द्वितीया श्राद्ध: शास्त्र-प्रमाणित स्वरूप, विधि, रहस्य, महत्व एवं फल-मीमांसा
1. प्रस्तावना: श्राद्ध मीमांसा एवं धर्मशास्त्रीय पीठिका
सनातन धर्म के विस्तृत और गहन कर्मकाण्ड विज्ञान में 'श्राद्ध' का स्थान अत्यंत उच्च और अनिवार्य माना गया है। धर्मशास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों के समग्र अनुशीलन से यह स्पष्ट होता है कि देवोपासना के समान ही, अथवा उससे भी अधिक सूक्ष्मता से पितृ-उपासना का विधान किया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद का स्पष्ट आदेश है— "देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्" अर्थात् देवता और पितरों के निमित्त किए जाने वाले कार्यों में किसी भी प्रकार का प्रमाद (लापरवाही) नहीं करना चाहिए । वैदिक सनातन परम्परा में जीवन को तीन ऋणों (देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण) से युक्त माना गया है, जिनमें से पितृ ऋण से उऋण होने का एक मात्र शास्त्र-सम्मत साधन श्राद्ध और तर्पण है ।
'श्राद्ध' शब्द की व्युत्पत्ति 'श्रद्धा' से हुई है। महर्षि मरीचि ने श्राद्ध को परिभाषित करते हुए कहा है:
अर्थात्— प्रेत (तत्काल मृत जीवात्मा) अथवा पितरों को उद्देश्य करके, जो भोज्य पदार्थ स्वयं को प्रिय हों, उन्हें पूर्ण श्रद्धा के साथ सुपात्र ब्राह्मणों के माध्यम से अर्पित करना ही 'श्राद्ध' कहलाता है । इसी प्रकार ब्रह्म पुराण में भी यह प्रतिपादित किया गया है कि देश, काल और पात्र का विचार करके उचित विधि द्वारा पितरों को लक्ष्य करके जो द्रव्य श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह श्राद्ध है ।
याज्ञवल्क्य स्मृति के महान टीकाकार विज्ञानेश्वर ने 'मिताक्षरा' टीका में श्राद्ध का लक्षण स्पष्ट करते हुए लिखा है: "पितॄनुद्दिश्य श्रद्धया दीयमानं द्रव्यं श्राद्धम्" अर्थात् पितरों के कल्याण के लिए श्रद्धायुक्त होकर किसी द्रव्य का त्याग करना श्राद्ध है । कल्पतरु और श्राद्धविवेक जैसे निबन्ध ग्रन्थों में भी इसी परिभाषा का समर्थन किया गया है ।
श्राद्ध-कर्म कोई अंधविश्वास या निरर्थक कर्म नहीं है, अपितु यह एक अत्यंत वैज्ञानिक और पारलौकिक प्रक्रिया है। याज्ञवल्क्य स्मृति (1.268) के अनुसार, श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता 'वसु, रुद्र और आदित्य' हैं । जब कोई वंशज अपने पूर्वजों (पिता, पितामह, प्रपितामह) के निमित्त श्राद्ध करता है, तो ये तीनों देवता क्रमशः उन तीन पीढ़ियों के प्रतिनिधि के रूप में उस हव्य-कव्य को ग्रहण करते हैं और उसे सूक्ष्म रूप में उन मृत पितरों तक पहुँचाते हैं ।
श्रीमद्भागवत महापुराण (7.10.22) में भी श्राद्ध की अनिवार्यता का वर्णन मिलता है, जहाँ भगवान नृसिंह प्रह्लाद को अपने पिता हिरण्यकशिपु के निमित्त श्राद्ध कर्म करने का आदेश देते हुए कहते हैं:
यद्यपि भगवान के स्पर्श से हिरण्यकशिपु पवित्र हो चुका था, तथापि लोक-मर्यादा और पितृ-कर्म की अनिवार्यता को स्थापित करने के लिए भगवान ने प्रह्लाद को श्राद्ध करने का निर्देश दिया । इससे यह सिद्ध होता है कि श्राद्ध-कर्म प्रत्येक गृहस्थ का अनिवार्य कर्तव्य है।
इस विस्तृत शोध-प्रबन्ध में हम चान्द्र-मास की 'द्वितीया तिथि' के सन्दर्भ में किए जाने वाले श्राद्ध (द्वितीया श्राद्ध) के तात्विक स्वरूप, उसके अधिकारी पितरों, उसके पारलौकिक व काम्य फलों, और शास्त्र-विहित सम्पूर्ण विधि का गहन विश्लेषण करेंगे।
2. द्वितीया श्राद्ध का शास्त्रीय स्वरूप और आधार
वैदिक काल-गणना के अनुसार एक चान्द्र-मास में दो पक्ष होते हैं— शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। प्रत्येक पक्ष में पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, जिनमें 'द्वितीया' चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है। 'द्वितीया श्राद्ध' का तात्पर्य उस श्राद्ध कर्म से है जो किसी भी मास की द्वितीया तिथि को, विशेषकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष (जिसे पितृ पक्ष या महालय कहा जाता है) की द्वितीया तिथि को सम्पन्न किया जाता है । इसे सामान्य भाषा में 'दूज का श्राद्ध' भी कहा जाता है ।
2.1 पार्वण और एकोद्दिष्ट श्राद्ध में द्वितीया का प्रयोग
शास्त्रों में श्राद्ध के मुख्य रूप से चार भेद माने गए हैं— पार्वण, एकोद्दिष्ट, नान्दीमुख (वृद्धिश्राद्ध) और सपिण्डीकरण । द्वितीया तिथि पर मुख्यतः दो प्रकार के श्राद्ध सम्पादित हो सकते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि श्राद्ध किस अवसर पर किया जा रहा है:
- 1. एकोद्दिष्ट श्राद्ध (क्षयाह श्राद्ध): यदि किसी परिजन की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, तो उसकी मृत्यु के ठीक एक वर्ष पश्चात् (और उसके बाद प्रतिवर्ष) उसी द्वितीया तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है, वह 'एकोद्दिष्ट श्राद्ध' कहलाता है । इसमें केवल उसी एक मृत व्यक्ति (उद्देश्य) के लिए एक पिण्ड का दान किया जाता है ।
- 2. पार्वण श्राद्ध (महालय श्राद्ध): पितृ पक्ष (महालय) की द्वितीया को जो श्राद्ध किया जाता है, वह 'पार्वण श्राद्ध' होता है । पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों (पिता, पितामह, प्रपितामह) तथा माता पक्ष (मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह) का सतीक (पत्नी सहित) आवाहन किया जाता है । महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों (पुरूरवा और आर्द्रव, अथवा क्रतु और दक्ष) की स्थापना अनिवार्य होती है ।
श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु के अनुसार, महालय के 16 दिनों (पूर्णिमा से अमावस्या तक) में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण विधि से ही होना चाहिए, भले ही मृत्यु की तिथि कोई भी रही हो । जो जीवात्माएँ पितृलोक को प्राप्त हो चुकी हैं, वे महालय के समय अपने वंशजों के निकट सूक्ष्म रूप में आती हैं और अपने निमित्त किए जाने वाले पार्वण श्राद्ध की प्रतीक्षा करती हैं ।
3. अधिकारी पितृगण: द्वितीया तिथि के श्राद्ध का अधिकार
श्राद्ध कर्म में 'तिथि' का अत्यंत सूक्ष्म और गणितीय महत्त्व है। शास्त्रों का अकाट्य नियम है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु (प्राण-त्याग) जिस चान्द्र-तिथि को हुई हो, पितृ पक्ष में उसका पार्वण श्राद्ध उसी तिथि को सम्पन्न किया जाना चाहिए ।
3.1 सामान्य मृत्यु का नियम
विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण और श्राद्ध कल्पलता के अनुसार, जिन पितरों (माता, पिता, भ्राता, पत्नी अथवा अन्य कोई सपिण्ड) का देहावसान किसी भी मास के शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ हो, उनका वार्षिक क्षयाह श्राद्ध तथा पितृ पक्ष (महालय) का श्राद्ध अनिवार्य रूप से 'द्वितीया तिथि' को ही किया जाता है । मृत्यु चाहे दिन में हुई हो अथवा रात्रि में, मृत्यु के समय जो तिथि प्रवृत्त थी, पारलौकिक कर्मकाण्ड के लिए वही तिथि उस जीवात्मा की 'श्राद्ध तिथि' मान ली जाती है ।
3.2 विशेष मृत्यु के अपवाद और द्वितीया तिथि की सीमा
धर्मशास्त्रों में मृत्यु के प्रकार (यथा स्वाभाविक मृत्यु, अकाल मृत्यु, सधवा अवस्था में मृत्यु आदि) के आधार पर श्राद्ध की तिथियों के लिए विशेष अपवाद निर्धारित किए गए हैं। इन अपवादों को समझना इसलिए आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि द्वितीया तिथि का अधिकार किन पितरों को प्राप्त नहीं है, भले ही उनकी मृत्यु द्वितीया को हुई हो।
| मृत्यु का प्रकार | शास्त्र-निर्धारित विशिष्ट श्राद्ध तिथि | द्वितीया तिथि पर इसका प्रभाव |
|---|---|---|
| स्वाभाविक मृत्यु (द्वितीया को) | द्वितीया (महालय की) | द्वितीया को ही पार्वण श्राद्ध होगा । |
| अकाल मृत्यु (शस्त्र, विष, दुर्घटना) | चतुर्दशी (महालय की) | यदि किसी की अकाल मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो उसका महालय श्राद्ध द्वितीया को नहीं, अपितु चतुर्दशी को होगा । |
| सौभाग्यवती स्त्री (सधवा मृत्यु) | नवमी (मातृ-नवमी) | यदि सधवा स्त्री की मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो पारिवारिक परम्परानुसार नवमी को उसका श्राद्ध करना श्रेष्ठ है, यद्यपि कुछ मतों में द्वितीया को भी किया जा सकता है । |
| संन्यासी / यति मृत्यु | द्वादशी (महालय की) | यदि किसी संन्यासी की मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो उसका श्राद्ध महालय की द्वादशी को ही किया जाएगा । |
| तिथि अज्ञात होने पर | सर्वपितृ अमावस्या | यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो अमावस्या को श्राद्ध होगा । |
