विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म के गरुड़ पुराण आदि स्मृति ग्रंथों में मृत्यु के उपरांत श्राद्ध और पिंडदान की अनिवार्य व्यवस्था का सीधा संबंध भुवर्लोक से है। जो आत्माएं अपने कर्म-बंधनों, अकाल मृत्यु या भौतिक आसक्ति के कारण भुवर्लोक (वायुमंडल) में भटक रही हैं उन प्रेत-आत्माओं को श्राद्ध और पिंडदान के माध्यम से सूक्ष्म ऊर्जा प्राप्त होती है। यह सूक्ष्म ऊर्जा उन्हें इस कष्टदायी लोक को पार करने में सहायता करती है जिससे वे पितृलोक या अपने अगले गंतव्य तक जा सकती हैं। श्राद्ध-पिंडदान इन आत्माओं की पीड़ा को कम करने और उन्हें आगे की यात्रा के लिए शक्ति देने का एक दिव्य उपाय है।
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