विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के द्वितीय अध्याय में यममार्ग का विस्तृत वर्णन है। भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं — 'उस मार्ग में जाता हुआ पापी कभी बर्फीली हवा से पीड़ित होता है, तथा कभी काँटे चुभते हैं और कभी महाविषधर सर्पों के द्वारा डसा जाता है। वह पापी कहीं सिंहों, व्याघ्रों और भयंकर कुत्तों द्वारा खाया जाता है, कहीं बिच्छुओं द्वारा डसा जाता है।'
यह यातना प्रतीकात्मक दृष्टि से न्यायपूर्ण है — जिसने जीवन में दूसरों को छल से, अपने तीखे वचनों से, या अपनी धोखाधड़ी की विषैली सुइयों से कष्ट दिया, उसे मार्ग में सर्प और बिच्छू के डंक का अनुभव करना पड़ता है। जिसने जीवों की हत्या की, उसे यममार्ग में हिंसक पशु खाते हैं।
गरुड़ पुराण में वर्णित वैतरणी नदी के पास भी 'वज्र के समान चोंच वाले बड़े-बड़े गीध तथा कौओं से घिरी हुई नदी' का उल्लेख है। सूई के समान मुँह वाले कीड़े उस नदी के पापियों को हर ओर से काटते हैं।
इस पूरे वर्णन का आध्यात्मिक तात्पर्य यह है कि जीव ने जो पाप किए वे ही पाप उसके पीछे-पीछे आते हैं और यममार्ग में उसे घेर लेते हैं। पाप का प्रतिनिधित्व ये भयंकर प्राणी करते हैं। पुण्य के आश्रय से व्यक्ति इन सबसे बचा रहता है।
इसीलिए शास्त्र में बताया गया है कि जीवनकाल में नाग-पूजन, गारुड़ी मंत्र का जप और सर्पों के प्रति करुणा का भाव रखने से यममार्ग की सर्प-यातना से बचाव होता है।




