विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण, गरुड़ पुराण और अन्य योग-प्रधान शास्त्रों में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक ही परम विराट् पुरुष के विशाल शरीर के रूप में कल्पित किया गया है। इसे पिण्ड-ब्रह्माण्ड (Macrocosm within the Microcosm) का सिद्धान्त कहा जाता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि जो कुछ भी इस असीम ब्रह्माण्ड में है वही सब अत्यंत सूक्ष्म रूप में मानव शरीर के भीतर भी विद्यमान है। देवता, लोक, नदियाँ और नक्षत्र सभी मानव शरीर के विभिन्न अंगों में सूक्ष्म रूप से अवस्थित हैं। इसी ब्रह्माण्डीय शरीर रचना विज्ञान के अन्तर्गत लोकों का शारीरिक अंगों के साथ तादात्म्य स्थापित किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार साधक अपने शरीर के भीतर ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अनुभव कर सकता है।
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