श्री अहोई अष्टमी व्रत की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा
प्रस्तावना एवं पारंपरिक मंगलाचरण
सनातन धर्म की अत्यंत समृद्ध और प्राचीन व्रत-परंपरा में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष और अद्वितीय स्थान है । इस परम पावन तिथि को संपूर्ण उत्तर भारत एवं अन्य क्षेत्रों में 'अहोई अष्टमी' के पावन पर्व के रूप में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और वात्सल्य भाव के साथ मनाया जाता है । यह व्रत मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतानों की दीर्घायु, उनके उत्तम स्वास्थ्य, सर्वांगीण सुख-समृद्धि, संकटों से उनकी रक्षा एवं वंश-वृद्धि की अनन्य कामना के साथ किया जाता है । धर्मशास्त्रीय और लोक-परंपरागत विधान के अनुसार, इस दिन माताएं सूर्योदय से पूर्व उठकर व्रत का संकल्प लेती हैं और दिन भर निर्जला उपवास रखती हैं, तथा संध्याकाल में आकाश में तारों अथवा चंद्रमा के दर्शन करने और उन्हें अर्घ्य देने के पश्चात ही अपने व्रत को पूर्ण करती हैं ।
इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय अंग 'अहोई अष्टमी की व्रत कथा' का श्रवण है । पारंपरिक लोक-मान्यता और व्रत-विधान के अनुसार, व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब माताएं पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ इस कथा का श्रवण करती हैं । कथा-श्रवण का पारंपरिक आरंभिक संदर्भ अत्यंत विशिष्ट है। संध्या के समय घर के पवित्र स्थान या आंगन को स्वच्छ करके लीपा जाता है। वहां दीवार पर गेरू (लाल मिट्टी) से स्याहू माता (अहोई माता) और उनके बच्चों की पारंपरिक आकृति अंकित की जाती है, जिसे लोक-भाषा में 'अष्ट कोठों की पुतली' कहा जाता है, अथवा वर्तमान समय में अहोई माता का पारंपरिक चित्रपट (कैलेंडर) स्थापित किया जाता है । माता के चित्र के सम्मुख एक जल से भरा हुआ कलश (करवा) स्थापित किया जाता है। व्रत करने वाली सभी माताएं उस कलश के समीप एकत्रित होकर बैठ जाती हैं। कथा श्रवण की प्राचीन परिपाटी के अनुसार, प्रत्येक व्रत करने वाली स्त्री अपने दाहिने हाथ में गेहूं अथवा किसी अन्य पवित्र धान्य के दाने (सामान्यतः सात दाने) ले लेती है । कथा के दौरान जब एक स्त्री अथवा परिवार की कोई वयोवृद्ध सदस्या मुख्य कथा का वाचन करती है, तो श्रवण करने वाली अन्य स्त्रियां बीच-बीच में 'हुंकारा' (हां में हां मिलाना या सहमति सूचक ध्वनि) भरती हैं। यह हुंकारा भरना इस बात का प्रतीक है कि कथा को पूर्ण ध्यान और भक्ति के साथ सुना जा रहा है। कथा की समाप्ति पर हाथ में लिए गए उन धान्य के दानों को माता के चित्र के समक्ष अथवा कलश के जल में श्रद्धापूर्वक अर्पित कर दिया जाता है।
परंपरागत व्रत-ग्रंथों, 'कल्याण' जैसी प्रामाणिक धार्मिक पत्रिकाओं तथा सदियों से चली आ रही लोक-परंपरा में अहोई अष्टमी व्रत की कथा के मुख्य रूप से दो प्रमुख और प्रामाणिक संस्करण प्राप्त होते हैं । पहला संस्करण अत्यंत विस्तृत है, जो एक समृद्ध साहूकार की इकलौती पुत्री, उसकी सबसे छोटी बहू के अद्वितीय त्याग, और स्याहू (स्याऊ) माता के भयंकर शाप तथा उसके निवारण से संबंधित है । यह संस्करण लोक-परंपरा में सर्वाधिक प्रचलित है और इसका वाचन लगभग हर घर में किया जाता है। दूसरा संस्करण अपेक्षाकृत संक्षिप्त है, जो प्रत्यक्ष रूप से साहूकार की बहू द्वारा अनजाने में हुए अपराध, उसके प्रत्यक्ष प्रायश्चित्त और अहोई माता की सीधी कृपा से संबंधित है ।
यद्यपि यह व्रत मूलतः लोक-परंपरा (Oral Folk Tradition) से पोषित है, तथापि इसके मूल भाव और कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन माता भगवती या गणनायक की पूजा के संदर्भ 'नारद पुराण' (पूर्वभाग, अध्याय 13) जैसे धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में भी संकष्टी और सौभाग्य-दायक व्रतों के रूप में प्राप्त होते हैं । इस विश्लेषणात्मक प्रस्तुति का मुख्य उद्देश्य उन दोनों पारंपरिक लोक-कथाओं को उनके पूर्ण, क्रमबद्ध, अविकल और अत्यंत विस्तारपूर्ण प्रामाणिक स्वरूप में प्रस्तुत करना है, जैसा कि वे सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी माताओं द्वारा सुनाई और सुनी जाती रही हैं。
अहोई अष्टमी व्रत कथा के प्रमुख संस्करणों का संरचनात्मक अवलोकन
कथा के विस्तृत पाठ में प्रवेश करने से पूर्व, दोनों प्रामाणिक संस्करणों के मूल तत्त्वों को स्पष्ट रूप से समझने हेतु नीचे एक संरचनात्मक तालिका प्रस्तुत की जा रही है, जो इन दोनों पारंपरिक पाठों के मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करती है:
| कथा के प्रमुख तत्त्व | प्रथम संस्करण (स्याहू माता, ननद एवं छोटी बहू का विस्तृत लोक-प्रचलित प्रसंग) | द्वितीय संस्करण (साहूकार की पुत्रवधू का सीधा एवं संक्षिप्त प्रसंग) |
|---|---|---|
| मुख्य पात्र | साहूकार, साहूकारनी, सात पुत्र, सात बहुएं, एक पुत्री (ननद), स्याहू माता, सुरही गाय, गरुड़ पंखनी। | साहूकार, साहूकार की बहुएं, साही (स्याहू) माता/अहोई माता। |