उपर्युक्त विश्लेषण से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि द्वितीया श्राद्ध विशेष रूप से उन पितरों के लिए आरक्षित है जिनकी मृत्यु अकाल या अप्राकृतिक न होकर स्वाभाविक रूप से द्वितीया तिथि (शुक्ल या कृष्ण) को हुई हो । इस दिन किए गए श्राद्ध से द्वितीया तिथि के स्वामी और अधिष्ठाता देवता अत्यंत प्रसन्न होकर जीवात्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर करते हैं।
4. द्वितीया तिथि का पारलौकिक महत्त्व एवं काम्य फल (याज्ञवल्क्य स्मृति के सन्दर्भ में)
श्राद्ध केवल एक कर्तव्य या नित्य कर्म ही नहीं है, अपितु इसे 'काम्य कर्म' (इच्छा पूर्ति हेतु किया जाने वाला कर्म) के रूप में भी शास्त्रों में मान्यता प्राप्त है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी 'याज्ञवल्क्य स्मृति' के आचाराध्याय (श्राद्ध प्रकरण) में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की तिथियों पर श्राद्ध करने से मिलने वाले विशिष्ट फलों (काम्य फलों) का अत्यंत विशद और प्रमाणिक वर्णन किया है।
याज्ञवल्क्य स्मृति (1.264) में द्वितीया तिथि के श्राद्ध के फल का निरूपण करते हुए कहा गया है:
इस श्लोक में तिथियों के क्रम से (प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया आदि) फल निर्दिष्ट हैं। 'नृसिंह प्रसाद: श्राद्धसारः' और अन्य टीकाओं के अनुसार इसका सटीक अन्वय और अर्थ इस प्रकार है:
- प्रतिपदि कन्यां: प्रतिपदा को श्राद्ध करने से उत्तम कन्याओं की प्राप्ति होती है ।
- द्वितीयायां कन्यावेदिनश्च / पशून्: जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे "कन्यावेदिन" अर्थात् अपनी कन्याओं के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर (दामाद) की प्राप्ति होती है । इसके अतिरिक्त, द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को "पशून् वै" अर्थात् उत्तम कोटि के पशु-धन (गौ, अश्व आदि) की प्राप्ति होती है ।
कृषि प्रधान और गौ-आधारित वैदिक समाज में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था। अतः याज्ञवल्क्य स्मृति का यह उद्घोष कि द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन और सुयोग्य दामाद की प्राप्ति होती है, इस तिथि के श्राद्ध को पारिवारिक सुख, सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने और आर्थिक समृद्धि (पशु-धन) के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना देता है ।
याज्ञवल्क्य स्मृति (1.270) में ही श्राद्ध के सामान्य फल का उद्घोष करते हुए महर्षि कहते हैं:
अर्थात्— श्राद्ध से पूर्णतः तृप्त हुए पितर अपने वंशजों को दीर्घ आयु, उत्तम प्रजा (सन्तान), धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, समस्त सुख और यहाँ तक कि राज्य की भी प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं । द्वितीया श्राद्ध करने वाले साधक को ये सभी सामान्य फल तो प्राप्त होते ही हैं, साथ ही उसे द्वितीया का विशिष्ट काम्य फल (कन्यावेदिन और पशु-धन) भी स्वतः प्राप्त हो जाता है।
4.1 अन्य तिथियों की तुलना में द्वितीया के काम्य फलों का वैविध्य
तिथियों के अनुसार फलों की तुलना करने से द्वितीया की महत्ता और अधिक स्पष्ट होती है:
| श्राद्ध तिथि | काम्य फल (याज्ञवल्क्य स्मृति एवं नृसिंह प्रसाद के अनुसार) |
|---|---|
| प्रतिपदा | उत्तम कन्या की प्राप्ति। |
| द्वितीया | कन्या के लिए सुयोग्य वर (दामाद) तथा प्रचुर पशु-धन की प्राप्ति। |
| तृतीया | अश्व (घोड़े) आदि वाहनों की प्राप्ति। |
| चतुर्थी | क्षुद्र पशु (भेड़, बकरी आदि) की प्राप्ति। |
| पञ्चमी | उत्तम पुत्रों की प्राप्ति। |
| षष्ठी | द्यूत (क्रीड़ा/आमोद-प्रमोद) में विजय। |
| सप्तमी | कृषि में अभूतपूर्व सफलता। |
| अष्टमी | वाणिज्य (व्यापार) में अत्यधिक लाभ। |
अतः स्पष्ट है कि जो गृहस्थ अपनी कन्या के विवाह को लेकर चिन्तित हैं अथवा पशु-धन (वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भौतिक सम्पदा या वाहन) की वृद्धि चाहते हैं, उनके लिए द्वितीया श्राद्ध का अनुष्ठान शास्त्रों में अमोघ उपाय बताया गया है।
5. पुराणों में द्वितीया श्राद्ध का माहात्म्य: स्कन्द, पद्म और ब्रह्म पुराण का मत
5.1 स्कन्द पुराण: कैलास प्राप्ति और शिव-सायुज्य का साधन
स्कन्द महापुराण के नागर खण्ड (अध्याय 230) में महर्षि व्यास ने महालय (पितृ पक्ष) की द्वितीया को श्राद्ध करने के सर्वोत्कृष्ट पारलौकिक फल का गान किया है:
सटीक अर्थ: जो मनुष्य महालय (पितृ पक्ष) की 'द्वितीया तिथि' को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर (शिव) अत्यंत प्रसन्न होते हैं । वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के पश्चात् निश्चित रूप से कैलास धाम को प्राप्त करता है और भगवान शिव के गणों के साथ मोद (आनन्द) प्राप्त करता है। प्रसन्न होकर भगवान शिव उसे इस लोक में भी विपुल सम्पदा (विपुलां सम्पदं) प्रदान करते हैं ।
इसी क्रम में स्कन्द पुराण श्राद्ध न करने वालों के लिए कठोर दण्ड का भी विधान करता है:
सटीक अर्थ: जो मनुष्य द्वितीया तिथि को (अधिकार होने पर भी) महालय का श्राद्ध नहीं करता, भगवान शम्भु (शिव) उस पर कुपित हो जाते हैं और उसके ब्रह्म-वर्चस्व (तेज और पुण्य) का सर्वथा नाश कर देते हैं । इतना ही नहीं, मृत्यु के पश्चात् उसे रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है । यह श्लोक द्वितीया श्राद्ध की अकाट्य अनिवार्यता और उसके उल्लंघन से उत्पन्न होने वाले भयंकर दोष को रेखांकित करता है。
5.2 पद्म पुराण: यम-द्वितीया का रहस्य और नारकीय जीवों की तृप्ति
पद्म पुराण (कार्तिक माहात्म्य) में द्वितीया तिथि का साक्षात् सम्बन्ध मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी 'यमराज' से स्थापित किया गया है। यद्यपि पद्म पुराण का यह प्रसंग कार्तिक मास की यम-द्वितीया (भ्रातृ-द्वितीया) से सम्बंधित है, किन्तु धर्मशास्त्रों के अनुसार द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है ।
सटीक अर्थ: प्राचीन काल में द्वितीया तिथि के दिन ही देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था और उनकी अर्चना की थी । इस सत्कार से यमराज इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने द्वितीया तिथि को एक महान उत्सव (महोत्सर्ग) घोषित कर दिया। इस तिथि के प्रभाव से नरक में यातना भोग रहे जीवों (नारकीयाश्च तर्पिताः) को भी कुछ समय के लिए तृप्ति और शीतलता प्राप्त होती है ।
अतः जब पितृ पक्ष की द्वितीया को श्राद्ध किया जाता है, तो यमराज की विशिष्ट प्रसन्नता के कारण पितरों को यमदूतों की यातना नहीं सहनी पड़ती और वे सरलता से ऊर्ध्व लोकों की ओर गमन करते हैं。
5.3 ब्रह्म पुराण: द्वितीया श्राद्ध में विशेष द्रव्य (हवि) का विधान
वीरमित्रोदय के 'श्राद्धप्रकाश' नामक ग्रन्थ में ब्रह्म पुराण का एक विशिष्ट श्लोक उद्धृत है, जो तिथियों के अनुसार श्राद्ध में प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों (हविष्यान्न) का निर्देश करता है:
सटीक अर्थ: प्रतिपदा को शाक (पत्तेदार सब्जियों) से पितरों को तृप्त करना चाहिए। प्राजापत्य स्वरूप वाली 'द्वितीया तिथि' को यज्ञीय माँस से पितरों को संतर्पित करना चाहिए, और तृतीया को अपूप (पूए या मीठे पकवान) से श्राद्ध करना चाहिए ।
शास्त्रार्थ एवं कलिवर्ज्य नियम: यद्यपि ब्रह्म पुराण के इस श्लोक में द्वितीया श्राद्ध में माँस के प्रयोग का उल्लेख है, किन्तु वीरमित्रोदय और धर्मसिन्धु के प्रणेताओं ने इसे 'युग-धर्म' के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट किया है। वैदिक और आरम्भिक पौराणिक काल (सत्य, त्रेता, द्वापर) में श्राद्ध में यज्ञीय पशुओं (जैसे रुरु नामक मृग) के माँस का विधान था। किन्तु कलियुग में यह सर्वथा कलिवर्ज्य (कलियुग में निषिद्ध) है । वर्तमान शास्त्रीय व्यवस्था के अनुसार द्वितीया के दिन माँस के स्थान पर पवित्र उड़द (माष), दुग्ध, घृत (घी) और मधु (शहद) का ही प्रयोग किया जाता है। घृत और उड़द को माँस का ही सात्विक विकल्प माना गया है ।
6. गरुड़ पुराण एवं विष्णु पुराण का श्राद्ध-विज्ञान: हवि का रूपान्तरण
द्वितीया श्राद्ध के सन्दर्भ में आधुनिक मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अग्नि में दी गई आहुति या ब्राह्मण को खिलाया गया अन्न उन पितरों तक कैसे पहुँचता है, जो अपनी मृत्यु के पश्चात किसी अन्य योनि (मनुष्य, पशु, पक्षी, या देवता) में जन्म ले चुके हैं?
