विस्तृत उत्तर
यज्ञ-वराह का अर्थ है भगवान वराह का वह रूप जिसके शरीर का प्रत्येक अंग वैदिक यज्ञ के विभिन्न तत्वों का भौतिक स्वरूप था। उनके चार पैर चारों वेदों के प्रतीक थे, उनके तीक्ष्ण दांत यज्ञ के स्तंभ थे, उनका मुख यज्ञ कुंड था, उनकी जिह्वा अग्नि थी, उनके शरीर के बाल कुशा घास थे, उनकी आंखें दिन और रात थीं, उनके कान के आभूषण छह वेदांग थे, उनके द्वारा किया गया घूंट घी की आहुति था, और उनकी गंभीर गर्जना सामवेद के मंत्रों के समान थी। उनके कंधे वेदों की वेदी थे और उनका हृदय यज्ञ की दक्षिणा था।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