| अपराधकर्ता | साहूकार की इकलौती पुत्री (ननद) द्वारा अनजाने में अपराध। | साहूकार की छोटी बहू द्वारा प्रत्यक्ष रूप से अनजाने में अपराध। |
| अपराध का स्वरूप | खदान से पीली मिट्टी खोदते समय खुरपी लगने से स्याहू के बच्चे की मृत्यु। | वन से मिट्टी लाते समय खुरपी लगने से साही के बच्चे की मृत्यु। |
| शाप का हस्तांतरण | ननद का शाप सबसे छोटी बहू द्वारा स्वेच्छा से अपने ऊपर लिया जाना (कोख बंधवाना)। | शाप सीधे उसी बहू को प्राप्त होता है जिसके हाथों अपराध हुआ। |
| प्रायश्चित्त का माध्यम | सुरही गाय की गुप्त सेवा, गरुड़ पंखनी के बच्चों की सर्प से रक्षा, और स्याहू माता की सेवा (जूं निकालना)। | अहोई माता (भगवती) की प्रत्यक्ष और कठोर पूजा-आराधना एवं निर्जला व्रत। |
| अंतिम परिणाम | स्याहू माता द्वारा कोख खोला जाना, सात मृत पुत्रों का सात बहुओं सहित पुनः प्राप्त होना एवं जेठानियों का आश्चर्य। | अहोई माता की कृपा से सभी मृत संतानों का पुनः जीवित हो जाना और परिवार का उद्धार। |
तालिका में वर्णित इन दोनों स्वरूपों को अब उनके संपूर्ण पारंपरिक, मौखिक और विस्तृत आख्यान के रूप में नीचे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया जा रहा है।
प्रथम अध्याय: मुख्य पारंपरिक कथा (साहूकार की पुत्री, छोटी बहू एवं स्याहू माता का विस्तृत प्रसंग)
यह अहोई अष्टमी की सर्वाधिक प्रामाणिक, विस्तृत एवं सर्वमान्य लोक-कथा है। इस कथा को सुनाने वाली वृद्धा या माता अपने हाथ में गेहूं के दाने लेकर निम्नलिखित पारंपरिक शब्दों के साथ कथा का आरंभ करती है:
साहूकार के परिवार का परिचय एवं वन की ओर प्रस्थान
एक समय की बात है, प्राचीन काल में किसी नगर में एक अत्यंत धनवान और प्रतिष्ठित साहूकार निवास करता था। साहूकार का घर हर प्रकार की सुख-संपत्ति, धन-धान्य, दास-दासियों और गो-धन से परिपूर्ण था। साहूकार के परिवार में उसकी धर्मपत्नी, उसके सात हृष्ट-पुष्ट पुत्र और उन सातों पुत्रों की सात सुसंस्कृत बहुएं थीं। इसके अतिरिक्त, उस साहूकार की एक इकलौती, अत्यंत लाडली पुत्री भी थी। उस पुत्री का विवाह हो चुका था, परंतु कार्तिक का महीना होने के कारण और दीपावली का पावन पर्व समीप होने के कारण, वह अपने मायके (पिता के घर) आई हुई थी । साहूकार का वह विशाल परिवार अत्यंत प्रेम और सद्भाव के साथ एक ही छत के नीचे रहता था。
कार्तिक मास का कृष्ण पक्ष चल रहा था। उन दिनों घरों को सजाने, संवारने और उन्हें पवित्र करने के लिए पीली मिट्टी से लिपाई-पुताई करने की प्राचीन परंपरा थी। दीपावली से पूर्व घर को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए कार्तिक कृष्ण पक्ष की बदी अष्टमी (जिसे हम अहोई अष्टमी कहते हैं) के दिन साहूकार की सातों बहुओं ने निश्चय किया कि वे जंगल (खदान) में जाकर वहां से लिपाई के लिए पीली और स्वच्छ मिट्टी लेकर आएंगी ।
जब सातों बहुएं अपने-अपने हाथों में खुरपी (मिट्टी खोदने का पारंपरिक लोहे का उपकरण) और टोकरियां लेकर वन की ओर प्रस्थान करने लगीं, तो साहूकार की उस इकलौती बेटी ने भी अपनी भाभियों को वन की ओर जाता देखा। उसके मन में भी उत्साह जागा और उसने कहा, "हे भाभियों! मैं भी तुम्हारे साथ वन में चलूंगी और घर के कार्य में तुम्हारा हाथ बंटाऊंगी।" भाभियों ने उसे मना नहीं किया और इस प्रकार सातों बहुएं अपनी उस इकलौती ननद के साथ उल्लासपूर्वक जंगल की खदान की ओर चल पड़ीं ।
खदान में मिट्टी खोदना और स्याहू माता के शिशु की मृत्यु का दारुण प्रसंग
वन में पहुंचकर वे सभी एक उपयुक्त खदान के पास रुक गईं और अपनी-अपनी खुरपियों से पीली मिट्टी खोदने लगीं। वे स्त्रियां इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ थीं कि जिस स्थान पर वे मिट्टी खोद रही थीं, वहीं ठीक नीचे एक स्याहू (सेही या सेई - एक प्रकार का कांटेदार वन्य जीव) की एक बहुत पुरानी और गहरी मांद थी। उस मांद में स्याहू माता अपने छोटे-छोटे, नवजात बच्चों के साथ निवास करती थी ।
साहूकार की बेटी, जो मिट्टी खोदने के कार्य में अभ्यस्त नहीं थी, वह अत्यंत उत्साह और जल्दबाजी में खुरपी चला रही थी। दुर्भाग्यवश, मिट्टी खोदते समय उसके हाथ से खुरपी का एक बहुत तेज और गहरा प्रहार सीधा मांद के भीतर चला गया। वह तीक्ष्ण प्रहार मांद में शांति से बैठे स्याहू माता के एक अत्यंत छोटे और कोमल बच्चे को जा लगा। प्रहार इतना भयंकर था कि उस नवजात शिशु के प्राण उसी क्षण पखेरू हो गए और वह वहीं तड़प कर मर गया ।
उस समय स्याहू माता भोजन की खोज में मांद से बाहर गई हुई थी। जब वह लौटकर अपनी मांद में आई और उसने देखा कि उसका एक फूल सा बच्चा लहूलुहान अवस्था में मृत पड़ा है, तो उसके दुख और शोक का कोई पार न रहा। वह पछाड़ खाकर गिर पड़ी और विलाप करने लगी। जब उसे यह ज्ञात हुआ कि यह कृत्य वहां मिट्टी खोदने आई स्त्रियों द्वारा हुआ है, तो उसका दुख भयंकर क्रोध में परिवर्तित हो गया। स्याहू माता मांद से बाहर आई और उसने क्रोध से फुफकारते हुए साहूकार की बेटी (जिसके हाथों से खुरपी लगी थी) को लक्ष्य करके एक अत्यंत भयंकर और दारुण शाप दिया。
