विस्तृत उत्तर
कृष्ण पक्ष की द्वितीया का श्राद्ध मुख्यतः पितृ पक्ष यानी आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया को सम्पन्न होता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार द्वितीया श्राद्ध का तात्पर्य उस श्राद्ध कर्म से है जो किसी भी मास की द्वितीया तिथि को, विशेषकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष यानी पितृ पक्ष या महालय की द्वितीया तिथि को सम्पन्न किया जाता है।
कृष्ण पक्ष की द्वितीया के दो प्रमुख श्राद्ध-अवसर हैं। पहला अवसर है पितृ पक्ष या महालय की द्वितीया। यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ती है, जो प्रतिपदा के बाद आती है। इस दिन सब पितरों के लिए सामूहिक पार्वण श्राद्ध होता है। दूसरा अवसर है किसी भी मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया। यदि किसी की मृत्यु किसी भी मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया को हुई हो, तो उसका वार्षिक एकोद्दिष्ट श्राद्ध उसी कृष्ण द्वितीया को होता है।
पितृ पक्ष की कृष्ण द्वितीया का विशेष महत्व है। पितृ पक्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ता है। इसमें पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक 16 दिन होते हैं। द्वितीया इस पक्ष का दूसरा दिन है। प्रतिपदा के बाद यह दिन आता है। इस दिन का श्राद्ध स्वाभाविक रूप से द्वितीया को मरे पितरों के लिए विशेष रूप से किया जाता है, परंतु पार्वण विधि से सब पितरों के लिए भी किया जा सकता है।
श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु का नियम स्पष्ट है। शास्त्रीय आधार के अनुसार महालय के 16 दिनों यानी पूर्णिमा से अमावस्या तक में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण विधि से ही होना चाहिए, भले ही मृत्यु की तिथि कोई भी रही हो। इसलिए पितृ पक्ष की कृष्ण द्वितीया पर जो भी श्राद्ध होगा, वह पार्वण विधि से ही होगा।
पार्वण श्राद्ध की विशेषता यह है कि इसमें तीन पीढ़ियों का आवाहन होता है। पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता पक्ष यानी मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन किया जाता है। महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है।
पितर इस समय आते हैं। जो जीवात्माएँ पितृलोक को प्राप्त हो चुकी हैं, वे महालय के समय अपने वंशजों के निकट सूक्ष्म रूप में आती हैं और अपने निमित्त किए जाने वाले पार्वण श्राद्ध की प्रतीक्षा करती हैं। इसलिए पितृ पक्ष की कृष्ण द्वितीया पर श्राद्ध करने से पितरों को सीधी तृप्ति मिलती है।
वार्षिक एकोद्दिष्ट श्राद्ध का नियम भी विशेष है। यदि किसी परिजन की मृत्यु कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को हुई हो, तो उसकी मृत्यु के ठीक एक वर्ष पश्चात् और उसके बाद प्रतिवर्ष उसी कृष्ण द्वितीया तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है, वह एकोद्दिष्ट श्राद्ध कहलाता है। इसमें केवल उसी एक मृत व्यक्ति यानी उद्देश्य के लिए एक पिण्ड का दान किया जाता है।
श्राद्ध का सही समय अपराह्न काल है। श्राद्ध कभी भी प्रातःकाल या रात्रिकाल में नहीं किया जाता। द्वितीया श्राद्ध के लिए अपराह्न का समय ही शास्त्र-सम्मत है। इस समय में कुतप मुहूर्त 11:36 AM से 12:24 PM तक, रौहिण मुहूर्त 12:24 PM से 01:12 PM तक, और अपराह्न काल 01:12 PM से 03:39 PM तक श्रेष्ठ माने जाते हैं।
श्राद्ध-फल भी कृष्ण द्वितीया पर विशेष होता है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार द्वितीया तिथि को श्राद्ध करने से कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशू वै यानी पशु-धन की प्राप्ति होती है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो मनुष्य महालय यानी पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर अत्यंत प्रसन्न होते हैं, और वह कैलास धाम को प्राप्त करता है।
पद्म पुराण का यम-द्वितीया से सम्बन्ध भी विशेष है। द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। प्राचीन काल में द्वितीया तिथि के दिन ही देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था, और यमराज ने इस तिथि को महान उत्सव घोषित किया। इसी कारण कृष्ण द्वितीया पर श्राद्ध करने से पितरों को यमदूतों की यातना नहीं सहनी पड़ती। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण, स्कन्द पुराण और पद्म पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः कृष्ण पक्ष की द्वितीया का श्राद्ध मुख्यतः पितृ पक्ष यानी आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया को सम्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त किसी भी मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया को मरे पितर का वार्षिक एकोद्दिष्ट श्राद्ध भी उसी कृष्ण द्वितीया को होता है।
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