विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के द्वितीय अध्याय में यममार्ग के भयंकर वर्णन में रक्त और शस्त्र की वृष्टि का उल्लेख मिलता है। पापियों के यमलोक-मार्ग के बारे में वर्णित है — 'कहीं अंगार वृष्टि, कहीं बिजली गिरने, शिलावृष्टि, कहीं रक्त की, कहीं शस्त्र की और कहीं गर्म जल की वृष्टि होती है। कहीं खारे कीचड़ की वृष्टि होती है।'
यह वर्णन केवल कल्पना नहीं बल्कि कर्मफल के सिद्धांत पर आधारित है। जिस पापी ने जीवन में दूसरों पर अत्याचार किया, शस्त्र से पीड़ित किया, रक्त बहाया — उसे यममार्ग में उसी की प्रतिध्वनि के रूप में ये यातनाएँ मिलती हैं।
गरुड़ पुराण में आगे बताया गया है कि पापी को 'तपती बालुका से व्याप्त और धधकते ताम्रमय मार्ग' पर चलना पड़ता है। कहीं 'अंगार राशि, कहीं अत्यधिक धुएँ से भरे मार्ग पर उसे चलना पड़ता है।'
यममार्ग के बीचोबीच वैतरणी नदी है जो स्वयं भी अत्यंत उग्र और घोर है। पापी इस पूरे मार्ग पर 'हा पुत्र! हा पौत्र!' करते हुए विलाप करता जाता है और यह सोचकर पछताता है कि मानव जन्म पाकर भी उसने धर्माचरण नहीं किया।
यह सत्रह दिन की यात्रा है — सत्रह दिन वायुवेग से चलने के बाद अठारहवें दिन पापी जीव सौम्यपुर पहुँचता है जहाँ उसे थोड़ी शांति मिलती है।