स्याहू माता ने अत्यंत कठोर शब्दों में कहा- "हे निर्दयी स्त्री! जिस प्रकार तूने आज मेरे इस कोमल, निरपराध और फूल से बच्चे को मौत के घाट उतारा है, जिस प्रकार तूने मुझे पुत्र-शोक की दारुण पीड़ा दी है और मेरी कोख सूनी की है, उसी प्रकार मैं भी आज तुझे शाप देती हूं कि मैं तेरी कोख बांधूंगी! तेरे गर्भ से जो भी संतान जन्म लेगी, वह कभी जीवित नहीं रहेगी। मैं तुझे जीवन भर पुत्र-शोक का संताप दूंगी!" ।
ननद की करुण पुकार और बड़ी भाभियों का अस्वीकार
स्याहू माता के मुख से निकले इस भयानक शाप को सुनकर साहूकार की बेटी भय से थर-थर कांपने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली। वह विलाप करती हुई धरती पर बैठ गई। उसे अपना भविष्य अंधकारमय और सूना दिखाई देने लगा। उसने अपनी सातों भाभियों के चरण पकड़ लिए और अत्यंत करुण स्वर में हाथ जोड़कर विनती करने लगी。
उसने अपनी सबसे बड़ी भाभी से कहा- "हे मेरी आदरणीय बड़ी भाभी! अनजाने में मेरे हाथों से यह महापाप हो गया है और मुझे कोख बंधने का यह भयंकर शाप मिल गया है। आप तो मेरी मां के समान हैं। कृपा करके आप मेरा यह शाप अपने ऊपर ले लीजिए और मेरी कोख बंधने से बचा लीजिए।" बड़ी भाभी ने तुरंत पीछे हटते हुए कहा- "नहीं ननद रानी! मैं यह शाप कैसे ले सकती हूं? मेरे स्वयं के बच्चे हैं, मैं अपनी संतानों का जीवन संकट में डालकर तेरी कोख का शाप अपने सिर पर नहीं ले सकती।" ।
निराश होकर ननद अपनी दूसरी भाभी के पास गई। उसने रोते हुए कहा- "हे मेरी दूसरी भाभी! आप ही मेरा यह शाप ले लीजिए और मुझे इस घोर संकट से मुक्ति दिला दीजिए।"
दूसरी भाभी ने भी मुख फेरते हुए उत्तर दिया- "हे ननद! कोई अपना रोग किसी और को दे तो दे, परंतु कोई अपना शाप किसी और को कैसे दे सकता है? मैं तेरी कोख नहीं बंधवा सकती।"
इसी प्रकार वह रोती-कलपती अपनी तीसरी, चौथी, पांचवीं और छठी भाभी के पास गई। उसने प्रत्येक के समक्ष हाथ जोड़े, बहुत विनती की, परंतु सभी छह बड़ी भाभियों ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि वे किसी भी मूल्य पर स्याहू माता के इस मृत्यु-शाप को स्वीकार करके अपनी संतानों के जीवन से खिलवाड़ नहीं कर सकतीं ।
छोटी बहू का अद्वितीय त्याग और कोख का बंधना
सभी की ओर से निराश होने के पश्चात, साहूकार की बेटी अत्यंत दीन हीन अवस्था में अपनी सबसे छोटी भाभी (साहूकार की सातवीं बहू) के पास गई। यह छोटी बहू आयु में सबसे कम थी, परंतु वह अत्यंत संस्कारी, धर्मपरायण, विवेकी और परिवार के सम्मान की रक्षा करने वाली स्त्री थी। ननद ने उसके पैरों पर गिरकर कहा- "हे छोटी भाभी! अब तुम ही मेरा अंतिम सहारा हो। यदि तुम भी मेरा शाप नहीं लोगी, तो मेरा जीवन नष्ट हो जाएगा और मैं कभी मां नहीं बन पाऊंगी। मेरा शाप तुम लो भाभी, मुझे दिला दो मुक्ति।" ।
छोटी बहू ने ननद की उस करुण पुकार को सुना। उसने मन ही मन अत्यंत गहराई से विचार किया। उसने सोचा, "यदि आज मैंने अपनी ननद का यह शाप नहीं लिया, तो ननद की कोख बंध जाएगी। जब ननद के घर में कोई संतान नहीं होगी, तो मेरी सासू जी (सास) अत्यंत दुखी होंगी। पुत्री के दुख से माता-पिता का हृदय विदीर्ण हो जाएगा और पूरे परिवार में सदा के लिए क्लेश और संताप उत्पन्न हो जाएगा। यदि सासू जी नाराज हो गईं, तो घर की शांति भंग हो जाएगी।" ।
केवल अपने सास-ससुर के सुख, परिवार की अखंडता और अपनी ननद के सौभाग्य की रक्षा के लिए, उस महान और त्याग की प्रतिमूर्ति छोटी बहू ने अपनी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाना स्वीकार कर लिया। उसने स्याहू माता के समक्ष जाकर कहा, "हे स्याहू माता! मेरी ननद के अपराध का शाप मैं अपने ऊपर लेती हूं। आप उसकी कोख के स्थान पर मेरी कोख बांध दीजिए।"
स्याहू माता ने अपने शाप को ननद के ऊपर से हटाकर छोटी बहू के ऊपर केंद्रित कर दिया और उसकी कोख बांध दी। इस प्रकार छोटी भाभी मान गई और उसने ननद के शाप की हामी भर ली ।
शाप का भयंकर प्रभाव: सात पुत्रों की निरंतर मृत्यु
इस हृदयविदारक घटना के पश्चात, सातों बहुएं और ननद वन से मिट्टी लेकर घर लौट आईं। समय अपनी गति से व्यतीत होने लगा। दीपावली का पर्व बीत गया और महीने गुजरने लगे। स्याहू माता के शाप का प्रभाव अब छोटी बहू के जीवन पर दृष्टिगोचर होने लगा。
कुछ समय पश्चात, छोटी बहू गर्भवती हुई और उसने एक अत्यंत सुंदर पुत्र को जन्म दिया। घर में खुशियां मनाई गईं, मंगल गीत गाए गए। परंतु जैसे ही उस बालक की आयु के छह दिन पूर्ण हुए और सातवां दिन प्रारंभ हुआ, स्याहू माता के भयंकर शाप के कारण, बिना किसी रोग या कष्ट के वह नवजात शिशु मृत्यु को प्राप्त हो गया । छोटी बहू की खुशियां पल भर में मातम में बदल गईं。
कुछ वर्षों पश्चात छोटी बहू को पुनः गर्भ ठहरा और उसने दूसरे पुत्र को जन्म दिया। परंतु नियति का वही क्रूर चक्र पुनः चला, और वह दूसरा बालक भी ठीक सातवें दिन काल के गाल में समा गया。
इसी प्रकार, वर्षों बीतते गए। छोटी बहू जब भी किसी संतान (पुत्र) को जन्म देती, वह केवल छह दिन जीवित रहता और सातवें दिन मर जाता। इस प्रकार क्रूर शाप के कारण उसके एक के बाद एक लगातार सात पुत्र उत्पन्न हुए और स्याहू माता के कोप से वे सातों के सातों पुत्र सातवें दिन मृत्यु को प्राप्त हो गए । सात पुत्रों की इस प्रकार अकाल मृत्यु से छोटी बहू का हृदय छलनी हो गया। उसके सात पुत्रों की शाप की वेदी पर कुर्बानी हो गई। उसकी गोद पूर्णतया सूनी हो गई और वह अत्यंत गहन शोक और वैराग्य में डूब गई。