इस गूढ़ पारलौकिक विज्ञान का उत्तर गरुड़ पुराण (प्रेत खण्ड) और विष्णु पुराण में अत्यंत तार्किक रूप से दिया गया है。
6.1 गरुड़ पुराण: कर्मानुसार हवि का रूपान्तरण
गरुड़ पुराण के प्रेत खण्ड (अध्याय 10) में पक्षीराज गरुड़ भगवान विष्णु से यही प्रश्न पूछते हैं: "हे प्रभो! पितर तो अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में चले जाते हैं। तो फिर ब्राह्मणों द्वारा खाया गया अन्न या अग्नि में दी गई आहुति उन्हें कैसे तृप्त करती है?"
भगवान विष्णु इसका उत्तर देते हुए एक महान ब्रह्माण्डीय नियम का उद्घाटन करते हैं:
"हे गरुड़! जीव अपने पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार देवता, गन्धर्व, पशु, पक्षी या मनुष्य बनता है। किन्तु जब उसका पुत्र या वंशज देश, काल और पात्र का विचार करके उचित मन्त्रों के साथ द्वितीया या अन्य किसी तिथि पर श्राद्ध करता है, तो वे वेद मन्त्र और गोत्र-नाम उस अन्न को एक सूक्ष्म ऊर्जा में परिवर्तित कर देते हैं।"
"यदि वह मृत जीवात्मा देवता बन गई है, तो श्राद्ध का अन्न उसे 'अमृत' के रूप में प्राप्त होता है। यदि वह गन्धर्व बन गया है तो 'भोग' के रूप में; यदि पशु योनि में है तो 'तृण' (घास) के रूप में; यदि सर्प (नाग) योनि में है तो 'वायु' के रूप में; यदि पक्षी है तो 'फल' के रूप में; यदि दानव है तो 'मांस' के रूप में; यदि प्रेत/पिशाच है तो 'रक्त' के रूप में; और यदि वह पुनः मनुष्य बन गया है तो वह श्राद्ध का पुण्य उसे 'अन्न और धन' के रूप में प्राप्त होता है।"
अतः द्वितीया श्राद्ध में अर्पित किया गया पिण्ड और तर्पण का जल कभी व्यर्थ नहीं जाता। वह मन्त्रों की शक्ति से 'स्वधा' (पितरों की अधिष्ठात्री देवी) के माध्यम से रूपान्तरित होकर ब्रह्माण्ड के किसी भी कोने में स्थित पितर को उसके लिए उपयुक्त आहार के रूप में प्राप्त हो जाता है ।
6.2 यमदूतों की क्रूरता से मुक्ति हेतु वस्त्र-दान (गरुड़ पुराण)
गरुड़ पुराण में ही द्वितीया श्राद्ध के दिन 'दान' (विशेषकर वस्त्र और आभूषण दान) का विशेष फल बताया गया है:
सटीक अर्थ: यमराज के दूत अत्यंत भयंकर, रौद्र रूप वाले, विकराल दाँतों वाले और काले-भूरे (कृष्ण-पिंगल) रंग के होते हैं। वे पापी जीवात्माओं को पारलौकिक मार्ग में अत्यंत पीड़ा देते हैं । किन्तु जब कोई वंशज द्वितीया श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को वस्त्र और आभूषण (या द्रव्य-दक्षिणा) का दान करता है, तो उस दान के पुण्य-प्रभाव से वे भयंकर यमदूत पितरों की आत्मा को कोई कष्ट नहीं पहुँचाते और उन्हें सम्मानपूर्वक गमन करने देते हैं ।
6.3 विष्णु पुराण: और्व-सगर संवाद और श्रेष्ठ ब्राह्मण का चयन
विष्णु पुराण (अंश 3, अध्याय 14 एवं 15) में महर्षि और्व और राजा सगर के बीच श्राद्ध-कर्म पर एक अत्यंत विस्तृत और शास्त्रीय संवाद है। राजा सगर पूछते हैं कि श्राद्ध में कैसे ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और इसकी विधि क्या है?
महर्षि और्व उत्तर देते हैं: "हे राजन्! श्राद्ध में त्रिणाचिकेत, त्रिमधु और त्रिसुपर्ण (ये वेदों के अत्यंत पवित्र और गूढ़ भाग हैं) का अध्ययन करने वाले ब्राह्मणों, षडंग वेद-वेत्ताओं, श्रोत्रिय, और योगियों को नियुक्त करना चाहिए । जामाता (दामाद), भानजा और दौहित्र (पुत्री का पुत्र) भी श्राद्ध में भोजन के उत्कृष्ट अधिकारी हैं ।
महर्षि और्व यह भी स्पष्ट करते हैं कि यदि एक सहस्त्र (हजार) साधारण ब्राह्मण श्राद्ध में भोजन कर रहे हों, किन्तु उनमें यदि केवल एक 'योगी' (शास्त्रानुकूल साधना करने वाला आत्मज्ञानी) ब्राह्मण सम्मिलित हो, तो वह अकेला योगी यजमान सहित उन सभी का उद्धार कर देता है ।
इसके विपरीत, विष्णु पुराण में द्वितीया श्राद्ध में कुछ लोगों को सर्वथा निषिद्ध माना गया है: "मित्रघाती (मित्र को धोखा देने वाला), कुनखी (खराब नाखूनों वाला), श्यावदन्त (काले दाँतों वाला), वेद का त्याग करने वाला, चोर, चुगलखोर, और वेतन लेकर पढ़ाने वाला (ग्राम-पुरोहित) श्राद्ध में निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं।" यदि ऐसे अपात्र लोगों को श्राद्ध का अन्न खिलाया जाता है, तो पितर उस हव्य को ग्रहण नहीं करते और निराश होकर लौट जाते हैं ।
7. द्वितीया श्राद्ध की सम्पूर्ण शास्त्र-सम्मत विधि
द्वितीया तिथि के श्राद्ध की विधि अत्यंत वैज्ञानिक और सूक्ष्म कर्मकाण्डों से युक्त है। इसका वर्णन आश्वलायन गृह्यसूत्र, याज्ञवल्क्य स्मृति और गरुड़ पुराण में प्राप्त होता है।
7.1 काल और मुहूर्त का निर्णय (कुतप और रौहिण)
श्राद्ध कभी भी प्रातःकाल या रात्रिकाल में नहीं किया जाता। द्वितीया श्राद्ध के लिए 'अपराह्न' का समय ही शास्त्र-सम्मत है। हिन्दू दिनमान (सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय) को 15 मुहूर्तों में विभाजित किया गया है। श्राद्ध के लिए दिन का आठवाँ और नौवाँ मुहूर्त सर्वोत्तम माना गया है:
| मुहूर्त का नाम | समय (अनुमानित) | शास्त्रीय महत्व |
|---|---|---|
| कुतप | 11:36 पूर्वाह्न से 12:24 अपराह्न | यह दिन का आठवाँ मुहूर्त है। 'कु' अर्थात् पाप, 'तप' अर्थात् जलाना। जो मुहूर्त पापों को भस्म कर दे, वह कुतप है। यह श्राद्ध का सर्वश्रेष्ठ समय है । |
| रौहिण | 12:24 अपराह्न से 01:12 अपराह्न | यह दिन का नौवाँ मुहूर्त है। कुतप के पश्चात् यह भी श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत पवित्र है । |
| अपराह्न | 01:12 अपराह्न से 03:39 अपराह्न | यह अपराह्न काल है। सम्पूर्ण श्राद्ध प्रक्रिया (ब्राह्मण भोजन, पिण्डदान और तर्पण) इस काल के समाप्त होने से पूर्व पूर्ण हो जानी चाहिए । |
नोट: उपर्युक्त समय स्थानीय सूर्यास्त के अनुसार परिवर्तित हो सकता है। यदि द्वितीया तिथि दिन में इन मुहूर्तों को स्पर्श नहीं करती है, तो धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार तिथि का निर्णय किया जाता है।
7.2 पवित्र द्रव्यों का प्रयोग (कुश और तिल)
द्वितीया श्राद्ध में 'कुश' (पवित्र घास) और 'काले तिल' की उपस्थिति के बिना कर्म पूर्ण नहीं होता।
- कुश: गरुड़ पुराण के अनुसार, कुश की उत्पत्ति भगवान विष्णु के रोम से हुई है। इसके मूल (जड़) में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्र भाग में भगवान शिव का वास माना गया है । देवताओं के लिए कुश का अग्र भाग, मनुष्यों के लिए मध्य भाग और पितरों के पिण्डदान के लिए कुश का मूल (जड़ वाला भाग) प्रयोग किया जाता है ।
- काले तिल: काले तिलों को भगवान विष्णु के स्वेद (पसीने) से उत्पन्न माना गया है। पारशार स्मृति और विष्णु पुराण के अनुसार, तिल नकारात्मक ऊर्जा और दुष्टात्माओं (राक्षसों) को श्राद्ध-वेदी से दूर रखते हैं । मान्यता है कि बिना तिल बिखेरे यदि श्राद्ध किया जाए, तो दुष्टात्माएँ उस हवि को चुरा लेती हैं ।
- निषिद्ध सामग्रियाँ: चना, लहसुन, प्याज, काला नमक, सरसों, और लोहे के बर्तन श्राद्ध में पूर्णतः वर्जित हैं। लोहे के आसन पर बैठकर भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए; इसके लिए रेशम, कम्बल, काठ (लकड़ी) या कुशा का आसन ही सर्वोत्तम है ।
7.3 पञ्चबलि विधान
ब्राह्मण भोजन से ठीक पूर्व, प्रकृति और पारलौकिक शक्तियों के मध्य सन्तुलन स्थापित करने के लिए 'पञ्चबलि' (पाँच ग्रास) निकालने का विधान है :
- 1. गो-बलि (गाय): पत्ते पर पहला ग्रास गौ माता के लिए निकाला जाता है। (मन्त्र: सौरभेय्यः सर्वहिताः...) ।
- 2. श्वान-बलि (कुत्ता): दूसरा ग्रास कुत्ते के लिए। यह यमराज के दो कुत्तों (श्याम और शबल) के प्रतीक रूप में दिया जाता है, जो मृत्यु के मार्ग के रक्षक हैं ।
- 3. काक-बलि (कौआ): तीसरा ग्रास कौवे के लिए (दक्षिण दिशा की ओर)। कौवे को यमराज का दूत माना गया है ।
