विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के तीसरे अध्याय में यमलोक के न्यायालय का विस्तृत वर्णन है। जब पापी आत्मा यमपुर पहुँचती है, तो धर्मराज के द्वारपाल धर्मध्वज उस जीव का परिचय चित्रगुप्त को देते हैं। इसके बाद चित्रगुप्त धर्मराज को उस आत्मा के सम्पूर्ण पाप-पुण्य का विवरण सुनाते हैं।
चित्रगुप्त जब पापियों से सामना करते हैं, तो वे अत्यंत भयावह रूप में उनके सामने प्रकट होते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार 'मृत्यु, ज्वर आदि से संयुक्त होने के कारण चित्रगुप्त भी यम के समान भयावह हैं।' उनके सामने पापी काँपते और हाहाकार करते हैं।
तब चित्रगुप्त यम की आज्ञा से उन सभी क्रंदन करते हुए पापियों को सुनाते हैं — 'तुम लोगों ने जो बहुत-से पाप किए हैं, वे पाप ही तुम्हारे दुःख के कारण हैं। इसमें हम लोग कारण नहीं हैं। मूर्ख हो या पण्डित, दरिद्र हो या धनवान और सबल हो या निर्बल — यमराज सभी से समान व्यवहार करने वाले कहे गए हैं।'
इसके अलावा यमदूत पापियों को पीटते हुए कहते हैं — 'ऐ दुराचारियों! तुमने सदा सुलभ होने वाले अन्न और जल का दान क्यों नहीं दिया? तीर्थों में क्यों नहीं गए? देवताओं की पूजा क्यों नहीं की? गृहस्थ होते हुए भी दोनों संध्याओं का उद्धार क्यों नहीं किया? यम और चित्रगुप्त का ध्यान और मंत्र जप क्यों नहीं किए जिससे यह यातना टलती?'
इन वचनों को सुनकर पापी अपने कर्मों के विषय में सोचते हुए निश्चेष्ट होकर चुपचाप बैठ जाते हैं। तब धर्मराज उनके पापों के अनुसार यथोचित दंड देने की आज्ञा देते हैं।





