विस्तृत उत्तर
श्राद्ध करने से आठ अमूल्य फल मिलते हैं, जो याज्ञवल्क्य स्मृति में स्पष्ट रूप से वर्णित हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार याज्ञवल्क्य स्मृति अध्याय 1, श्लोक 270 में महर्षि याज्ञवल्क्य ने श्राद्ध के फल का अत्यंत स्पष्ट और वैज्ञानिक श्लोक प्रस्तुत किया है। श्लोक है, आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः।
इस श्लोक का सटीक अर्थ यह है कि महर्षि कहते हैं कि श्राद्ध से पूर्णतः तृप्त और प्रसन्न होकर पितर मनुष्यों को आठ प्रकार की अमूल्य संपदाएं प्रदान करते हैं। ये आठ संपदाएं हैं दीर्घ आयु, सुयोग्य और स्वस्थ संतान, प्रचुर संपत्ति, श्रेष्ठ ज्ञान, मरणोपरांत स्वर्ग, अंतिम मुक्ति, सभी प्रकार के लौकिक सुख, और यहाँ तक कि राज्य-सत्ता भी।
इन आठ फलों का विस्तार से वर्णन इस प्रकार है। पहला फल है आयु अर्थात् दीर्घ आयु। पितर तृप्त होकर वंशज को लंबी आयु प्रदान करते हैं। दूसरा फल है प्रजा अर्थात् सुयोग्य और स्वस्थ संतान। पितर वंशज को अच्छी और सुखी संतान देते हैं। तीसरा फल है धन अर्थात् प्रचुर संपत्ति। पितर वंशज को धन और सम्पन्नता प्रदान करते हैं। चौथा फल है विद्या अर्थात् श्रेष्ठ ज्ञान। पितर वंशज को विद्या, ज्ञान और बुद्धि देते हैं। पाँचवाँ फल है स्वर्ग अर्थात् मरणोपरांत स्वर्ग। पितर वंशज को मृत्यु के बाद स्वर्ग में स्थान देते हैं। छठा फल है मोक्ष अर्थात् अंतिम मुक्ति। पितर वंशज को मोक्ष या परम मुक्ति प्रदान करते हैं। सातवाँ फल है सुख अर्थात् सभी प्रकार के लौकिक सुख। पितर वंशज को इस लोक में सब प्रकार के सुख देते हैं। आठवाँ फल है राज्य अर्थात् राज्य-सत्ता। पितर वंशज को राज्य और सत्ता भी प्रदान कर सकते हैं।
इन फलों की प्राप्ति की शर्त यह है कि पितर पूर्णतः तृप्त और प्रसन्न होने चाहिए। यदि श्राद्ध सही विधि से, सच्ची श्रद्धा से, और शुद्ध सामग्री से किया जाए, तो पितर तृप्त होते हैं। यदि श्राद्ध अधूरा या अशुद्ध हो, तो पितर निराश होते हैं, और ये फल नहीं मिलते।
मार्कण्डेय पुराण और विष्णु पुराण भी इसी भाव की पुष्टि करते हैं। मार्कण्डेय पुराण एवं विष्णु पुराण में भी इसी भाव को पुष्ट करते हुए कहा गया है, आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्। पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।
इस श्लोक का सटीक अर्थ यह है कि पितरों की श्रद्धापूर्वक पूजा अर्थात् श्राद्ध करने से मनुष्य को लंबी आयु, आज्ञाकारी पुत्र, संसार में निर्मल यश, स्वर्गलोक, उत्तम कीर्ति, शारीरिक पुष्टि अर्थात् स्वास्थ्य, बल, अपार ऐश्वर्य, पशु-धन जैसे गौ आदि, लौकिक सुख, और धन-धान्य की निश्चित प्राप्ति होती है।
इन फलों के अतिरिक्त मातामह श्राद्ध का भी विशेष फल है। शास्त्रों में यह विशेष रूप से उल्लिखित है कि जो व्यक्ति प्रतिपदा के दिन मातृकुल नाना-नानी का श्राद्ध करता है, उसके घर में कभी क्लेश नहीं होता और वह पितृ दोष से सर्वथा मुक्त होकर एक समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।
इसके विपरीत श्राद्ध न करने का दुष्परिणाम भी विशेष है। श्राद्ध न करने वाले व्यक्ति को पितृ दोष का भागी बनना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप संतान-हीनता, दरिद्रता, और गंभीर शारीरिक व्याधियों का सामना करना पड़ सकता है। अर्थात् श्राद्ध करने से जो आठ फल मिलते हैं, वे न करने पर अभाव बन जाते हैं।
इस सिद्धांत का गहरा अर्थ है कि पितरों का आशीर्वाद वंशज के सर्वांगीण विकास का स्रोत है। बिना पितरों के आशीर्वाद के कोई भी व्यक्ति पूर्ण समृद्ध जीवन नहीं जी सकता। इसलिए श्राद्ध करना न केवल पितरों के लिए, बल्कि स्वयं वंशज के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
श्राद्ध से पितरों के आशीर्वाद की प्राप्ति का यह सिद्धांत सनातन धर्म की मूल आधारशिला है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति, मार्कण्डेय पुराण और विष्णु पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः श्राद्ध करने से आठ अमूल्य फल मिलते हैं। पहला आयु, दूसरा संतान, तीसरा धन, चौथा विद्या, पाँचवाँ स्वर्ग, छठा मोक्ष, सातवाँ सुख, और आठवाँ राज्य। ये सब पितरों की प्रसन्नता और तृप्ति से प्राप्त होते हैं।
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