- 4. देव-बलि: चौथा ग्रास देवताओं के निमित्त ।
- 5. पिपीलिका-बलि: पाँचवाँ ग्रास चींटियों और अन्य क्षुद्र जीवों के लिए ।
यह पञ्चबलि इस बात का प्रमाण है कि वैदिक श्राद्ध केवल पितरों तक सीमित नहीं है, अपितु यह सम्पूर्ण चराचर जगत् के पोषण का एक महायज्ञ है।
7.4 अग्नौकरण, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन
- 1. अग्नौकरण: ब्राह्मणों के पाद-प्रक्षालन और आचमन के पश्चात्, ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर कर्ता लवण-हीन (बिना नमक का) अन्न और शाक लेकर अग्नि में तीन आहुतियाँ देता है। वराह पुराण (14.32) के अनुसार इसके मन्त्र हैं: "अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा", "सोमाय पितृमते स्वाहा", और "वैवस्वताय स्वाहा" ।
- 2. अपसव्य और पिण्डदान: कर्ता को अपना यज्ञोपवीत (जनेऊ) बाएँ कंधे से हटाकर दाएँ कंधे पर करना होता है, जिसे 'अपसव्य' कहा जाता है । कर्ता का मुख 'दक्षिण-पश्चिम' (नैऋत्य) दिशा की ओर होना चाहिए । सत्तू, काले तिल, घृत और मधु को मिलाकर पिण्ड तैयार किए जाते हैं और कुशाओं पर पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण करते हुए अर्पित किए जाते हैं।
- 3. ब्राह्मण भोजन: इसके पश्चात् ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है। भोजन के समय कर्ता को पूर्णतः मौन रहना चाहिए और ब्राह्मणों से अनावश्यक वार्तालाप नहीं करना चाहिए । ब्राह्मणों को तृप्त करके उन्हें दक्षिणा और ताम्बूल देकर द्वार तक विदा करना चाहिए। मान्यता है कि पितृगण ब्राह्मणों के साथ ही वायु रूप में विदा होते हैं ।
8. आपद्धर्म एवं अनुकल्प: विपत्ति या दरिद्रता में द्वितीया श्राद्ध
सनातन धर्म की यह महत्ता है कि वह कर्मकाण्ड में भाव (श्रद्धा) को मुख्य मानता है, धन को नहीं। यदि कोई गृहस्थ अत्यधिक दरिद्र है, या किसी घोर विपत्ति में है, और वह द्वितीया तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन कराने या विस्तृत पार्वण श्राद्ध करने में असमर्थ है, तो विष्णु पुराण और महर्षि देवल ने उसके लिए 'अनुकल्प' का विधान किया है।
वीरमित्रोदय के श्राद्धप्रकाश में देवल का वचन उद्धृत है कि द्रव्य और विप्र (ब्राह्मण) का अभाव होने पर केवल 'पिण्डदान' से ही श्राद्ध पूर्ण माना जा सकता है । विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र व्यक्ति के लिए निम्नलिखित अनुकल्प हैं:
- 1. वह केवल मोटा अन्न, या वन से लाए गए जंगली साग-पात और कन्द-मूल से श्राद्ध कर सकता है ।
- 2. यदि वह भी सम्भव न हो, तो केवल एक अंजलि जल में सात-आठ काले तिल डालकर ब्राह्मण या गाय को दे सकता है ।
- 3. यदि गाय भी न मिले, तो उसे दिन भर गाय को घास खिला देनी चाहिए ।
- 4. सर्वोच्च अनुकल्प (कक्षा-मूल-प्रदर्शक): यदि दरिद्रता की पराकाष्ठा हो और तिल-जल भी उपलब्ध न हो, तो विष्णु पुराण कहता है कि कर्ता को निर्जन वन में जाकर, दोनों भुजाओं (हाथों) को आकाश की ओर उठाकर सूर्य और दिक्पालों को साक्षी मानकर जोर से यह श्लोक पढ़ना चाहिए:
अर्थ: "हे लोकपालों! हे सूर्य! मेरे पास श्राद्ध के योग्य कोई वित्त, धन या सामग्री नहीं है। मैं केवल अपने पितरों को नमन करता हूँ। मेरी दोनों भुजाएँ वायु-मार्ग (आकाश) की ओर उठी हुई हैं; मेरे माता-पिता मेरी इस अटूट भक्ति और श्रद्धा से ही तृप्त हो जाएँ।"
विष्णु पुराण आश्वस्त करता है कि इस करुण और श्रद्धायुक्त पुकार को सुनकर पितर पूर्ण रूप से तृप्त हो जाते हैं और उस दरिद्र पुत्र को भी वही फल प्राप्त होता है जो एक धनवान को विस्तृत श्राद्ध करने से प्राप्त होता है ।
9. निबन्ध ग्रन्थों में द्वितीया तिथि का निर्णय
धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु जैसे निबन्ध ग्रन्थों में श्राद्ध की तिथियों के क्षय (घटने) और वृद्धि (बढ़ने) से उत्पन्न होने वाली जटिलताओं का वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत किया गया है। चूँकि चान्द्र तिथियाँ सूर्योदय के साथ प्रारम्भ या समाप्त नहीं होतीं, अतः कभी-कभी द्वितीया तिथि दो दिन पड़ सकती है या किसी दिन आंशिक रूप से हो सकती है। निर्णयसिन्धु के अनुसार श्राद्ध का मुख्य काल 'अपराह्न' है ।
- तिथि वृद्धि की स्थिति: यदि द्वितीया तिथि आज अपराह्न काल में भी है और कल भी अपराह्न काल को स्पर्श कर रही है, तो श्राद्ध दूसरे दिन (पर-विद्धा) किया जाना चाहिए । निर्णयसिन्धु का श्लोक है: "द्वितीयावृद्धिगामित्वादुत्तरा तत्र चोच्यते" अर्थात् द्वितीया की वृद्धि होने पर अगले दिन का ग्रहण करना शास्त्र सम्मत है ।
- तिथि क्षय की स्थिति: यदि द्वितीया तिथि का क्षय हो रहा हो (अर्थात् वह सूर्योदय के बाद शुरू होकर अपराह्न से पूर्व ही समाप्त हो रही हो), तो जिस दिन अपराह्न काल में द्वितीया का स्पर्श अधिक हो, उसी दिन श्राद्ध करना चाहिए।
10. निष्कर्ष एवं शास्त्रीय संश्लेषण
द्वितीया श्राद्ध के सन्दर्भ में गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, पद्म पुराण, स्कन्द पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा विभिन्न गृह्यसूत्रों के उपर्युक्त प्रलम्ब और गहन विवेचन से यह सर्वथा प्रमाणित हो जाता है कि यह तिथि पारलौकिक और ऐहिक, दोनों दृष्टियों से अपूर्व महिमा-मण्डित है।
- 1. शास्त्रीय स्वरूप: द्वितीया श्राद्ध मुख्यतः उन पितरों के लिए निर्धारित है जिनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से किसी भी पक्ष की द्वितीया तिथि को हुई हो । अकाल मृत्यु (चतुर्दशी), सधवा स्त्री (नवमी) और संन्यासी (द्वादशी) के लिए यह तिथि लागू नहीं होती । महालय के समय यह श्राद्ध 'पार्वण' विधि से किया जाता है, जिसमें तीन पीढ़ियों और विश्वेदेवों का सविधि आवाहन होता है ।
- 2. पारलौकिक फल: स्कन्द पुराण के नागर खण्ड का यह श्लोक ("द्वितीयायां तु यो भक्त्या कुर्याच्छ्राद्धं महालयम्...") सिद्ध करता है कि द्वितीया श्राद्ध करने वाले को भगवान शिव के परम धाम 'कैलास' की प्राप्ति होती है और इस लोक में वह विपुल सम्पदा का स्वामी बनता है । इसके विपरीत, इस कर्तव्य से विमुख होने वाले का ब्रह्म-तेज नष्ट हो जाता है और उसे रौरव नरक की प्राप्ति होती है ।
- 3. काम्य फल: याज्ञवल्क्य स्मृति (1.264) के अनुसार द्वितीया का विशिष्ट काम्य फल "कन्यावेदिन" (सुयोग्य दामाद) और "पशु-धन" की प्राप्ति है, जो इसे अन्य सभी तिथियों से पृथक् और विशिष्ट बनाता है ।
- 4. रहस्य और विज्ञान: पद्म पुराण के अनुसार द्वितीया का यमराज (यम-द्वितीया) से सीधा सम्बन्ध होने के कारण इस दिन नारकीय जीवों को भी तृप्ति मिलती है । गरुड़ पुराण के प्रेत खण्ड का यह सिद्धान्त कि वेद मन्त्रों की ऊर्जा से हवि रूपान्तरित होकर 'अमृत', 'भोग' या 'तृण' के रूप में भिन्न-भिन्न योनियों में बैठे पितरों तक पहुँच जाती है, श्राद्ध की वैज्ञानिकता को स्थापित करता है । वस्त्र-दान से यमदूतों की पीड़ा से मुक्ति का विधान इस दिन के दान के महत्व को दर्शाता है ।
अतएव, कुतप और रौहिण मुहूर्तों में, अपसव्य होकर, कुशा और काले तिलों के प्रयोग के साथ, पञ्चबलि देकर और सुपात्र (योगी या श्रोत्रिय) ब्राह्मणों को सात्विक हविष्यान्न का भोजन कराकर किया गया द्वितीया श्राद्ध एक सम्पूर्ण महायज्ञ है । यह कर्म केवल एक परम्परा का निर्वहन नहीं, अपितु ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के आदान-प्रदान, कृतज्ञता की अभिव्यक्ति, और जीवात्मा की अनन्त यात्रा में उसे शिव-सायुज्य और शांति प्रदान करने का एक सर्वोच्च धर्मशास्त्रीय विधान है।
पुनरावृत्ति (मूल पाठ)
(Note: The prompt text contained the exact same essay twice. To strictly ensure no word from the provided content is 'left out' as instructed, the second instance of the content is preserved below.)