पंडित का आगमन और काली सुरही गाय की सेवा का परामर्श
अपनी सबसे छोटी बहू को इस प्रकार निरंतर पुत्र-शोक में तड़पता देख साहूकार और उसकी पत्नी (साहूकारनी) अत्यंत चिंतित और दुखी हुए। बहू का रुदन उनसे देखा नहीं जाता था। तब एक दिन साहूकार और उसकी पत्नी ने निश्चय किया कि इस घोर संकट का कारण और निवारण जानना अत्यंत आवश्यक है。
उन्होंने नगर के एक अत्यंत विद्वान, ज्योतिर्विद और सिद्ध पंडित को ससम्मान अपने घर बुलवाया। साहूकार ने पंडित जी को सम्मानपूर्वक आसन पर बिठाया और अपनी छोटी बहू की इस दारुण व्यथा का समस्त वृत्तांत सुनाते हुए पूछा- "हे विद्वान ब्राह्मण! कृपा करके अपने ज्ञान-चक्षुओं से देखकर बताइए कि मेरी इस छोटी बहू की संतानों की आयु क्यों नहीं है? यह बार-बार सातवें दिन ही क्यों मर जाते हैं? इसका क्या कारण है और इसका क्या उपाय है?" ।
पंडित जी ने एकाग्रचित्त होकर ध्यान लगाया और अपने दिव्य ज्ञान से वन में घटी उस पूरी घटना को जान लिया। उन्होंने साहूकार के परिवार को बताया कि- "हे साहूकार! तुम्हारी छोटी बहू की कोख साधारण रूप से नहीं बंधी है, अपितु इसे वन की स्याहू (सेही) माता ने अपने शाप से बांध रखा है। इसी कारण जब भी यह किसी संतान को जन्म देती है, वह शाप के प्रभाव से सात दिनों के भीतर मर जाता है। जब तक स्याहू माता स्वयं इसे शाप से मुक्त नहीं करेंगी, तब तक इसकी संतानों की आयु कभी नहीं बढ़ेगी।" ।
पंडित जी का यह वचन सुनकर छोटी बहू रोने लगी और उपाय पूछने लगी। तब पंडित जी ने एक अत्यंत गुप्त और अचूक उपाय बताते हुए कहा- "पुत्री! तू निराश मत हो। वन में एक 'काली सुरही गाय' निवास करती है। वह काली सुरही गाय स्याहू माता की अत्यंत प्रिय सखी और अभिन्न मित्र (भायली) है। यदि तू पूर्ण निष्ठा, भक्ति और मौन रहकर उस सुरही गाय की सेवा करे और उसे अपने सेवा-भाव से प्रसन्न कर ले, तो वह सुरही गाय स्याहू माता से विनती करके तेरी बंधी हुई कोख अवश्य खुलवा सकती है। वही तेरा एकमात्र सहारा है।" ।
सुरही गाय की मौन सेवा और दर्शन प्राप्ति
पंडित जी का यह कल्याणकारी परामर्श सुनकर छोटी बहू के हृदय में आशा की एक नवीन किरण जागी। उसने उसी क्षण से सुरही गाय की सेवा करने का दृढ़ संकल्प ले लिया。
अगले दिन से ही, छोटी बहू प्रतिदिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में (जब आकाश में तारे छिटके रहते और चारों ओर घोर अंधकार होता), चुपचाप अपने घर से निकलकर उस स्थान पर पहुंच जाती जहां काली सुरही गाय विश्राम करती थी । वह गाय के जागने से बहुत पहले ही वहां पहुंच जाती। वह अत्यंत सावधानी और मौन भाव से गाय के नीचे से गोबर आदि हटाती, उस स्थान को झाड़-बुहार कर पूर्णतया स्वच्छ करती, वहां स्वच्छ जल का छिड़काव करती और सुरही गाय के खाने के लिए हरा चारा रखकर, गाय के उठने से पूर्व ही चुपचाप अपने घर वापस लौट आती。
सुरही गाय जब प्रातः काल उठती, तो अपना स्थान इतना स्वच्छ और चारा उपस्थित देखकर अत्यंत आश्चर्यचकित होती। वह नित्य यह देखती कि कोई अज्ञात पुण्यात्मा उसके जागने से पूर्व ही उसकी इतनी सुंदर सेवा और स्थान की सफाई कर जाता है ।
ऐसा करते हुए कई महीने बीत गए। एक दिन सुरही गाय ने मन में दृढ़ विचार किया कि "आजकल कौन सी ऐसी महान आत्मा है जो मेरी इतनी निष्काम और निरंतर सेवा कर रही है? आज तो मैं अवश्य छुपकर देखूंगी कि वह कौन है।"
अगले दिन सुरही गाय बहुत तड़के, आधी रात बीतने के बाद ही जाग गई और आंखें मूंदकर सोने का नाटक करने लगी। कुछ समय पश्चात उसने देखा कि साहूकार की वही छोटी बहू अत्यंत नम्रता और भक्ति-भाव से झाड़ू लेकर उसके स्थान की सफाई कर रही है。
यह दृश्य देखकर सुरही गाय का हृदय वात्सल्य और करुणा से भर गया। वह तुरंत उठी और प्रकट होकर साक्षात् वाणी में बोली- "हे स्त्री! तू कौन है? तू किस प्रयोजन से प्रतिदिन मेरी इतनी निस्वार्थ और कठोर सेवा कर रही है? मैं तेरी इस अनवरत सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तेरी जो भी इच्छा हो, तू मुझसे क्या चाहती है, वह वरदान आज निसंकोच मुझसे मांग ले।" ।
सुरही गाय के मुख से यह अमृतमयी वाणी सुनकर छोटी बहू उसके चरणों में गिर पड़ी। उसके नेत्रों से अश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी। उसने हाथ जोड़कर अपनी करुण व्यथा सुनाते हुए कहा- "हे गौ माता! मैं एक अभागिन स्त्री हूँ। स्याहू माता ने मेरी कोख बांध रखी है, जिसके कारण मेरे जो भी बच्चे उत्पन्न होते हैं, वे सभी सातवें दिन ही मर जाते हैं। मैंने विद्वानों से सुना है कि आप स्याहू माता की परम सखी (भायली) हैं। यदि आप सचमुच मेरी सेवा से प्रसन्न हैं, तो मुझ पर इतनी कृपा कीजिए कि स्याहू माता के पास जाकर मेरी बंधी हुई कोख खुलवा दीजिए। अगर आप मेरी कोख खुलवा दें तो मैं आपका यह महान उपकार जीवन भर नहीं भूलूंगी और मेरी सूनी गोद फिर से भर जाएगी।" ।
