विस्तृत उत्तर
देवताओं के मुख से महिषासुर के अत्याचारों का वृत्तांत सुनकर भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा जी को अत्यंत क्रोध आया। उनके क्रोध के परिणामस्वरूप सर्वप्रथम भगवान विष्णु के मस्तक से एक महान तेज (ज्योति) प्रकट हुआ। तदुपरांत भगवान शिव और ब्रह्मा जी के मस्तक से भी परम तेज उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात इन्द्र, सूर्य, अग्नि, वायु, यम आदि सभी देवताओं के शरीरों से एक अत्यंत उग्र और प्रज्वलित तेज निकला।
मार्कण्डेय पुराण देवी के इस अलौकिक प्राकट्य का वर्णन इन शब्दों में करता है: 'अतुलं तत्र तत्तेज: सर्वदेवशरीरजम्। एकस्थं तदभून्नारी व्यालोकत्रयं त्विषा।।'
अर्थात, सभी देवों के शरीरों से निकला हुआ वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्रित होकर एक जाज्वल्यमान पर्वत के समान प्रतीत होने लगा। उस अपार तेजोपुंज ने एक अत्यंत दिव्य और अलौकिक नारी का स्वरूप धारण कर लिया, जिसकी चमक से तीनों लोक प्रकाशित हो उठे।