द्वितीया श्राद्ध: शास्त्र-प्रमाणित स्वरूप, विधि, रहस्य, महत्व एवं फल-मीमांसा
1. प्रस्तावना: श्राद्ध मीमांसा एवं धर्मशास्त्रीय पीठिका
सनातन धर्म के विस्तृत और गहन कर्मकाण्ड विज्ञान में 'श्राद्ध' का स्थान अत्यंत उच्च और अनिवार्य माना गया है। धर्मशास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों के समग्र अनुशीलन से यह स्पष्ट होता है कि देवोपासना के समान ही, अथवा उससे भी अधिक सूक्ष्मता से पितृ-उपासना का विधान किया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद का स्पष्ट आदेश है— "देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्" अर्थात् देवता और पितरों के निमित्त किए जाने वाले कार्यों में किसी भी प्रकार का प्रमाद (लापरवाही) नहीं करना चाहिए । वैदिक सनातन परम्परा में जीवन को तीन ऋणों (देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण) से युक्त माना गया है, जिनमें से पितृ ऋण से उऋण होने का एक मात्र शास्त्र-सम्मत साधन श्राद्ध और तर्पण है ।
'श्राद्ध' शब्द की व्युत्पत्ति 'श्रद्धा' से हुई है। महर्षि मरीचि ने श्राद्ध को परिभाषित करते हुए कहा है: "प्रेतान् पितॄंश्च निर्दिश्य भोज्यं यत्प्रियमात्मनः। श्रद्धया दीयते यत्र तच्छ्राद्धं परिकीर्तितम्॥" अर्थात्— प्रेत (तत्काल मृत जीवात्मा) अथवा पितरों को उद्देश्य करके, जो भोज्य पदार्थ स्वयं को प्रिय हों, उन्हें पूर्ण श्रद्धा के साथ सुपात्र ब्राह्मणों के माध्यम से अर्पित करना ही 'श्राद्ध' कहलाता है । इसी प्रकार ब्रह्म पुराण में भी यह प्रतिपादित किया गया है कि देश, काल और पात्र का विचार करके उचित विधि द्वारा पितरों को लक्ष्य करके जो द्रव्य श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह श्राद्ध है ।
याज्ञवल्क्य स्मृति के महान टीकाकार विज्ञानेश्वर ने 'मिताक्षरा' टीका में श्राद्ध का लक्षण स्पष्ट करते हुए लिखा है: "पितॄनुद्दिश्य श्रद्धया दीयमानं द्रव्यं श्राद्धम्" अर्थात् पितरों के कल्याण के लिए श्रद्धायुक्त होकर किसी द्रव्य का त्याग करना श्राद्ध है । कल्पतरु और श्राद्धविवेक जैसे निबन्ध ग्रन्थों में भी इसी परिभाषा का समर्थन किया गया है ।
श्राद्ध-कर्म कोई अंधविश्वास या निरर्थक कर्म नहीं है, अपितु यह एक अत्यंत वैज्ञानिक और पारलौकिक प्रक्रिया है। याज्ञवल्क्य स्मृति (1.268) के अनुसार, श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता 'वसु, रुद्र और आदित्य' हैं । जब कोई वंशज अपने पूर्वजों (पिता, पितामह, प्रपितामह) के निमित्त श्राद्ध करता है, तो ये तीनों देवता क्रमशः उन तीन पीढ़ियों के प्रतिनिधि के रूप में उस हव्य-कव्य को ग्रहण करते हैं और उसे सूक्ष्म रूप में उन मृत पितरों तक पहुँचाते हैं ।
श्रीमद्भागवत महापुराण (7.10.22) में भी श्राद्ध की अनिवार्यता का वर्णन मिलता है, जहाँ भगवान नृसिंह प्रह्लाद को अपने पिता हिरण्यकशिपु के निमित्त श्राद्ध कर्म करने का आदेश देते हुए कहते हैं: "कुरु त्वं प्रेतकृत्यानि पितुः पूतस्य सर्वशः। मदाङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान् यास्यति सुप्रजाः॥" यद्यपि भगवान के स्पर्श से हिरण्यकशिपु पवित्र हो चुका था, तथापि लोक-मर्यादा और पितृ-कर्म की अनिवार्यता को स्थापित करने के लिए भगवान ने प्रह्लाद को श्राद्ध करने का निर्देश दिया । इससे यह सिद्ध होता है कि श्राद्ध-कर्म प्रत्येक गृहस्थ का अनिवार्य कर्तव्य है। इस विस्तृत शोध-प्रबन्ध में हम चान्द्र-मास की 'द्वितीया तिथि' के सन्दर्भ में किए जाने वाले श्राद्ध (द्वितीया श्राद्ध) के तात्विक स्वरूप, उसके अधिकारी पितरों, उसके पारलौकिक व काम्य फलों, और शास्त्र-विहित सम्पूर्ण विधि का गहन विश्लेषण करेंगे।
2. द्वितीया श्राद्ध का शास्त्रीय स्वरूप और आधार
वैदिक काल-गणना के अनुसार एक चान्द्र-मास में दो पक्ष होते हैं— शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। प्रत्येक पक्ष में पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, जिनमें 'द्वितीया' चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है। 'द्वितीया श्राद्ध' का तात्पर्य उस श्राद्ध कर्म से है जो किसी भी मास की द्वितीया तिथि को, विशेषकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष (जिसे पितृ पक्ष या महालय कहा जाता है) की द्वितीया तिथि को सम्पन्न किया जाता है । इसे सामान्य भाषा में 'दूज का श्राद्ध' भी कहा जाता है ।
2.1 पार्वण और एकोद्दिष्ट श्राद्ध में द्वितीया का प्रयोग
शास्त्रों में श्राद्ध के मुख्य रूप से चार भेद माने गए हैं— पार्वण, एकोद्दिष्ट, नान्दीमुख (वृद्धिश्राद्ध) और सपिण्डीकरण । द्वितीया तिथि पर मुख्यतः दो प्रकार के श्राद्ध सम्पादित हो सकते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि श्राद्ध किस अवसर पर किया जा रहा है: 1. एकोद्दिष्ट श्राद्ध (क्षयाह श्राद्ध): यदि किसी परिजन की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, तो उसकी मृत्यु के ठीक एक वर्ष पश्चात् (और उसके बाद प्रतिवर्ष) उसी द्वितीया तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है, वह 'एकोद्दिष्ट श्राद्ध' कहलाता है । इसमें केवल उसी एक मृत व्यक्ति (उद्देश्य) के लिए एक पिण्ड का दान किया जाता है । 2. पार्वण श्राद्ध (महालय श्राद्ध): पितृ पक्ष (महालय) की द्वितीया को जो श्राद्ध किया जाता है, वह 'पार्वण श्राद्ध' होता है । पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों (पिता, पितामह, प्रपितामह) तथा माता पक्ष (मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह) का सतीक (पत्नी सहित) आवाहन किया जाता है । महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों (पुरूरवा और आर्द्रव, अथवा क्रतु और दक्ष) की स्थापना अनिवार्य होती है ।
श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु के अनुसार, महालय के 16 दिनों (पूर्णिमा से अमावस्या तक) में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण विधि से ही होना चाहिए, भले ही मृत्यु की तिथि कोई भी रही हो । जो जीवात्माएँ पितृलोक को प्राप्त हो चुकी हैं, वे महालय के समय अपने वंशजों के निकट सूक्ष्म रूप में आती हैं और अपने निमित्त किए जाने वाले पार्वण श्राद्ध की प्रतीक्षा करती हैं ।
3. अधिकारी पितृगण: द्वितीया तिथि के श्राद्ध का अधिकार
श्राद्ध कर्म में 'तिथि' का अत्यंत सूक्ष्म और गणितीय महत्त्व है। शास्त्रों का अकाट्य नियम है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु (प्राण-त्याग) जिस चान्द्र-तिथि को हुई हो, पितृ पक्ष में उसका पार्वण श्राद्ध उसी तिथि को सम्पन्न किया जाना चाहिए ।
3.1 सामान्य मृत्यु का नियम: विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण और श्राद्ध कल्पलता के अनुसार, जिन पितरों (माता, पिता, भ्राता, पत्नी अथवा अन्य कोई सपिण्ड) का देहावसान किसी भी मास के शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ हो, उनका वार्षिक क्षयाह श्राद्ध तथा पितृ पक्ष (महालय) का श्राद्ध अनिवार्य रूप से 'द्वितीया तिथि' को ही किया जाता है । मृत्यु चाहे दिन में हुई हो अथवा रात्रि में, मृत्यु के समय जो तिथि प्रवृत्त थी, पारलौकिक कर्मकाण्ड के लिए वही तिथि उस जीवात्मा की 'श्राद्ध तिथि' मान ली जाती है ।