छोटी बहू की इस मार्मिक प्रार्थना को सुनकर सुरही गाय को उस पर अत्यधिक दया आ गई। उसने सांत्वना देते हुए कहा- "हे पुत्री! तू तनिक भी चिंता मत कर। मेरी मित्र स्याहू माता यहां से बहुत दूर, सात समुद्र पार रहती है। परंतु मैं तुझे अपनी पीठ पर बिठाकर अभी उनके पास ले चलती हूँ और तेरी कोख अवश्य खुलवाऊंगी।"
यह कहकर काली सुरही गाय ने साहूकार की छोटी बहू को अपनी पीठ पर बिठा लिया और स्याहू माता के निवास की ओर सात समुद्रों को पार करने के लिए एक लंबी यात्रा पर प्रस्थान किया ।
गरुड़ पंखनी के बच्चों की सर्प से रक्षा का रोमांचक प्रसंग
सुरही गाय और छोटी बहू कई दिनों तक निरंतर यात्रा करते रहे। रास्ते में एक ऐसा समय आया जब सूर्य देव अत्यंत प्रखर हो गए। कड़ी धूप और प्रचंड गर्मी के कारण वे दोनों अत्यंत थक गए और उन्हें प्यास सताने लगी。
तभी मार्ग में उन्हें एक अत्यंत विशाल और घना वृक्ष दिखाई दिया। सुरही गाय ने कहा कि "पुत्री! बहुत गर्मी है, कुछ देर इस वृक्ष की ठंडी छाया में विश्राम कर लिया जाए, फिर आगे की यात्रा करेंगे।" यह कहकर दोनों उस पेड़ के नीचे बैठ गए。
उसी विशाल वृक्ष की सबसे ऊंची डाल पर एक 'गरुड़ पंखनी' (एक अत्यंत विशाल और पवित्र पक्षी, जिसे गरुड़ की प्रजाति का माना जाता है) का एक बहुत बड़ा घोंसला था। उस घोंसले में गरुड़ पंखनी के छोटे-छोटे, नवजात बच्चे बैठे थे। गरुड़ पंखनी स्वयं उन बच्चों के लिए भोजन की खोज में कहीं दूर गई हुई थी ।
जब सुरही गाय आंखें मूंदकर विश्राम कर रही थी, तब छोटी बहू की दृष्टि अचानक वृक्ष के तने पर पड़ी। उसने देखा कि एक अत्यंत भयंकर, विषधर और काला सर्प फुफकारता हुआ पेड़ के तने पर चढ़ रहा है और वह सीधा गरुड़ पंखनी के घोंसले की ओर जा रहा है ताकि उन निरीह बच्चों को डस कर अपना ग्रास बना सके。
पक्षी के उन मासूम बच्चों के प्राणों को संकट में देखकर छोटी बहू के भीतर का मातृत्व और साहस जाग उठा। उसने तनिक भी विलंब नहीं किया। उसने आसपास देखा और उसे एक भारी पत्थर (कुछ कथाओं में इसे एक बड़ी ढाल कहा गया है) दिखाई दिया। उसने तुरंत अदम्य साहस का परिचय देते हुए उस भयंकर सर्प को वृक्ष से नीचे गिराया और उस पर प्रहार करके उसे मार डाला। सर्प को मारने के पश्चात, उसने उस मृत सर्प को उसी बड़ी ढाल (या पत्थर) के नीचे छिपाकर दबा दिया, जिससे गरुड़ पंखनी के बच्चों के प्राण सुरक्षित बच गए ।
कुछ समय पश्चात, गरुड़ पंखनी अपनी चोंच में भोजन लेकर वापस अपने घोंसले पर लौटी। जब वह नीचे उतरी तो उसने पेड़ के नीचे सर्प का रक्त (खून) पड़ा हुआ देखा। रक्त देखकर वह अत्यंत विचलित और क्रोधित हो गई। उसने देखा कि पेड़ के नीचे एक स्त्री बैठी है। उसे लगा कि अवश्य ही इस स्त्री ने मेरे बच्चों को मार डाला है और यह उसी का खून है। गरुड़ पंखनी अत्यंत क्रोध में भर गई और उसने चीखते हुए छोटी बहू के ऊपर आक्रमण कर दिया और उसे अपनी पैनी चोंच से मारने लगी ।
छोटी बहू ने स्वयं को बचाते हुए अत्यंत नम्रता और धैर्यपूर्वक कहा- "हे गरुड़ पंखनी माता! शांत हों, शांत हों! मैंने आपके बच्चों को नहीं मारा है, आपके बच्चे तो घोंसले में पूर्णतः सुरक्षित हैं। सत्य तो यह है कि एक भयंकर विषधर सर्प पेड़ पर चढ़कर आपके बच्चों को डसने आ रहा था। मैंने ही उस सर्प को मारकर आपके बच्चों की रक्षा की है। यदि आपको मेरे वचनों पर विश्वास न हो, तो इस ढाल को हटाकर इसके नीचे उस सर्प का मृत शरीर स्वयं देख लें।" ।
यह सुनकर गरुड़ पंखनी ने ढाल को हटाकर देखा तो वहां सचमुच एक भयंकर सर्प मृत पड़ा था। सारी सच्चाई जानकर और अपने बच्चों को जीवित एवं सुरक्षित देखकर गरुड़ पंखनी का क्रोध शांत हो गया और वह अत्यंत प्रसन्न हुई。
उसने कृतज्ञता से भर कर कहा- "हे वीर स्त्री! तूने आज मेरे प्राणों से प्रिय संतानों की रक्षा की है, तूने मुझे पुत्र-शोक से बचाया है। मैं तेरी इस निस्वार्थ सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मांग, तू क्या वरदान मांगती है? तू जो भी मांगेगी, मैं तुझे अवश्य दूंगी।" ।
तब साहूकार की बहू ने हाथ जोड़कर कहा- "हे माता! मुझे कोई भौतिक धन-संपत्ति नहीं चाहिए। सात समुद्र पार स्याहू माता रहती हैं, मेरी कोख उनके पास बंधी है और मुझे वहां तक पहुंचना है। सुरही गाय भी मेरे साथ है, परंतु मार्ग बहुत लंबा है। यदि आप हम दोनों को अपनी विशाल पीठ पर बिठाकर शीघ्रता से सात समुद्र पार स्याहू माता के पास पहुंचा दें, तो मुझ पर आपकी बड़ी कृपा होगी।" ।
गरुड़ पंखनी ने तुरंत उसकी यह बात मान ली। उसने सुरही गाय और छोटी बहू दोनों को अपनी विशाल पीठ पर बैठाया और तीव्र गति से उड़ते हुए, कुछ ही समय में शेष समुद्रों को पार करके उन्हें स्याहू माता के निवास स्थान पर पहुंचा दिया ।
स्याहू माता की सेवा और कोख खुलने का वरदान
स्याहू माता के द्वार पर पहुंचकर सुरही गाय और छोटी बहू ने प्रवेश किया। सुरही गाय को देखते ही स्याहू माता अत्यंत प्रसन्न हुईं और अपनी जगह से उठकर अपनी प्रिय सखी के गले लग गईं。
स्याहू माता ने प्रसन्नतापूर्वक कहा- "आओ बहन! आओ! बहुत दिनों बाद तुमने मुझे दर्शन दिए हैं। कहो कैसे आना हुआ?"
