विस्तृत उत्तर
मार्कण्डेय पुराण अठारह महापुराणों में सबसे प्राचीन पुराणों में गिना जाता है। इसमें १३७ अध्याय और लगभग ९,००० श्लोक हैं। यह पुराण ऋषि मार्कण्डेय ने अपने शिष्य क्रौष्ठि को सुनाया था — इसीलिए इसका नाम मार्कण्डेय पुराण है।
इस पुराण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके ८१वें से ९४वें अध्याय में 'देवीमाहात्म्य' है जिसे 'दुर्गासप्तशती' या 'चण्डीपाठ' के नाम से जाना जाता है — यह शाक्त परम्परा का सर्वोच्च ग्रन्थ है जिसमें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के तीन चरित्रों में देवी के अद्भुत पराक्रम का वर्णन है। इसमें मधु-कैटभ वध, महिषासुर वध और शुम्भ-निशुम्भ वध की कथाएँ हैं। ऋग्वेद की भाँति इसमें अग्नि, इन्द्र, सूर्य आदि देवताओं पर विवेचन है। इसमें गृहस्थ-धर्म, दिनचर्या और नित्यकर्म की भी चर्चा है।
इस पुराण में राजा हरिश्चन्द्र की अत्यन्त करुण और शिक्षाप्रद कथा है। दत्तात्रेय का चरित्र, मदालसा का उपाख्यान, अत्रि-अनसूया की कथा और नौ प्रकार की सृष्टि का वर्णन भी इसमें है। सूर्योपासना और सूर्य द्वारा सृष्टि-उत्पत्ति का वर्णन भी विशेष रूप से इसमें मिलता है। इसे शाक्त सम्प्रदाय का प्रमुख पुराण माना जाता है।