3.2 विशेष मृत्यु के अपवाद और द्वितीया तिथि की सीमा: धर्मशास्त्रों में मृत्यु के प्रकार (यथा स्वाभाविक मृत्यु, अकाल मृत्यु, सधवा अवस्था में मृत्यु आदि) के आधार पर श्राद्ध की तिथियों के लिए विशेष अपवाद निर्धारित किए गए हैं। इन अपवादों को समझना इसलिए आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि द्वितीया तिथि का अधिकार किन पितरों को प्राप्त नहीं है, भले ही उनकी मृत्यु द्वितीया को हुई हो। मृत्यु का प्रकार, शास्त्र-निर्धारित विशिष्ट श्राद्ध तिथि, द्वितीया तिथि पर इसका प्रभाव: स्वाभाविक मृत्यु (द्वितीया को) - द्वितीया (महालय की) - द्वितीया को ही पार्वण श्राद्ध होगा । अकाल मृत्यु (शस्त्र, विष, दुर्घटना) - चतुर्दशी (महालय की) - यदि किसी की अकाल मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो उसका महालय श्राद्ध द्वितीया को नहीं, अपितु चतुर्दशी को होगा । सौभाग्यवती स्त्री (सधवा मृत्यु) - नवमी (मातृ-नवमी) - यदि सधवा स्त्री की मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो पारिवारिक परम्परानुसार नवमी को उसका श्राद्ध करना श्रेष्ठ है, यद्यपि कुछ मतों में द्वितीया को भी किया जा सकता है । संन्यासी / यति मृत्यु - द्वादशी (महालय की) - यदि किसी संन्यासी की मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो उसका श्राद्ध महालय की द्वादशी को ही किया जाएगा । तिथि अज्ञात होने पर - सर्वपितृ अमावस्या - यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो अमावस्या को श्राद्ध होगा । उपर्युक्त विश्लेषण से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि द्वितीया श्राद्ध विशेष रूप से उन पितरों के लिए आरक्षित है जिनकी मृत्यु अकाल या अप्राकृतिक न होकर स्वाभाविक रूप से द्वितीया तिथि (शुक्ल या कृष्ण) को हुई हो । इस दिन किए गए श्राद्ध से द्वितीया तिथि के स्वामी और अधिष्ठाता देवता अत्यंत प्रसन्न होकर जीवात्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर करते हैं।
4. द्वितीया तिथि का पारलौकिक महत्त्व एवं काम्य फल (याज्ञवल्क्य स्मृति के सन्दर्भ में)
श्राद्ध केवल एक कर्तव्य या नित्य कर्म ही नहीं है, अपितु इसे 'काम्य कर्म' (इच्छा पूर्ति हेतु किया जाने वाला कर्म) के रूप में भी शास्त्रों में मान्यता प्राप्त है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी 'याज्ञवल्क्य स्मृति' के आचाराध्याय (श्राद्ध प्रकरण) में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की तिथियों पर श्राद्ध करने से मिलने वाले विशिष्ट फलों (काम्य फलों) का अत्यंत विशद और प्रमाणिक वर्णन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति (1.264) में द्वितीया तिथि के श्राद्ध के फल का निरूपण करते हुए कहा गया है: "कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून् वै सुसतानपि। द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफं चैकशफं तथा॥" इस श्लोक में तिथियों के क्रम से (प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया आदि) फल निर्दिष्ट हैं। 'नृसिंह प्रसाद: श्राद्धसारः' और अन्य टीकाओं के अनुसार इसका सटीक अन्वय और अर्थ इस प्रकार है: प्रतिपदि कन्यां: प्रतिपदा को श्राद्ध करने से उत्तम कन्याओं की प्राप्ति होती है । द्वितीयायां कन्यावेदिनश्च / पशून्: जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे "कन्यावेदिन" अर्थात् अपनी कन्याओं के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर (दामाद) की प्राप्ति होती है । इसके अतिरिक्त, द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को "पशून् वै" अर्थात् उत्तम कोटि के पशु-धन (गौ, अश्व आदि) की प्राप्ति होती है । कृषि प्रधान और गौ-आधारित वैदिक समाज में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था। अतः याज्ञवल्क्य स्मृति का यह उद्घोष कि द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन और सुयोग्य दामाद की प्राप्ति होती है, इस तिथि के श्राद्ध को पारिवारिक सुख, सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने और आर्थिक समृद्धि (पशु-धन) के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना देता है । याज्ञवल्क्य स्मृति (1.270) में ही श्राद्ध के सामान्य फल का उद्घोष करते हुए महर्षि कहते हैं: "आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पितः॥" अर्थात्— श्राद्ध से पूर्णतः तृप्त हुए पितर अपने वंशजों को दीर्घ आयु, उत्तम प्रजा (सन्तान), धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, समस्त सुख और यहाँ तक कि राज्य की भी प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं । द्वितीया श्राद्ध करने वाले साधक को ये सभी सामान्य फल तो प्राप्त होते ही हैं, साथ ही उसे द्वितीया का विशिष्ट काम्य फल (कन्यावेदिन और पशु-धन) भी स्वतः प्राप्त हो जाता है। 4.1 अन्य तिथियों की तुलना में द्वितीया के काम्य फलों का वैविध्य: श्राद्ध तिथि, काम्य फल (याज्ञवल्क्य स्मृति एवं नृसिंह प्रसाद के अनुसार): प्रतिपदा - उत्तम कन्या की प्राप्ति। द्वितीया - कन्या के लिए सुयोग्य वर (दामाद) तथा प्रचुर पशु-धन की प्राप्ति। तृतीया - अश्व (घोड़े) आदि वाहनों की प्राप्ति। चतुर्थी - क्षुद्र पशु (भेड़, बकरी आदि) की प्राप्ति। पञ्चमी - उत्तम पुत्रों की प्राप्ति। षष्ठी - द्यूत (क्रीड़ा/आमोद-प्रमोद) में विजय। सप्तमी - कृषि में अभूतपूर्व सफलता। अष्टमी - वाणिज्य (व्यापार) में अत्यधिक लाभ। अतः स्पष्ट है कि जो गृहस्थ अपनी कन्या के विवाह को लेकर चिन्तित हैं अथवा पशु-धन (वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भौतिक सम्पदा या वाहन) की वृद्धि चाहते हैं, उनके लिए द्वितीया श्राद्ध का अनुष्ठान शास्त्रों में अमोघ उपाय बताया गया है।
5. पुराणों में द्वितीया श्राद्ध का माहात्म्य: स्कन्द, पद्म और ब्रह्म पुराण का मत
5.1 स्कन्द पुराण: कैलास प्राप्ति और शिव-सायुज्य का साधन: स्कन्द महापुराण के नागर खण्ड (अध्याय 230) में महर्षि व्यास ने महालय (पितृ पक्ष) की द्वितीया को श्राद्ध करने के सर्वोत्कृष्ट पारलौकिक फल का गान किया है: "द्वितीयायां तु यो भक्त्या कुर्याच्छ्राद्धं महालयम्। स प्रीणाति भगवान् भवानीपतिरीश्वरः॥ स कैलासमवाप्नोति शिवेन सह मोदते। विपुलां सम्पदं तस्मै प्रीतो दद्यान्महेश्वरः॥" सटीक अर्थ: जो मनुष्य महालय (पितृ पक्ष) की 'द्वितीया तिथि' को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर (शिव) अत्यंत प्रसन्न होते हैं । वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के पश्चात् निश्चित रूप से कैलास धाम को प्राप्त करता है और भगवान शिव के गणों के साथ मोद (आनन्द) प्राप्त करता है। प्रसन्न होकर भगवान शिव उसे इस लोक में भी विपुल सम्पदा (विपुलां सम्पदं) प्रदान करते हैं । इसी क्रम में स्कन्द पुराण श्राद्ध न करने वालों के लिए कठोर दण्ड का भी विधान करता है: "द्वितीयायां तिथौ मर्त्यो यो न कुर्यान्महालयम्। तस्य च कुपितः शम्भुर्नाशयेद् ब्रह्मवर्चसम्॥ रौरवं कालसूत्राल्यं नरकं चाप्यदास्यति।" सटीक अर्थ: जो मनुष्य द्वितीया तिथि को (अधिकार होने पर भी) महालय का श्राद्ध नहीं करता, भगवान शम्भु (शिव) उस पर कुपित हो जाते हैं और उसके ब्रह्म-वर्चस्व (तेज और पुण्य) का सर्वथा नाश कर देते हैं । इतना ही नहीं, मृत्यु के पश्चात् उसे रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है । यह श्लोक द्वितीया श्राद्ध की अकाट्य अनिवार्यता और उसके उल्लंघन से उत्पन्न होने वाले भयंकर दोष को रेखांकित करता है।
5.2 पद्म पुराण: यम-द्वितीया का रहस्य और नारकीय जीवों की तृप्ति: पद्म पुराण (कार्तिक माहात्म्य) में द्वितीया तिथि का साक्षात् सम्बन्ध मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी 'यमराज' से स्थापित किया गया है। यद्यपि पद्म पुराण का यह प्रसंग कार्तिक मास की यम-द्वितीया (भ्रातृ-द्वितीया) से सम्बंधित है, किन्तु धर्मशास्त्रों के अनुसार द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है । "यमो यमुनया पूर्वं भोजितः स्वगृहेऽर्चिता। द्वितीयायां महोत्सर्गो नारकीयाश्च तर्पिताः॥" सटीक अर्थ: प्राचीन काल में द्वितीया तिथि के दिन ही देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था और उनकी अर्चना की थी । इस सत्कार से यमराज इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने द्वितीया तिथि को एक महान उत्सव (महोत्सर्ग) घोषित कर दिया। इस तिथि के प्रभाव से नरक में यातना भोग रहे जीवों (नारकीयाश्च तर्पिताः) को भी कुछ समय के लिए तृप्ति और शीतलता प्राप्त होती है । अतः जब पितृ पक्ष की द्वितीया को श्राद्ध किया जाता है, तो यमराज की विशिष्ट प्रसन्नता के कारण पितरों को यमदूतों की यातना नहीं सहनी पड़ती और वे सरलता से ऊर्ध्व लोकों की ओर गमन करते हैं।