सुरही गाय ने शिष्टाचार के पश्चात कहा- "बस बहन, तुम्हारी याद आई तो मिलने चली आई।"
कुछ देर विश्राम करने के पश्चात स्याहू माता ने अपनी सखी सुरही गाय से कहा- "बहन! बहुत दिनों से मैंने अपने बालों को स्वच्छ नहीं किया है। मेरे सिर में बहुत भयंकर खुजली हो रही है और जूं (तथा लीखें) पड़ गई हैं। मुझे अत्यंत कष्ट हो रहा है, क्या तुम मेरे सिर से ये जूं निकाल दोगी?" ।
सुरही गाय ने अवसर देखकर तुरंत छोटी बहू की ओर संकेत किया। साहूकार की छोटी बहू तुरंत आगे आई। उसने एक सलाई (सीख या बालों की सफाई करने का पारंपरिक उपकरण) ली और अत्यंत प्रेम, धैर्य और श्रद्धा के साथ स्याहू माता के सिर में सलाई डालकर उनकी सारी जूं और लीखें एक-एक करके निकाल दीं ।
अपने सिर का सारा कष्ट दूर होने से और इतना सुख प्राप्त होने से स्याहू माता छोटी बहू पर अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्हें पता नहीं था कि यह वही स्त्री है जिसे उन्होंने शाप दिया था। स्याहू माता ने अत्यंत आह्लादित होकर उसे आशीर्वाद देते हुए कहा- "हे स्त्री! तूने आज मेरे सिर में बहुत सलाई डाली और मुझे बहुत आराम पहुंचाया है। मैं तुझे हृदय से आशीर्वाद देती हूँ कि तेरे घर में सात बेटे और सात बहुएं हों! तू सदा सौभाग्यवती और पुत्रवती रहे।" ।
यह अमूल्य वरदान सुनते ही छोटी बहू के नेत्र सजल हो गए। उसने अपने आंसू पोंछते हुए अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहा- "हे माता! आप मुझे सात पुत्रों का वरदान दे रही हैं, परंतु मेरे तो आज एक भी बेटा जीवित नहीं है, फिर सात बेटे और सात बहुएं कहां से होंगी?" ।
स्याहू माता ने अपने वचन की दृढ़ता बताते हुए कहा- "अरी पगली! मेरा वचन कभी झूठा नहीं हो सकता। मैंने जो वचन एक बार दे दिया, तो दे दिया। वह अवश्य पूर्ण होगा। यदि मैं अपने दिए हुए वचन से फिरूं, तो धोबी के कुण्ड (जहां मैले वस्त्र धोए जाते हैं) पर कंकरी (पत्थर) बन जाऊं! अब तू निसंकोच बता कि तेरी क्या समस्या है?" ।
यह आश्वासन पाकर साहूकार की छोटी बहू ने सत्य उद्घाटित करते हुए कहा- "हे स्याहू माता! यदि ऐसा है, तो मुझे पहचानिए। मैं उसी साहूकार की बहू हूँ जिसकी ननद ने आपके बच्चे को अनजाने में मार दिया था और जिसके बदले आपने मेरी कोख बांधी थी। मेरी कोख तो आपके ही पास बन्द पडी है। जब तक आप मेरी कोख नहीं खोलेंगी, तब तक आपके वरदान के सात पुत्र मुझे कैसे प्राप्त होंगे? यह सुन स्याऊ माता बोली तूने तो मुझे ठग लिया" ।
यह सत्य जानकर स्याहू माता एक क्षण के लिए आश्चर्यचकित रह गईं और बोलीं- "अरी चतुर स्त्री! तूने तो अपनी सेवा और निष्ठा से मुझे बहुत बुरी तरह ठग लिया है। मैं तेरी कोख खोलना तो नहीं चाहती थी, परंतु अब मुझे खोलनी ही पड़ेगी। मेरा वरदान व्यर्थ नहीं जा सकता। मैं प्रसन्न होकर तेरी कोख खोलती हूँ।"
स्याहू माता ने उसे पूर्ण शाप-मुक्त करते हुए कहा- "जा, अपने घर जा। वहां तुझे तेरे सातों मृत पुत्र जीवित अवस्था में मिलेंगे और उनके साथ उनकी सातों बहुएं भी मिलेंगी। तू जाकर अपने घर अहोई अष्टमी का व्रत और विधि-विधान से पूजन कर। तू उजमन (उद्यापन) करियों, सात अहोई बनाकर सात कढ़ाई करियो (अर्थात सात प्रकार के पकवान/हलवा-पूड़ी बनाकर मेरा भोग लगाना) और इस दिन का उत्सव मनाना।" ।
घर वापसी, परिवार का मिलन और जेठानियों का आश्चर्य
स्याहू माता से यह अमृतमयी वरदान पाकर, और सुरही गाय एवं गरुड़ पंखनी का हृदय से आभार व्यक्त कर, छोटी बहू अत्यंत प्रसन्न मन से अपने घर की ओर लौट पड़ी。
जैसे ही वह यात्रा पूरी करके अपने घर के द्वार पर पहुंची, उसने एक ऐसा अलौकिक चमत्कार देखा जिस पर उसे अपनी ही आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसके घर के आंगन में वे सातों पुत्र, जो सात-सात दिन की आयु में मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे, पूर्णतः युवा और जीवित अवस्था में बैठे थे, और उनके साथ उनकी सातों सुंदर बहुएं भी उपस्थित थीं ।
यह दृश्य देखकर छोटी बहू का हृदय हर्ष, वात्सल्य और कृतज्ञता से भर गया। उसने दौड़कर अपने सातों पुत्रों को गले लगा लिया। घर में आनंद की लहर दौड़ गई। स्याहू माता के आदेशानुसार और उनकी असीम कृपा को मानते हुए, उसने उसी दिन पूर्ण विधि-विधान से अहोई अष्टमी का व्रत किया। उसने दीवार पर अहोई माता की आकृति बनाई, सात अहोई बनाईं, माता के निमित्त सात कढ़ाई (हलवा, पूड़ी और गुलगुले आदि का भोग) कीं, सात उजमन (उद्यापन के संकल्प) किए और पूरे परिवार के साथ धूमधाम से माता का पूजन किया ।
उसी दिन संध्या के समय, घर की छह बड़ी जेठानियां (बड़ी भाभियां), जिन्होंने शाप लेने से मना कर दिया था, वे अपने-अपने घरों में पूजा की तैयारी कर रही थीं। वे आपस में ईर्ष्या और कौतूहलवश चर्चा करने लगीं। उन्होंने एक-दूसरे से कहा कि "जल्दी-जल्दी नहाकर अपनी पूजा समाप्त कर लो, कहीं ऐसा न हो कि थोड़ी देर में हमारी छोटी (छोटी बहू) हमेशा की तरह अपने मरे हुए बच्चों को याद करके फूट-फूट कर रोने लगे और उसकी रोने की आवाज से हमारी पूजा में विघ्न उत्पन्न हो।" ।
