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सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि और आकाश मनुष्य के कर्म क्यों

गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में इस तथ्य का सीधा उल्लेख है।

संक्षिप्त उत्तर

गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय के अनुसार सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, आकाश, भूमि, जल, हृदय और दोनों संध्याएँ — ये सभी मनुष्य के कर्मों के नित्य साक्षी हैं। साथ ही यमराज के गुप्तचर श्रवण भी सभी कर्म जानते हैं।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में इस तथ्य का सीधा उल्लेख है। भगवान विष्णु कहते हैं — 'सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन, रात, दोनों संध्याएँ और धर्म — ये सभी मनुष्य के वृत्तान्त को जानते हैं। धर्मराज, चित्रगुप्त, श्रवण और सूर्य आदि मनुष्य के शरीर में स्थित सभी पाप और पुण्यों को पूर्णतया देखते हैं।'

इनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट कारण है। सूर्य — वह सर्वद्रष्टा है। पूरे ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी होता है वह सूर्य के प्रकाश में होता है। सूर्य कुछ भी नहीं छोड़ते। चंद्र — मन का प्रतीक है। मनुष्य के मानसिक विचारों और कामनाओं का साक्षी। वायु — प्राण है, हर जीव के भीतर और बाहर। अग्नि — यज्ञ में आहुति का ग्राहक। प्रत्येक यज्ञ-होम का साक्षी। आकाश — सर्वव्यापी है, शब्द का वाहक है — हर वाचिक कर्म आकाश में गूँजता है। भूमि — सभी का आश्रय। जल — शुद्धि का माध्यम और जीवन का आधार।

हृदय का विशेष उल्लेख है — व्यक्ति चाहे कितना भी छुपाए, उसका हृदय (अंतःकरण) उसके प्रत्येक संकल्प, विकल्प और इरादे का साक्षी है। इसके अलावा यमराज के गुप्तचर 'श्रवण' और 'श्रवणी' हैं जो सर्वत्र विचरण करके मनुष्यों के मानसिक, वाचिक और दैहिक — तीनों प्रकार के कर्मों की जानकारी चित्रगुप्त को देते हैं।

इसी कारण शास्त्र कहते हैं कि गुप्त पाप जैसी कोई चीज नहीं होती — प्रकृति के ये साक्षी सदा सतर्क हैं।

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