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तिथि श्राद्ध⏱ 4 मिनट पठन

दूज का श्राद्ध किसे कहते हैं?

दूज का श्राद्ध द्वितीया तिथि के श्राद्ध का लोक-प्रचलित नाम है। दूज शब्द द्वितीया का सरल हिन्दी रूप है।

संक्षिप्त उत्तर

दूज का श्राद्ध द्वितीया तिथि के श्राद्ध का लोक-प्रचलित नाम है। दूज शब्द द्वितीया का सरल हिन्दी रूप है। यह विशेष रूप से उन पितरों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, और पितृ पक्ष की दूज पर पार्वण श्राद्ध से सम्पूर्ण कुटुम्ब का श्राद्ध भी सम्पन्न होता है।

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विस्तृत उत्तर

दूज का श्राद्ध द्वितीया तिथि के श्राद्ध का लोक-प्रचलित नाम है। शास्त्रीय आधार के अनुसार द्वितीया श्राद्ध को सामान्य भाषा में दूज का श्राद्ध भी कहा जाता है।

दूज शब्द द्वितीया का सरल हिन्दी रूप है। संस्कृत में जो तिथि द्वितीया कहलाती है, उसे लोकभाषा में दूज कहते हैं। यह तिथि चन्द्रमा की द्वितीय कला का प्रतिनिधित्व करती है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों में दूज तिथि आती है। शुक्ल दूज पूर्णिमा के बाद आती है, और कृष्ण दूज प्रतिपदा के बाद।

दूज का श्राद्ध मुख्यतः पितृ पक्ष में किया जाता है। पितृ पक्ष यानी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की दूज तिथि को विशेष रूप से दूज का श्राद्ध सम्पन्न होता है। इस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से किसी भी पक्ष की द्वितीया तिथि को हुई हो।

दूज के श्राद्ध का दार्शनिक महत्व विशेष है। द्वितीया तिथि चन्द्रमा की दूसरी कला है, और शास्त्रों में चन्द्रमा को पितरों का स्वामी माना गया है। पितर चन्द्रलोक से वायु रूप में आते हैं, और दूज तिथि को उनके आगमन का विशेष अवसर माना जाता है।

दूज के श्राद्ध के दो प्रमुख रूप हैं। पहला रूप एकोद्दिष्ट श्राद्ध है, जो किसी एक विशेष पितर की मृत्यु तिथि पर किया जाता है। यदि किसी परिजन की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, तो प्रतिवर्ष उसी दूज तिथि पर एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया जाता है। दूसरा रूप पार्वण श्राद्ध है, जो पितृ पक्ष की दूज तिथि को सम्पन्न होता है। इसमें पिता, पितामह, प्रपितामह सहित तीन पीढ़ियों का आवाहन होता है।

पितृ पक्ष की दूज विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु के अनुसार महालय के 16 दिनों यानी पूर्णिमा से अमावस्या तक में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण विधि से ही होना चाहिए, भले ही मृत्यु की तिथि कोई भी रही हो। इसलिए पितृ पक्ष की दूज पर सब पितरों के लिए सामूहिक श्राद्ध किया जा सकता है।

दूज के श्राद्ध की विधि भी विशेष है। इसमें कुतप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और अपराह्न काल का चयन किया जाता है। कुश और काले तिल अनिवार्य होते हैं। पञ्चबलि निकाली जाती है, और सुपात्र ब्राह्मणों को सात्विक हविष्यान्न का भोजन कराया जाता है।

दूज के श्राद्ध का व्यापक प्रभाव यह है कि यह सामान्य गृहस्थ के लिए भी सरल और बोधगम्य है। संस्कृत के द्वितीया शब्द से अधिक हिन्दी का दूज शब्द जन-साधारण के लिए सहज है, इसलिए लोक परम्परा में दूज का श्राद्ध शब्द ही प्रचलित है।

दूज के श्राद्ध का यमराज से भी विशेष सम्बन्ध है। द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन काल में द्वितीया तिथि के दिन ही देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था। इस सत्कार से प्रसन्न होकर यमराज ने इस तिथि को महान उत्सव घोषित किया।

इसी कारण दूज पर श्राद्ध करने से यमराज की विशिष्ट प्रसन्नता प्राप्त होती है, और पितरों को यमदूतों की यातना नहीं सहनी पड़ती। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण और पद्म पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः दूज का श्राद्ध द्वितीया तिथि के श्राद्ध का लोक-प्रचलित सरल हिन्दी नाम है। यह विशेष रूप से उन पितरों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई हो, और पितृ पक्ष की दूज पर सम्पूर्ण कुटुम्ब का श्राद्ध भी हो सकता है।

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