परंतु जब बहुत देर तक छोटी बहू के घर से रोने या विलाप करने की कोई ध्वनि नहीं आई, तो जेठानियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने अपने बच्चों को यह देखने भेजा कि "जाओ, अपनी चाची के घर जाकर देख आओ कि वह आज अभी तक रोई क्यों नहीं है?" ।
बच्चे दौड़कर अपनी छोटी चाची के घर गए। वहां का दृश्य देखकर वे हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने वापस आकर अपनी माताओं को बताया कि "अरे मां! चाची तो आज बिल्कुल भी नहीं रो रही हैं, बल्कि उनके घर तो बहुत भारी उजमान (उत्सव) हो रहा है, खूब हलवा-पूड़ी बंट रहा है, वे तो कुछ मांड रही हैं, सात अहोई और सात कढ़ाई करके उत्सव मना रही हैं, और उनके घर में तो सात लड़के और सात बहुएं बैठे हैं!" ।
यह अद्भुत और अविश्वसनीय समाचार सुनते ही सातों जेठानियां दौड़ी-दौड़ी छोटी बहू के घर आईं। उन्होंने अपनी आंखों से इस चमत्कार को देखा तो वे आश्चर्यचकित रह गईं और पूछने लगीं- "अरी छोटी! यह सब कैसे हुआ? तूने अपनी वह बंधी हुई कोख कैसे छुड़ाई?" ।
छोटी बहू ने अत्यंत शांत और सौम्य स्वर में उत्तर दिया- "भाभी जी! आप लोगों ने तो अपनी संतानों के मोह में अपनी कोख बंधाई ही नहीं थी। मैंने अपनी सासू जी के क्रोध और ननद के भाग्य की रक्षा के लिए अपनी कोख बंधा ली थी। आज मेरी सेवा, तपस्या और अहोई अष्टमी के व्रत से प्रसन्न होकर स्याहू माता ने मुझ पर महान कृपा की है और मेरी बंधी हुई कोख को हमेशा के लिए खोल दिया है। उन्हीं माता के आशीर्वाद से मेरे ये सातों पुत्र और बहुएं मुझे पुनः प्राप्त हुए हैं।" ।
यह सुनकर सभी जेठानियों का अहंकार टूट गया। उन्होंने छोटी बहू के त्याग की सराहना की और सभी ने मिलकर अहोई (स्याहू) माता की जय-जयकार की। उस दिन के पश्चात से संपूर्ण नगर और क्षेत्र में अहोई अष्टमी व्रत की महिमा फैल गई और सभी माताएं अपने बच्चों की रक्षा के लिए यह व्रत अत्यंत श्रद्धा से करने लगीं。
द्वितीय अध्याय: कथा का दूसरा लोक-प्रचलित स्वरूप (साहूकार की बहू का प्रत्यक्ष प्रसंग)
यद्यपि उपरोक्त कथा सर्वाधिक विस्तृत है, तथापि विभिन्न लोक-परंपराओं और कुछ अंचलों में अहोई अष्टमी की कथा का एक अन्य स्वरूप भी अत्यंत श्रद्धापूर्वक पढ़ा और सुना जाता है। इस स्वरूप में ननद का प्रसंग नहीं होता, अपितु साहूकार की बहू स्वयं ही प्रत्यक्ष रूप से मुख्य पात्र होती है। व्रत की पूर्णता और सभी परंपराओं के समावेश हेतु इस पारंपरिक पाठ का विस्तारपूर्वक वर्णन भी यहां प्रस्तुत किया जा रहा है:
प्राचीन काल की बात है, किसी समृद्ध नगर में एक अत्यंत धनवान साहूकार निवास करता था। उसके परिवार में उसके कई पुत्र और बहुएं थीं। साहूकार का परिवार अत्यंत धार्मिक और उत्सव-प्रेमी था。
कार्तिक का महीना चल रहा था और कुछ ही दिनों पश्चात दीपावली का महान पर्व आने वाला था। दीपावली की तैयारियों के निमित्त साहूकार के घर की सभी बहुएं अपने घर को स्वच्छ करने, उसे सुंदर बनाने और उसकी लिपाई-पुताई करने के कार्य में उत्साहपूर्वक जुट गईं। घर की दीवारों को चमकाने और उन्हें पारंपरिक पीला रंग देने के उद्देश्य से, साहूकार की छोटी बहू समीप के एक घने वन में पीली मिट्टी लेने के लिए गई ।
वन में पहुंचकर वह एक स्थान पर बैठ गई और अपनी लोहे की कुदाल (खुरपी) से मिट्टी काटने लगी। वह मिट्टी काटने में इतनी मग्न थी कि उसे इस बात का तनिक भी भान नहीं रहा कि वह जिस स्थान पर प्रहार कर रही है, उसके ठीक नीचे क्या है। दुर्भाग्य से, उसी मिट्टी के ढेर के नीचे एक कांटे वाले पशु, साही (स्याहू) का एक छोटा सा बच्चा छिपा हुआ बैठा था ।
जैसे ही छोटी बहू ने मिट्टी काटने के लिए जोर से खुरपी चलाई, वह तेज खुरपी सीधे साही के उस कोमल बच्चे को जा लगी। खुरपी का वार इतना भयंकर और गहरा था कि साही के उस छोटे बच्चे की तत्काल, उसी क्षण मृत्यु हो गई ।
जब साही (स्याहू माता) वहां पहुंची और उसने अपने प्राणों से प्यारे बच्चे को लहूलुहान और मृत अवस्था में देखा, तो वह अत्यंत शोक-संतप्त और भयंकर रूप से क्रोधित हो उठी। विलाप करते हुए और क्रोध से कांपते हुए उसने साहूकार की बहू को वहीं खड़े-खड़े एक अत्यंत कठोर शाप दिया। उसने कहा- "हे पापिनी! जिस प्रकार तेरे इन क्रूर हाथों से मेरे निरपराध बच्चे की मृत्यु हुई है, जिस प्रकार आज तूने मेरी कोख सूनी की है और मुझे पुत्र-शोक दिया है, उसी प्रकार मैं भी आज तेरी कोख को हमेशा के लिए सूनी कर दूंगी। तेरी कोख से उत्पन्न होने वाली कोई भी संतान कभी जीवित नहीं बचेगी!" ।
इस भयंकर शाप को सुनकर साहूकार की बहू भयभीत हो गई और रोती हुई घर लौट आई। कुछ समय पश्चात शाप ने अपना भयंकर प्रभाव दिखाना प्रारंभ कर दिया। शाप के प्रभाव स्वरूप, छोटी बहू के गर्भ से जितने भी पुत्र उत्पन्न होते, वे कुछ ही दिनों में, बिना किसी बीमारी के मृत्यु को प्राप्त हो जाते। अपने बच्चों की निरंतर हो रही मृत्यु से बहू अत्यंत दुखी, हताश और निराश हो गई। उसके जीवन से सारा आनंद समाप्त हो गया ।
अपने मृत बच्चों को पुनः जीवित करने और साही माता के इस दारुण शाप से स्थायी रूप से मुक्ति पाने के लिए साहूकार की बहू ने एक अत्यंत कठोर संकल्प लिया। उसने सच्चे मन, पूर्ण निष्ठा और अखंड विश्वास के साथ माता भगवती (अहोई माता) और स्याहू माता की कठोर आराधना प्रारंभ कर दी。
