विस्तृत उत्तर
तृतीया श्राद्ध का काम्य फल है अश्व यानी घोड़े आदि वाहनों की प्राप्ति। शास्त्रीय आधार के अनुसार याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के श्लोक में तिथियों के क्रम से फल निर्दिष्ट हैं। नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः के अनुसार तृतीयायां अश्वान् यानी तृतीया को श्राद्ध करने से अश्व यानी घोड़े आदि वाहनों की प्राप्ति होती है।
तृतीया श्राद्ध के अश्व फल का महत्व वैदिक काल में अत्यंत उच्च था। अश्व यानी घोड़ा वैदिक समाज में सर्वश्रेष्ठ वाहन था। राजा, महाराजा, योद्धा, और सम्पन्न परिवार अश्व को अपनी समृद्धि का प्रतीक मानते थे।
अश्व के तीन मुख्य उपयोग वैदिक काल में थे। पहला उपयोग है यातायात। अश्व यात्रा का मुख्य साधन था। दूर-दराज की यात्राएँ, व्यापार, और तीर्थ-यात्रा अश्व पर ही होती थी। दूसरा उपयोग है युद्ध। युद्ध में अश्व का स्थान सर्वोपरि था। रथों में अश्व जोते जाते थे, और घुड़सवार योद्धा सबसे शक्तिशाली माने जाते थे। तीसरा उपयोग है अश्वमेध यज्ञ। अश्वमेध यज्ञ सबसे बड़ा और श्रेष्ठ यज्ञ था, जो राजा सम्राट पद प्राप्त करने के लिए करते थे।
तृतीया श्राद्ध का काम्य फल अश्व क्यों है, इसका शास्त्रीय आधार भी है। तृतीया तिथि का अधिष्ठाता देवता और उसकी काम्य शक्ति विशेष है। तृतीया पर श्राद्ध करने से उस तिथि के अधिष्ठाता देवता प्रसन्न होते हैं, और वाहन की कामना पूरी होती है।
तृतीया और द्वितीया के फलों की तुलना देखें। द्वितीया श्राद्ध से कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशू वै यानी पशु-धन मिलता है। तृतीया श्राद्ध से अश्व यानी वाहन मिलता है। दोनों तिथियाँ अलग-अलग कामनाओं के लिए हैं। यदि किसी को विशेष रूप से वाहन की कामना है, तो वह तृतीया पर श्राद्ध करे।
वर्तमान संदर्भ में तृतीया श्राद्ध का अश्व फल। आज अश्व की जगह कार, मोटरसाइकिल, बस, और अन्य आधुनिक वाहन हैं। तृतीया श्राद्ध से इन सब वाहनों की प्राप्ति होती है, क्योंकि शास्त्र का मूल अर्थ यानी वाहन-सम्पदा आज भी प्रासंगिक है।
तृतीया श्राद्ध की विधि भी समान है। अपराह्न काल में, विशेषकर कुतप मुहूर्त 11:36 AM से 12:24 PM या रौहिण मुहूर्त 12:24 PM से 01:12 PM में। नैऋत्य दिशा में मुख करके, अपसव्य अवस्था में। कुश, काले तिल, सत्तू, घृत, मधु का प्रयोग। पञ्चबलि, अग्नौकरण, पिण्डदान, और ब्राह्मण भोजन।
तृतीया श्राद्ध के साथ सामान्य फल भी मिलते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के अनुसार श्राद्ध से तृप्त पितर वंशज को आयु, सन्तान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य देते हैं। ये फल तृतीया श्राद्ध पर भी मिलते हैं, साथ ही अश्व का काम्य फल भी।
तृतीया तिथि का नाम लोकभाषा में तीज है। तृतीया यानी तीसरी तिथि को हिन्दी में तीज कहते हैं। तीज व्रत और हरतालिका तीज आदि इसी तिथि पर होते हैं। परंतु श्राद्ध की दृष्टि से तृतीया का काम्य फल अश्व यानी वाहन है।
प्रतिपदा से अष्टमी तक की इस तिथि-श्रृंखला का गहरा अर्थ है। यह दर्शाती है कि सनातन धर्म जीवन के हर क्षेत्र में शास्त्रीय समाधान देता है। परिवार, सन्तान, सम्पदा, वाहन, व्यापार, कृषि - सब के लिए एक विशेष तिथि पर श्राद्ध निर्धारित है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 और नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः तृतीया श्राद्ध का काम्य फल है अश्व यानी घोड़े आदि वाहनों की प्राप्ति। वैदिक काल में अश्व सर्वश्रेष्ठ वाहन था, और आधुनिक संदर्भ में यह सम्पूर्ण वाहन-सम्पदा का प्रतीक है। यदि किसी को वाहन की विशेष कामना है, तो तृतीया तिथि पर काम्य भावना से श्राद्ध करना चाहिए।
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