विस्तृत उत्तर
पुराणों में यमराज को भैंसे पर सवार भयंकर रूप में वर्णित किया गया है। गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में यमराज के रूप का जो वर्णन है वह इस प्रकार है — 'हाथ में दण्ड लिये हुए, बहुत बड़ी काया वाले, भैंसे के ऊपर संस्थित, प्रलयकालीन मेघ के समान आवाज वाले, काजल के पर्वत के समान, बत्तीस भुजाओं वाले, तीन योजन के लम्बे-चौड़े विस्तार वाले।'
भैंसे का प्रतीक कई अर्थों में सार्थक है। भैंसा काले रंग का, स्थूलकाय और दृढ़ गति वाला होता है — ये गुण मृत्यु की अटल, निरपेक्ष और निश्चित प्रकृति के प्रतीक हैं। जिस प्रकार भैंसा धीरे-धीरे लेकिन अवश्य आगे बढ़ता है, उसी प्रकार मृत्यु भी देर-सबेर हर जीव के पास अवश्य पहुँचती है।
दूसरा कारण यह है कि भैंसा अंधकार और यमलोक की दक्षिण दिशा से जुड़ा माना गया है। दक्षिण दिशा पितरों और यमराज की दिशा है — काले रंग का भैंसा इस दिशा का प्रतीक है।
यमराज के काले-हरे रंग, लाल वस्त्र, और भैंसे की सवारी — ये सभी प्रतीक मृत्यु की अनिवार्यता, निष्पक्षता और गंभीरता को दर्शाते हैं। यमराज का यह भयंकर रूप केवल पापियों को दिखता है — धर्मात्माओं के लिए वे सौम्य रूप में प्रकट होते हैं। पुराणों में वर्णन है कि यमराज को 'धर्मराज' भी कहा जाता है — वे न्याय के देवता हैं, केवल भय के नहीं।



