विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में चित्रगुप्त के वचनों में यह सत्य सीधे वर्णित है — 'तुम लोगों ने जो बहुत-से पाप किए हैं, वे पाप ही तुम्हारे दुःख के कारण हैं। इसमें हम लोग कारण नहीं हैं। मूर्ख हो या पण्डित, दरिद्र हो या धनवान और सबल हो या निर्बल — यमराज सभी से समान व्यवहार करने वाले कहे गए हैं।'
यमराज की यह निष्पक्षता कई कारणों पर आधारित है। पहला — कर्म का सिद्धांत। यमलोक में न धन काम आता है, न जाति, न पद। केवल कर्म देखे जाते हैं। धनी व्यक्ति ने जो पाप किए, उनका दंड उसे भी मिलेगा। निर्धन ने जो पुण्य किए, उनका फल उसे भी मिलेगा। दूसरा — यमराज स्वयं 'धर्म' के पुत्र हैं (धर्मराज)। धर्म में भेदभाव का कोई स्थान नहीं है।
इस प्रकरण की एक महत्त्वपूर्ण सीख यह है कि यमलोक में कोई भी रिश्वत, सिफारिश या रुतबा काम नहीं आता। राजा हो या रंक, ब्राह्मण हो या शूद्र — सबके कर्मों का हिसाब बराबरी से होता है। इसीलिए गरुड़ पुराण में बार-बार यह उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को जीवन में धर्म का आचरण करना चाहिए क्योंकि मृत्यु के बाद किसी की सहायता नहीं मिलेगी।
यह भी उल्लेखनीय है कि सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, आकाश सहित तेरह साक्षी मनुष्य के हर कर्म को जानते हैं — इनमें कोई धनी-निर्धन का भेद नहीं होता। सबके कर्मों का एकसमान लेखा-जोखा है।




