विस्तृत उत्तर
वराह पुराण महर्षि वेदव्यास रचित है और अठारह पुराणों में इसका द्वादश स्थान है। इसमें २१७ अध्याय और लगभग १०,००० श्लोक हैं। यह वैष्णव पुराण है और इसमें भगवान विष्णु के तृतीय अवतार वराह की मुख्य कथा है।
पृथ्वी-उत्पत्ति और उद्धार की कथा इस प्रकार है। सतयुग में जय-विजय — भगवान विष्णु के द्वारपाल — सनकादि ऋषियों के शाप से दैत्य योनि में उत्पन्न हुए। उनका प्रथम जन्म हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में हुआ। हिरण्याक्ष अत्यन्त बलशाली था। उसने तीनों लोक जीतकर अपना अधिपत्य स्थापित किया और अहंकार में आकर पृथ्वी को उठाकर रसातल (समुद्र की गहराई) में छिपा दिया। पृथ्वी के बिना सृष्टि का सारा क्रम ठप हो गया। देवताओं ने ब्रह्माजी की शरण ली और ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की।
भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी की नासिका से एक अत्यन्त सूक्ष्म वराह (शूकर) के रूप में प्रकट हो कर देखते-देखते विशाल आकार ग्रहण किया। देवताओं ने उनकी स्तुति की। वे समुद्र में गये, हिरण्याक्ष से भीषण युद्ध हुआ और अन्त में भगवान ने उसका वध किया। फिर उन्होंने पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाकर समुद्र से बाहर निकाला और उसे यथास्थान स्थापित किया। इसी कारण पृथ्वी का एक नाम 'वराहाधारिणी' भी है।