5.3 ब्रह्म पुराण: द्वितीया श्राद्ध में विशेष द्रव्य (हवि) का विधान: वीरमित्रोदय के 'श्राद्धप्रकाश' नामक ग्रन्थ में ब्रह्म पुराण का एक विशिष्ट श्लोक उद्धृत है, जो तिथियों के अनुसार श्राद्ध में प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों (हविष्यान्न) का निर्देश करता है: "पैत्र्यां तु प्रथमायां च शाकैः संतर्पयेत्पितॄन्। प्राजापत्यां द्वितीयायां मांसैः संतर्पयेत्पितॄन्॥ वैश्यदेव्यां तृतीयायामपूपैश्च यथाक्रमम्।" सटीक अर्थ: प्रतिपदा को शाक (पत्तेदार सब्जियों) से पितरों को तृप्त करना चाहिए। प्राजापत्य स्वरूप वाली 'द्वितीया तिथि' को यज्ञीय माँस से पितरों को संतर्पित करना चाहिए, और तृतीया को अपूप (पूए या मीठे पकवान) से श्राद्ध करना चाहिए । शास्त्रार्थ एवं कलिवर्ज्य नियम: यद्यपि ब्रह्म पुराण के इस श्लोक में द्वितीया श्राद्ध में माँस के प्रयोग का उल्लेख है, किन्तु वीरमित्रोदय और धर्मसिन्धु के प्रणेताओं ने इसे 'युग-धर्म' के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट किया है। वैदिक और आरम्भिक पौराणिक काल (सत्य, त्रेता, द्वापर) में श्राद्ध में यज्ञीय पशुओं (जैसे रुरु नामक मृग) के माँस का विधान था। किन्तु कलियुग में यह सर्वथा कलिवर्ज्य (कलियुग में निषिद्ध) है । वर्तमान शास्त्रीय व्यवस्था के अनुसार द्वितीया के दिन माँस के स्थान पर पवित्र उड़द (माष), दुग्ध, घृत (घी) और मधु (शहद) का ही प्रयोग किया जाता है। घृत और उड़द को माँस का ही सात्विक विकल्प माना गया है ।
6. गरुड़ पुराण एवं विष्णु पुराण का श्राद्ध-विज्ञान: हवि का रूपान्तरण
6.1 गरुड़ पुराण: कर्मानुसार हवि का रूपान्तरण: गरुड़ पुराण के प्रेत खण्ड (अध्याय 10) में पक्षीराज गरुड़ भगवान विष्णु से यही प्रश्न पूछते हैं: "हे प्रभो! पितर तो अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में चले जाते हैं। तो फिर ब्राह्मणों द्वारा खाया गया अन्न या अग्नि में दी गई आहुति उन्हें कैसे तृप्त करती है?" भगवान विष्णु इसका उत्तर देते हुए एक महान ब्रह्माण्डीय नियम का उद्घाटन करते हैं: "हे गरुड़! जीव अपने पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार देवता, गन्धर्व, पशु, पक्षी या मनुष्य बनता है। किन्तु जब उसका पुत्र या वंशज देश, काल और पात्र का विचार करके उचित मन्त्रों के साथ द्वितीया या अन्य किसी तिथि पर श्राद्ध करता है, तो वे वेद मन्त्र और गोत्र-नाम उस अन्न को एक सूक्ष्म ऊर्जा में परिवर्तित कर देते हैं।" "यदि वह मृत जीवात्मा देवता बन गई है, तो श्राद्ध का अन्न उसे 'अमृत' के रूप में प्राप्त होता है। यदि वह गन्धर्व बन गया है तो 'भोग' के रूप में; यदि पशु योनि में है तो 'तृण' (घास) के रूप में; यदि सर्प (नाग) योनि में है तो 'वायु' के रूप में; यदि पक्षी है तो 'फल' के रूप में; यदि दानव है तो 'मांस' के रूप में; यदि प्रेत/पिशाच है तो 'रक्त' के रूप में; और यदि वह पुनः मनुष्य बन गया है तो वह श्राद्ध का पुण्य उसे 'अन्न और धन' के रूप में प्राप्त होता है।" अतः द्वितीया श्राद्ध में अर्पित किया गया पिण्ड और तर्पण का जल कभी व्यर्थ नहीं जाता। वह मन्त्रों की शक्ति से 'स्वधा' (पितरों की अधिष्ठात्री देवी) के माध्यम से रूपान्तरित होकर ब्रह्माण्ड के किसी भी कोने में स्थित पितर को उसके लिए उपयुक्त आहार के रूप में प्राप्त हो जाता है ।
6.2 यमदूतों की क्रूरता से मुक्ति हेतु वस्त्र-दान (गरुड़ पुराण): गरुड़ पुराण में ही द्वितीया श्राद्ध के दिन 'दान' (विशेषकर वस्त्र और आभूषण दान) का विशेष फल बताया गया है: "यमदूता महारौद्राः करालाः कृष्णपिङ्गलाः। न पीडयंति दाक्षिण्याद्वस्त्राभरणदानतः॥" सटीक अर्थ: यमराज के दूत अत्यंत भयंकर, रौद्र रूप वाले, विकराल दाँतों वाले और काले-भूरे (कृष्ण-पिंगल) रंग के होते हैं। वे पापी जीवात्माओं को पारलौकिक मार्ग में अत्यंत पीड़ा देते हैं । किन्तु जब कोई वंशज द्वितीया श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को वस्त्र और आभूषण (या द्रव्य-दक्षिणा) का दान करता है, तो उस दान के पुण्य-प्रभाव से वे भयंकर यमदूत पितरों की आत्मा को कोई कष्ट नहीं पहुँचाते और उन्हें सम्मानपूर्वक गमन करने देते हैं ।
6.3 विष्णु पुराण: और्व-सगर संवाद और श्रेष्ठ ब्राह्मण का चयन: विष्णु पुराण (अंश 3, अध्याय 14 एवं 15) में महर्षि और्व और राजा सगर के बीच श्राद्ध-कर्म पर एक अत्यंत विस्तृत और शास्त्रीय संवाद है। राजा सगर पूछते हैं कि श्राद्ध में कैसे ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और इसकी विधि क्या है? महर्षि और्व उत्तर देते हैं: "हे राजन्! श्राद्ध में त्रिणाचिकेत, त्रिमधु और त्रिसुपर्ण (ये वेदों के अत्यंत पवित्र और गूढ़ भाग हैं) का अध्ययन करने वाले ब्राह्मणों, षडंग वेद-वेत्ताओं, श्रोत्रिय, और योगियों को नियुक्त करना चाहिए । जामाता (दामाद), भानजा और दौहित्र (पुत्री का पुत्र) भी श्राद्ध में भोजन के उत्कृष्ट अधिकारी हैं । महर्षि और्व यह भी स्पष्ट करते हैं कि यदि एक सहस्त्र (हजार) साधारण ब्राह्मण श्राद्ध में भोजन कर रहे हों, किन्तु उनमें यदि केवल एक 'योगी' (शास्त्रानुकूल साधना करने वाला आत्मज्ञानी) ब्राह्मण सम्मिलित हो, तो वह अकेला योगी यजमान सहित उन सभी का उद्धार कर देता है । इसके विपरीत, विष्णु पुराण में द्वितीया श्राद्ध में कुछ लोगों को सर्वथा निषिद्ध माना गया है: "मित्रघाती (मित्र को धोखा देने वाला), कुनखी (खराब नाखूनों वाला), श्यावदन्त (काले दाँतों वाला), वेद का त्याग करने वाला, चोर, चुगलखोर, और वेतन लेकर पढ़ाने वाला (ग्राम-पुरोहित) श्राद्ध में निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं।" यदि ऐसे अपात्र लोगों को श्राद्ध का अन्न खिलाया जाता है, तो पितर उस हव्य को ग्रहण नहीं करते और निराश होकर लौट जाते हैं ।
7. द्वितीया श्राद्ध की सम्पूर्ण शास्त्र-सम्मत विधि
7.1 काल और मुहूर्त का निर्णय: श्राद्ध कभी भी प्रातःकाल या रात्रिकाल में नहीं किया जाता। द्वितीया श्राद्ध के लिए 'अपराह्न' का समय ही शास्त्र-सम्मत है। हिन्दू दिनमान (सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय) को 15 मुहूर्तों में विभाजित किया गया है। श्राद्ध के लिए दिन का आठवाँ और नौवाँ मुहूर्त सर्वोत्तम माना गया है: कुतप: 11:36 पूर्वाह्न से 12:24 अपराह्न। यह दिन का आठवाँ मुहूर्त है। 'कु' अर्थात् पाप, 'तप' अर्थात् जलाना। जो मुहूर्त पापों को भस्म कर दे, वह कुतप है। यह श्राद्ध का सर्वश्रेष्ठ समय है । रौहिण: 12:24 अपराह्न से 01:12 अपराह्न। यह दिन का नौवाँ मुहूर्त है। कुतप के पश्चात् यह भी श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत पवित्र है । अपराह्न: 01:12 अपराह्न से 03:39 अपराह्न। यह अपराह्न काल है। सम्पूर्ण श्राद्ध प्रक्रिया (ब्राह्मण भोजन, पिण्डदान और तर्पण) इस काल के समाप्त होने से पूर्व पूर्ण हो जानी चाहिए । नोट: उपर्युक्त समय स्थानीय सूर्यास्त के अनुसार परिवर्तित हो सकता है। यदि द्वितीया तिथि दिन में इन मुहूर्तों को स्पर्श नहीं करती है, तो धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार तिथि का निर्णय किया जाता है।
7.2 पवित्र द्रव्यों का प्रयोग (कुश और तिल): द्वितीया श्राद्ध में 'कुश' (पवित्र घास) और 'काले तिल' की उपस्थिति के बिना कर्म पूर्ण नहीं होता। कुश: गरुड़ पुराण के अनुसार, कुश की उत्पत्ति भगवान विष्णु के रोम से हुई है। इसके मूल (जड़) में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्र भाग में भगवान शिव का वास माना गया है । देवताओं के लिए कुश का अग्र भाग, मनुष्यों के लिए मध्य भाग और पितरों के पिण्डदान के लिए कुश का मूल (जड़ वाला भाग) प्रयोग किया जाता है । काले तिल: काले तिलों को भगवान विष्णु के स्वेद (पसीने) से उत्पन्न माना गया है। पारशार स्मृति और विष्णु पुराण के अनुसार, तिल नकारात्मक ऊर्जा और दुष्टात्माओं (राक्षसों) को श्राद्ध-वेदी से दूर रखते हैं । मान्यता है कि बिना तिल बिखेरे यदि श्राद्ध किया जाए, तो दुष्टात्माएँ उस हवि को चुरा लेती हैं । निषिद्ध सामग्रियाँ: चना, लहसुन, प्याज, काला नमक, सरसों, और लोहे के बर्तन श्राद्ध में पूर्णतः वर्जित हैं। लोहे के आसन पर बैठकर भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए; इसके लिए रेशम, कम्बल, काठ (लकड़ी) या कुशा का आसन ही सर्वोत्तम है ।
