विस्तृत उत्तर
चतुर्थी श्राद्ध से क्षुद्र पशु यानी भेड़, बकरी आदि की प्राप्ति होती है। शास्त्रीय आधार के अनुसार याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 में तिथियों के अनुसार फलों की सूची में चतुर्थी का फल क्षुद्र पशु बताया गया है। नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः के अनुसार चतुर्थ्यां क्षुद्रपशून् यानी चतुर्थी को श्राद्ध करने से क्षुद्र यानी छोटे पशुओं की प्राप्ति होती है।
क्षुद्र पशु का अर्थ देखें तो क्षुद्र का अर्थ है छोटे, लघु, या कम आकार के। क्षुद्र पशु वे होते हैं जो आकार में छोटे होते हैं, जैसे भेड़, बकरी, खरगोश, मुर्गी आदि। ये गाय, घोड़े जैसे बड़े पशुओं से छोटे होते हैं।
क्षुद्र पशुओं के प्रमुख उदाहरण वैदिक काल में थे। पहला उदाहरण है भेड़। भेड़ से ऊन और दूध प्राप्त होता था। ऊन से वस्त्र बनते थे, और दूध खाद्य था। दूसरा उदाहरण है बकरी। बकरी का दूध, मांस, और खाल उपयोगी था। बकरी पालना सरल और कम खर्चीला था। तीसरा उदाहरण है अन्य छोटे पशु। इनमें खरगोश, मुर्गी, कबूतर आदि भी शामिल थे।
चतुर्थी श्राद्ध का क्षुद्र पशु फल क्यों है, इसका शास्त्रीय आधार है। चतुर्थी तिथि का अधिष्ठाता देवता और उसकी काम्य शक्ति क्षुद्र पशु-धन की वृद्धि से जुड़ी है। चतुर्थी पर श्राद्ध करने से उस तिथि के देवता प्रसन्न होते हैं, और क्षुद्र पशु-धन की कामना पूरी होती है।
चतुर्थी और तृतीया के फलों की तुलना देखें। तृतीया श्राद्ध से अश्व यानी घोड़े जैसे बड़े और शक्तिशाली वाहन मिलते हैं। चतुर्थी श्राद्ध से क्षुद्र पशु यानी भेड़, बकरी जैसे छोटे पशु मिलते हैं। दोनों का स्तर अलग है - तृतीया बड़ी सम्पदा के लिए, चतुर्थी छोटी सम्पदा के लिए।
वर्तमान संदर्भ में चतुर्थी श्राद्ध के क्षुद्र पशु फल का अर्थ। आज क्षुद्र पशुओं का स्थान पशु-पालन उद्योग, मुर्गी-पालन, मत्स्य-पालन, और अन्य लघु-उद्योग ने ले लिया है। चतुर्थी श्राद्ध से इन सब लघु-उद्योगों और छोटी आय के स्रोतों की वृद्धि होती है।
चतुर्थी श्राद्ध की विधि भी समान है। अपराह्न काल में, नैऋत्य दिशा में मुख करके, अपसव्य अवस्था में। कुश, काले तिल, सत्तू, घृत, मधु का प्रयोग। पञ्चबलि, अग्नौकरण, पिण्डदान, और ब्राह्मण भोजन।
चतुर्थी श्राद्ध के साथ सामान्य फल भी मिलते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 के अनुसार श्राद्ध से तृप्त पितर वंशज को आयु, सन्तान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य देते हैं। ये फल चतुर्थी पर भी मिलते हैं, साथ ही क्षुद्र पशु का काम्य फल भी।
इन तिथि-वार फलों का सम्मिलित संदेश यह है कि सनातन धर्म में हर आर्थिक स्तर के व्यक्ति के लिए श्राद्ध का काम्य फल निर्धारित है। बड़े पशु-धन के लिए द्वितीया, वाहन के लिए तृतीया, और छोटे पशु-धन के लिए चतुर्थी। यह शास्त्र की समावेशी दृष्टि का प्रमाण है।
चतुर्थी तिथि चतुर्थी यानी चौथी है। इसे हिन्दी में चौथ कहते हैं। करवा चौथ, गणेश चौथ आदि इसी तिथि से जुड़े हैं। परंतु श्राद्ध की दृष्टि से चतुर्थी का काम्य फल क्षुद्र पशु है।
इस तिथि का व्यावहारिक उपयोग यह है कि यदि किसी को अपना पशु-पालन व्यवसाय बढ़ाना हो, या छोटे पशुओं की संख्या में वृद्धि चाहिए हो, तो वह चतुर्थी तिथि पर काम्य भावना से श्राद्ध करे। पितरों के आशीर्वाद से यह कामना पूरी होती है।
इन चार तिथियों का सम्मिलित संदेश है। प्रतिपदा को कन्या, द्वितीया को सुयोग्य दामाद और पशु-धन, तृतीया को अश्व, और चतुर्थी को क्षुद्र पशु। इन चारों फलों का सम्बन्ध पारिवारिक और आर्थिक समृद्धि से है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 और नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः चतुर्थी श्राद्ध से क्षुद्र पशु यानी भेड़, बकरी आदि छोटे पशुओं की प्राप्ति होती है। वैदिक काल में भेड़-बकरी महत्वपूर्ण आर्थिक स्रोत थे। आधुनिक संदर्भ में यह लघु-उद्योग और छोटी आय के स्रोतों की वृद्धि का प्रतीक है।
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