोई पुत्र अर्थात् कर्ता का मामा जीवित न हो, अथवा दौहित्र अपने मातृकुल के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना चाहता हो, तो वह प्रतिपदा तिथि को अपने नाना-नानी का श्राद्ध पूर्ण शास्त्रीय अधिकार के साथ कर सकता है।
मातामह श्राद्ध की तिथि विशेष है। पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मातामह श्राद्ध के लिए सर्वोत्कृष्ट और शास्त्र-निर्धारित माना गया है। प्रतिपदा का यह विशेष विशेषाधिकार केवल मातृकुल को दिया गया है। मातामह और मातामही नाना और नानी की मृत्यु की वास्तविक तिथि यदि ज्ञात न भी हो, या उनकी मृत्यु प्रतिपदा के अतिरिक्त किसी अन्य तिथि पर हुई हो, तब भी उनका पार्वण श्राद्ध पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ही किया जाता है।
याज्ञवल्क्य स्मृति का समर्थन भी विशेष है। याज्ञवल्क्य स्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों के व्याख्याकारों ने यह स्पष्ट किया है कि पौत्र पुत्र का पुत्र और दौहित्र पुत्री का पुत्र दोनों समान रूप से अपने पूर्वजों को नरक से तारने की क्षमता रखते हैं। दौहित्र द्वारा किया गया तर्पण नाना-नानी को असीम शांति प्रदान करता है।
मातामह श्राद्ध करने की शर्तें भी विशेष हैं। कुछ विशिष्ट निबंध ग्रंथों और श्राद्ध तत्त्व की व्याख्याओं के अनुसार, मातामह श्राद्ध उसी स्थिति में किया जाता है जब दौहित्र की माता जीवित हो और वे सौभाग्यवती सधवा अवस्था में हों। यदि माता या पिता में से किसी एक का निधन हो चुका हो, तो कुछ विशिष्ट देशाचारों में मातामह श्राद्ध का तर्पण वर्जित माना गया है।
मातामह श्राद्ध की शास्त्रीय पुष्टि आदिपुराण में मिलती है। आदिपुराण और स्मृतितत्त्व में इस संबंध में अत्यंत स्पष्ट श्लोक प्राप्त होता है, मातामहानां दौहित्राः कुर्वन्त्यहनि चापरे। तेऽपि तेषां प्रकुर्वन्ति द्वितीयेऽहनि सर्वदा। अर्थात् मातामह नाना का श्राद्ध दौहित्र पुत्री के पुत्र द्वारा किया जाना शास्त्र सम्मत है, और यह अनुष्ठान अत्यंत कल्याणकारी है। शास्त्रीय आधार के रूप में आदिपुराण, स्मृतितत्त्व और याज्ञवल्क्य स्मृति इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः प्रतिपदा को मातृकुल नाना-नानी का श्राद्ध करने से तीन प्रमुख लाभ मिलते हैं। पहला, घर में कभी क्लेश नहीं होता। दूसरा, पितृ दोष से सर्वथा मुक्ति। तीसरा, समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन। अतिरिक्त रूप से घर में असीम सुख, शांति और सम्पन्नता का वास होता है।
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