7.3 पञ्चबलि विधान: ब्राह्मण भोजन से ठीक पूर्व, प्रकृति और पारलौकिक शक्तियों के मध्य सन्तुलन स्थापित करने के लिए 'पञ्चबलि' (पाँच ग्रास) निकालने का विधान है : 1. गो-बलि (गाय): पत्ते पर पहला ग्रास गौ माता के लिए निकाला जाता है। (मन्त्र: सौरभेय्यः सर्वहिताः...) । 2. श्वान-बलि (कुत्ता): दूसरा ग्रास कुत्ते के लिए। यह यमराज के दो कुत्तों (श्याम और शबल) के प्रतीक रूप में दिया जाता है, जो मृत्यु के मार्ग के रक्षक हैं । 3. काक-बलि (कौआ): तीसरा ग्रास कौवे के लिए (दक्षिण दिशा की ओर)। कौवे को यमराज का दूत माना गया है । 4. देव-बलि: चौथा ग्रास देवताओं के निमित्त । 5. पिपीलिका-बलि: पाँचवाँ ग्रास चींटियों और अन्य क्षुद्र जीवों के लिए । यह पञ्चबलि इस बात का प्रमाण है कि वैदिक श्राद्ध केवल पितरों तक सीमित नहीं है, अपितु यह सम्पूर्ण चराचर जगत् के पोषण का एक महायज्ञ है।
7.4 अग्नौकरण, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन: 1. अग्नौकरण: ब्राह्मणों के पाद-प्रक्षालन और आचमन के पश्चात्, ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर कर्ता लवण-हीन (बिना नमक का) अन्न और शाक लेकर अग्नि में तीन आहुतियाँ देता है। वराह पुराण (14.32) के अनुसार इसके मन्त्र हैं: "अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा", "सोमाय पितृमते स्वाहा", और "वैवस्वताय स्वाहा" । 2. अपसव्य और पिण्डदान: कर्ता को अपना यज्ञोपवीत (जनेऊ) बाएँ कंधे से हटाकर दाएँ कंधे पर करना होता है, जिसे 'अपसव्य' कहा जाता है । कर्ता का मुख 'दक्षिण-पश्चिम' (नैऋत्य) दिशा की ओर होना चाहिए । सत्तू, काले तिल, घृत और मधु को मिलाकर पिण्ड तैयार किए जाते हैं और कुशाओं पर पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण करते हुए अर्पित किए जाते हैं। 3. ब्राह्मण भोजन: इसके पश्चात् ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है। भोजन के समय कर्ता को पूर्णतः मौन रहना चाहिए और ब्राह्मणों से अनावश्यक वार्तालाप नहीं करना चाहिए । ब्राह्मणों को तृप्त करके उन्हें दक्षिणा और ताम्बूल देकर द्वार तक विदा करना चाहिए। मान्यता है कि पितृगण ब्राह्मणों के साथ ही वायु रूप में विदा होते हैं ।
8. आपद्धर्म एवं अनुकल्प: विपत्ति या दरिद्रता में द्वितीया श्राद्ध
सनातन धर्म की यह महत्ता है कि वह कर्मकाण्ड में भाव (श्रद्धा) को मुख्य मानता है, धन को नहीं। यदि कोई गृहस्थ अत्यधिक दरिद्र है, या किसी घोर विपत्ति में है, और वह द्वितीया तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन कराने या विस्तृत पार्वण श्राद्ध करने में असमर्थ है, तो विष्णु पुराण और महर्षि देवल ने उसके लिए 'अनुकल्प' का विधान किया है। वीरमित्रोदय के श्राद्धप्रकाश में देवल का वचन उद्धृत है कि द्रव्य और विप्र (ब्राह्मण) का अभाव होने पर केवल 'पिण्डदान' से ही श्राद्ध पूर्ण माना जा सकता है । विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र व्यक्ति के लिए निम्नलिखित अनुकल्प हैं: 1. वह केवल मोटा अन्न, या वन से लाए गए जंगली साग-पात और कन्द-मूल से श्राद्ध कर सकता है । 2. यदि वह भी सम्भव न हो, तो केवल एक अंजलि जल में सात-आठ काले तिल डालकर ब्राह्मण या गाय को दे सकता है । 3. यदि गाय भी न मिले, तो उसे दिन भर गाय को घास खिला देनी चाहिए । 4. सर्वोच्च अनुकल्प (कक्षा-मूल-प्रदर्शक): यदि दरिद्रता की पराकाष्ठा हो और तिल-जल भी उपलब्ध न हो, तो विष्णु पुराण कहता है कि कर्ता को निर्जन वन में जाकर, दोनों भुजाओं (हाथों) को आकाश की ओर उठाकर सूर्य और दिक्पालों को साक्षी मानकर जोर से यह श्लोक पढ़ना चाहिए: "न मेऽस्ति वित्तं न धनं न चान्यत् श्राद्धोपयोग्यं स्वपितॄन्नतोऽस्मि। तृप्यन्तु भक्त्या पितरौ मयैतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य॥" अर्थ: "हे लोकपालों! हे सूर्य! मेरे पास श्राद्ध के योग्य कोई वित्त, धन या सामग्री नहीं है। मैं केवल अपने पितरों को नमन करता हूँ। मेरी दोनों भुजाएँ वायु-मार्ग (आकाश) की ओर उठी हुई हैं; मेरे माता-पिता मेरी इस अटूट भक्ति और श्रद्धा से ही तृप्त हो जाएँ।" विष्णु पुराण आश्वस्त करता है कि इस करुण और श्रद्धायुक्त पुकार को सुनकर पितर पूर्ण रूप से तृप्त हो जाते हैं और उस दरिद्र पुत्र को भी वही फल प्राप्त होता है जो एक धनवान को विस्तृत श्राद्ध करने से प्राप्त होता है ।
9. निबन्ध ग्रन्थों में द्वितीया तिथि का निर्णय
धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु जैसे निबन्ध ग्रन्थों में श्राद्ध की तिथियों के क्षय (घटने) और वृद्धि (बढ़ने) से उत्पन्न होने वाली जटिलताओं का वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत किया गया है। चूँकि चान्द्र तिथियाँ सूर्योदय के साथ प्रारम्भ या समाप्त नहीं होतीं, अतः कभी-कभी द्वितीया तिथि दो दिन पड़ सकती है या किसी दिन आंशिक रूप से हो सकती है। निर्णयसिन्धु के अनुसार श्राद्ध का मुख्य काल 'अपराह्न' है । तिथि वृद्धि की स्थिति: यदि द्वितीया तिथि आज अपराह्न काल में भी है और कल भी अपराह्न काल को स्पर्श कर रही है, तो श्राद्ध दूसरे दिन (पर-विद्धा) किया जाना चाहिए । निर्णयसिन्धु का श्लोक है: "द्वितीयावृद्धिगामित्वादुत्तरा तत्र चोच्यते" अर्थात् द्वितीया की वृद्धि होने पर अगले दिन का ग्रहण करना शास्त्र सम्मत है । तिथि क्षय की स्थिति: यदि द्वितीया तिथि का क्षय हो रहा हो (अर्थात् वह सूर्योदय के बाद शुरू होकर अपराह्न से पूर्व ही समाप्त हो रही हो), तो जिस दिन अपराह्न काल में द्वितीया का स्पर्श अधिक हो, उसी दिन श्राद्ध करना चाहिए।
10. निष्कर्ष एवं शास्त्रीय संश्लेषण
द्वितीया श्राद्ध के सन्दर्भ में गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, पद्म पुराण, स्कन्द पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा विभिन्न गृह्यसूत्रों के उपर्युक्त प्रलम्ब और गहन विवेचन से यह सर्वथा प्रमाणित हो जाता है कि यह तिथि पारलौकिक और ऐहिक, दोनों दृष्टियों से अपूर्व महिमा-मण्डित है। 1. शास्त्रीय स्वरूप: द्वितीया श्राद्ध मुख्यतः उन पितरों के लिए निर्धारित है जिनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से किसी भी पक्ष की द्वितीया तिथि को हुई हो । अकाल मृत्यु (चतुर्दशी), सधवा स्त्री (नवमी) और संन्यासी (द्वादशी) के लिए यह तिथि लागू नहीं होती । महालय के समय यह श्राद्ध 'पार्वण' विधि से किया जाता है, जिसमें तीन पीढ़ियों और विश्वेदेवों का सविधि आवाहन होता है । 2. पारलौकिक फल: स्कन्द पुराण के नागर खण्ड का यह श्लोक ("द्वितीयायां तु यो भक्त्या कुर्याच्छ्राद्धं महालयम्...") सिद्ध करता है कि द्वितीया श्राद्ध करने वाले को भगवान शिव के परम धाम 'कैलास' की प्राप्ति होती है और इस लोक में वह विपुल सम्पदा का स्वामी बनता है । इसके विपरीत, इस कर्तव्य से विमुख होने वाले का ब्रह्म-तेज नष्ट हो जाता है और उसे रौरव नरक की प्राप्ति होती है । 3. काम्य फल: याज्ञवल्क्य स्मृति (1.264) के अनुसार द्वितीया का विशिष्ट काम्य फल "कन्यावेदिन" (सुयोग्य दामाद) और "पशु-धन" की प्राप्ति है, जो इसे अन्य सभी तिथियों से पृथक् और विशिष्ट बनाता है । 4. रहस्य और विज्ञान: पद्म पुराण के अनुसार द्वितीया का यमराज (यम-द्वितीया) से सीधा सम्बन्ध होने के कारण इस दिन नारकीय जीवों को भी तृप्ति मिलती है । गरुड़ पुराण के प्रेत खण्ड का यह सिद्धान्त कि वेद मन्त्रों की ऊर्जा से हवि रूपान्तरित होकर 'अमृत', 'भोग' या 'तृण' के रूप में भिन्न-भिन्न योनियों में बैठे पितरों तक पहुँच जाती है, श्राद्ध की वैज्ञानिकता को स्थापित करता है । वस्त्र-दान से यमदूतों की पीड़ा से मुक्ति का विधान इस दिन के दान के महत्व को दर्शाता है । अतएव, कुतप और रौहिण मुहूर्तों में, अपसव्य होकर, कुशा और काले तिलों के प्रयोग के साथ, पञ्चबलि देकर और सुपात्र (योगी या श्रोत्रिय) ब्राह्मणों को सात्विक हविष्यान्न का भोजन कराकर किया गया द्वितीया श्राद्ध एक सम्पूर्ण महायज्ञ है । यह कर्म केवल एक परम्परा का निर्वहन नहीं, अपितु ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के आदान-प्रदान, कृतज्ञता की अभिव्यक्ति, और जीवात्मा की अनन्त यात्रा में उसे शिव-सायुज्य और शांति प्रदान करने का एक सर्वोच्च धर्मशास्त्रीय विधान है।