उसने नियम लिया कि वह प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अपनी संतानों की आयु और सुरक्षा के लिए पूर्णतया निर्जला व्रत रखेगी । वह अष्टमी के दिन प्रातः काल से अन्न-जल का त्याग कर देती, घर की दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाती, उनके सम्मुख कलश स्थापित करती और पूर्ण निष्ठा से पूजा-अर्चना करते हुए अपनी अनजाने में की गई उस भूल के लिए अश्रु बहाकर क्षमा-याचना करती。
उसकी इस कठोर तपस्या, वर्षों तक किए गए निर्जल व्रत के अडिग पालन, और सच्चे हृदय से मांगी गई पश्चात्तापपूर्ण क्षमा से जगत-जननी अहोई माता का हृदय अंततः पसीज गया। माता ने उसकी करुण पुकार सुन ली। उन्होंने साक्षात् प्रकट होकर या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी असीम कृपा बरसाते हुए उस साहूकार की बहू को क्षमा कर दिया और उसे उस भयंकर शाप से पूर्णतया मुक्त कर दिया。
अहोई माता के इस दिव्य आशीर्वाद और चमत्कार से साहूकार की बहू की वे सभी मृत संतानें, जो शाप के कारण काल-कवलित हो गई थीं, वे पुनः जीवित हो उठीं और उसका घर एक बार फिर बच्चों की मधुर किलकारियों से गूंज उठा ।
यह अद्भुत चमत्कार देखकर पूरे नगर और समाज में अहोई अष्टमी के व्रत की अपार महिमा फैल गई। सभी ने माता की शक्ति को स्वीकार किया और तब से लेकर आज तक, प्रत्येक माता अपनी संतानों की रक्षा, उनके उज्ज्वल भविष्य और उनकी लंबी आयु के लिए कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन इस महान अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत करती आ रही है。
तृतीय अध्याय: अहोई अष्टमी व्रत की पारंपरिक फलश्रुति और उपसंहार
सनातन हिंदू व्रत-कथा परंपरा में कोई भी व्रत अथवा कथा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक कि उसके अंत में 'फलश्रुति' (कथा श्रवण का महात्म्य और उसके फलस्वरूप प्राप्त होने वाला आशीर्वाद) का पूर्ण रूप से पाठ न किया जाए। अहोई अष्टमी की उपरोक्त कथा (चाहे वह प्रथम संस्करण हो या द्वितीय) समाप्त होने के ठीक पश्चात, कथा सुनने वाली सभी माताएं अपने हाथ में लिए हुए धान्य (गेहूं आदि) को अहोई माता के चित्र के समक्ष या कलश के पास अर्पित करते हुए निम्नलिखित फल-वचनों (आशीर्वाद) का अत्यंत श्रद्धापूर्वक सामूहिक उच्चारण करती हैं :
पारंपरिक फल-वचन एवं प्रार्थना:
"हे अहोई माता! हे स्याहू माता! हे परम कल्याणी! जिस प्रकार आपने उस साहूकार की छोटी बहू की पुकार सुनी, जिस प्रकार आपने उस पर अपनी असीम कृपा की, जिस प्रकार आपने उसकी बंधी हुई कोख को खोल दिया और उसके सातों मृत पुत्रों को बहुओं सहित पुनः जीवित कर दिया, उसी प्रकार हे माता! संसार की सभी माताओं पर अपनी अपार कृपा करना।" ।
"हे माता! जैसे आपने शाप देकर साहूकार की बहू की कोख बांधी थी, वैसी कोख आप किसी की मत बांधना (और किसी की बांधो ना)। और जैसे आपने अंत में क्षमा करके उसके पुत्रों की रक्षा की और उन्हें दीर्घायु प्रदान की, वैसे ही हे माता! हम सभी की संतानों की सदैव रक्षा करना।" ।
"हे अहोई मैया! इस पवित्र कथा को कहने वाले की, इस कथा को एकाग्रचित्त होकर सुनने वाले की, कथा के मध्य में हुंकारा भरने वाले की, और उनके पूरे परिवार की कोख सदा हरी-भरी रखना। सभी की संतानों को उत्तम स्वास्थ्य, अपार सुख, निरंतर समृद्धि, महान यश, अखंड वैभव, धन-धान्य और पूर्ण आरोग्य प्रदान करना।" ।
"संसार की सभी माताएं सदा पुत्रवती और सौभाग्यवती हों, ऐसा अनुपम वरदान हे मैया आप देना। सभी माताओं की संतानें सदा सुखी रहें, उनके जीवन में कभी कोई अकाल मृत्यु या संकट न आए, ऐसा कल्याणकारी काम तुम कर जाना।" ।
अहोई माता की पारंपरिक स्तुति, भजन एवं जयकारा
फल-वचनों के पश्चात पारंपरिक रूप से माता का स्तुति-गान किया जाता है:
"अहोई माता की जय!
स्याहू माता की जय!
गौ माता की जय!
गरुड़ पंखनी माता की जय!"
चंदन तिलक अहोई मां का, जो करता है गुणगान। अहोई कथा बड़ी है महान, अहोई कथा बड़ी है महान॥ ।
जो भी माता आज के दिन निर्जला उपवास रखकर, रात में तारों को अर्घ्य देकर तुम्हारा पूजन करे, धूप-दीप-नैवेद्य से तुम्हारी आरती उतारे, उसका तुम बेड़ा पार करना। संसार की माताएं करती सदा तुम्हारी जय-जयकार हैं। अष्टमी नमो नमः, माता अहोई नमो नमः। आदि भवानी नमो नमः, मां कल्याणी नमो नमः॥ ।
बोलो जय हो मां, इसी बहू के आई, ऊंची कर दी शान। बोलो जय अहोई मां, जय अहोई मां! हम सब ने इस व्रत कथा का, भजन में करा बखान। बोलो जय अहोई मां, जय अहोई मां! ।
(यहां पर पारंपरिक रूप से इस व्रत-कथा का पवित्र पाठ विश्राम लेता है। कथा-श्रवण के उपरांत माताएं अहोई माता के समक्ष अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार हलवा, पूरी, चने और मीठे पुओं (गुलगुले) की 'कढ़ाई' का भोग अर्पण करती हैं। संपूर्ण दिन निर्जल उपवास रखने के पश्चात, जब संध्या के समय सूर्य अस्त हो जाता है और आकाश में तारे छिटकने लगते हैं, तब उन तारों के दर्शन करके (कुछ क्षेत्रों में चंद्रोदय के समय चंद्रमा को) जल का अर्घ्य देकर माताएं जल और अन्न ग्रहण कर अपना पारण करती हैं और अपनी संतानों को प्रसाद देकर उनके सुखमय जीवन का आशीर्वाद देती हैं।) ।