विस्तृत उत्तर
मार्कण्डेय पुराण और अन्य महापुराणों में एकार्णव का वर्णन अत्यंत रहस्यमयी और भव्य है। नैमित्तिक प्रलय की प्रक्रिया में अग्नि द्वारा त्रैलोक्य के भस्म होने के पश्चात अगले सौ वर्षों तक प्रलयंकारी संवर्तक नामक मेघ उत्पन्न होते हैं जो अत्यंत मूसलाधार और प्रलयंकारी वर्षा करते हैं। इस भयंकर वर्षा से सम्पूर्ण त्रैलोक्य एक असीम और अंधकारमय विशाल महासागर में परिवर्तित हो जाता है जिसे एकार्णव कहा जाता है। एकार्णव का शाब्दिक अर्थ है एक (single) अर्णव (ocean) अर्थात एकमात्र विशाल समुद्र जो समस्त त्रैलोक्य को अपने में समेट लेता है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इस एकार्णव के जल का स्तर निरंतर बढ़ता हुआ सप्तर्षि मंडल (ध्रुवलोक के समीप) तक पहुँच जाता है।
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