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तिथि श्राद्ध⏱ 3 मिनट पठन

द्वितीया श्राद्ध क्या है?

द्वितीया श्राद्ध वह श्राद्ध कर्म है जो किसी भी चान्द्र-मास की द्वितीया तिथि को सम्पन्न किया जाता है।

संक्षिप्त उत्तर

द्वितीया श्राद्ध वह श्राद्ध कर्म है जो किसी भी मास की द्वितीया तिथि को, विशेषकर पितृ पक्ष यानी आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को किया जाता है। इसे सामान्य भाषा में दूज का श्राद्ध भी कहते हैं। यह उन पितरों के लिए होता है जिनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से किसी भी पक्ष की द्वितीया तिथि को हुई हो।

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विस्तृत उत्तर

द्वितीया श्राद्ध वह श्राद्ध कर्म है जो किसी भी चान्द्र-मास की द्वितीया तिथि को सम्पन्न किया जाता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार द्वितीया श्राद्ध का तात्पर्य उस श्राद्ध कर्म से है जो किसी भी मास की द्वितीया तिथि को, विशेषकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष यानी पितृ पक्ष या महालय की द्वितीया तिथि को सम्पन्न किया जाता है। इसे सामान्य भाषा में दूज का श्राद्ध भी कहा जाता है।

द्वितीया श्राद्ध के दो प्रमुख रूप हैं। पहला रूप एकोद्दिष्ट श्राद्ध या क्षयाह श्राद्ध है। यदि किसी परिजन की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, तो उसकी मृत्यु के ठीक एक वर्ष पश्चात् और उसके बाद प्रतिवर्ष उसी द्वितीया तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है, वह एकोद्दिष्ट श्राद्ध कहलाता है। इसमें केवल उसी एक मृत व्यक्ति यानी उद्देश्य के लिए एक पिण्ड का दान किया जाता है। दूसरा रूप पार्वण श्राद्ध या महालय श्राद्ध है। पितृ पक्ष यानी महालय की द्वितीया को जो श्राद्ध किया जाता है, वह पार्वण श्राद्ध होता है। पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता पक्ष यानी मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन किया जाता है।

द्वितीया तिथि का विशेष शास्त्रीय महत्व है क्योंकि यह तिथि चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है। वैदिक काल-गणना के अनुसार एक चान्द्र-मास में दो पक्ष होते हैं - शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। प्रत्येक पक्ष में पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, जिनमें द्वितीया दूसरी तिथि है।

महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है। श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु के अनुसार महालय के 16 दिनों यानी पूर्णिमा से अमावस्या तक में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण विधि से ही होना चाहिए, भले ही मृत्यु की तिथि कोई भी रही हो।

जो जीवात्माएँ पितृलोक को प्राप्त हो चुकी हैं, वे महालय के समय अपने वंशजों के निकट सूक्ष्म रूप में आती हैं और अपने निमित्त किए जाने वाले पार्वण श्राद्ध की प्रतीक्षा करती हैं।

द्वितीया श्राद्ध मुख्यतः उन पितरों के लिए निर्धारित है जिनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से किसी भी पक्ष की द्वितीया तिथि को हुई हो। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण, स्कन्द पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति और श्राद्धकल्पलता इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया श्राद्ध वह श्राद्ध कर्म है जो किसी भी मास की द्वितीया तिथि को, विशेषकर पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि को सम्पन्न किया जाता है, और इसे दूज का श्राद्ध भी कहा जाता है।

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