विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के द्वितीय अध्याय में यममार्ग का भयावह वर्णन करते हुए भगवान विष्णु कहते हैं — 'कहीं अंधे कुएँ में गिरता है, कहीं विकट पर्वत से गिरता है, कहीं छुरे की धार पर चलता है तो कहीं कीलों के ऊपर चलता है। कहीं घने अन्धकार में गिरता है, कहीं उग्र जल में गिरता है, कहीं जोंकों से भरे कीचड़ में गिरता है तो कहीं जलते हुए कीचड़ में गिरता है।'
इन दो विशेष यातनाओं का विश्लेषण — अंधा कुआँ उस स्थान का प्रतीक है जहाँ से कोई रास्ता नहीं दिखता, न बाहर निकलने का मार्ग है और न नीचे का ठिकाना — यह अज्ञान और अनिश्चितता का भय है। विकट पर्वत से गिरना उस पाप का प्रतीक है जहाँ जीव को अत्यंत ऊँचाई से गिराया जाता है — जैसे उसने अहंकार से खुद को बड़ा समझा था, वैसे ही नीचे फेंका जाता है।
गरुड़ पुराण में यह भी वर्णित है कि उस यममार्ग पर बारहों सूर्य एक साथ तपते हैं — वहाँ कहीं जल नहीं दिखता जिसे तृषातुर जीव पी सके। पापी की पीठ पर चाबुक मारते हुए यमदूत उसे आगे बढ़ने के लिए मजबूर करते हैं।
यह सत्रह दिन की यात्रा है। मार्ग में ये सब कष्ट भोगते हुए पापी जीव पछताता है और सोचता है — 'मनुष्य जन्म पाकर भी मैंने दान नहीं दिया, हवन नहीं किया, तीर्थ नहीं गया।' लेकिन इस पछतावे का अब कोई लाभ नहीं — यमलोक के मार्ग पर लौटने का विधान नहीं है।





