विस्तृत उत्तर
द्वितीया तिथि को स्वाभाविक रूप से मरे व्यक्ति का श्राद्ध भी द्वितीया तिथि को ही होता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण और श्राद्ध कल्पलता के अनुसार जिन पितरों यानी माता, पिता, भ्राता, पत्नी अथवा अन्य कोई सपिण्ड का देहावसान किसी भी मास के शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ हो, उनका वार्षिक क्षयाह श्राद्ध तथा पितृ पक्ष यानी महालय का श्राद्ध अनिवार्य रूप से द्वितीया तिथि को ही किया जाता है।
इस सिद्धांत के मुख्य अंग इस प्रकार हैं। पहला अंग है तिथि का अकाट्य नियम। शास्त्रों का अकाट्य नियम है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु यानी प्राण-त्याग जिस चान्द्र-तिथि को हुई हो, पितृ पक्ष में उसका पार्वण श्राद्ध उसी तिथि को सम्पन्न किया जाना चाहिए। यह नियम सब पितरों पर समान रूप से लागू होता है। दूसरा अंग है मृत्यु के समय की मान्यता। मृत्यु चाहे दिन में हुई हो अथवा रात्रि में, मृत्यु के समय जो तिथि प्रवृत्त थी, पारलौकिक कर्मकाण्ड के लिए वही तिथि उस जीवात्मा की श्राद्ध तिथि मान ली जाती है।
द्वितीया मृत्यु के दो प्रकार के श्राद्ध हैं। पहला है वार्षिक क्षयाह श्राद्ध या एकोद्दिष्ट। यदि किसी की मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो प्रतिवर्ष उसी द्वितीया तिथि को उसका वार्षिक श्राद्ध होता है। यह श्राद्ध पूरे साल भर में जब भी द्वितीया आए, उसी मास की द्वितीया को नहीं, बल्कि मृत्यु जिस मास में हुई थी, उस मास की द्वितीया को होता है। दूसरा है पितृ पक्ष का श्राद्ध। आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया को महालय का पार्वण श्राद्ध होता है, चाहे मृत्यु किसी भी मास की द्वितीया को हुई हो।
स्वाभाविक मृत्यु की शर्त विशेष महत्वपूर्ण है। द्वितीया तिथि का अधिकार केवल उन पितरों को है, जिनकी मृत्यु स्वाभाविक यानी प्राकृतिक रूप से द्वितीया को हुई हो। द्वितीया श्राद्ध मुख्यतः उन पितरों के लिए निर्धारित है जिनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से किसी भी पक्ष की द्वितीया तिथि को हुई हो। यदि अकाल मृत्यु, सधवा मृत्यु, या संन्यासी की मृत्यु द्वितीया को हुई है, तो श्राद्ध की तिथि अलग होगी।
अकाल मृत्यु का अपवाद इस प्रकार है। यदि किसी की अकाल मृत्यु यानी शस्त्र, विष, दुर्घटना से द्वितीया को हुई हो, तो उसका महालय श्राद्ध द्वितीया को नहीं, अपितु चतुर्दशी को होगा। चतुर्दशी श्राद्ध को घट चतुर्दशी या घायल चतुर्दशी भी कहते हैं।
सौभाग्यवती स्त्री का अपवाद भी विशेष है। यदि सधवा स्त्री की मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो पारिवारिक परम्परानुसार नवमी को उसका श्राद्ध करना श्रेष्ठ है, यद्यपि कुछ मतों में द्वितीया को भी किया जा सकता है। नवमी को मातृ-नवमी कहा जाता है।
संन्यासी का अपवाद इस प्रकार है। यदि किसी संन्यासी या यति की मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो उसका श्राद्ध महालय की द्वादशी को ही किया जाएगा।
तिथि अज्ञात होने पर नियम अलग है। यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध होगा। यह सब अज्ञात मृत्यु तिथि वाले पितरों के लिए सामूहिक श्राद्ध का दिन है।
द्वितीया मृत्यु पर श्राद्ध-फल अद्वितीय है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे कन्यावेदिन यानी अपनी कन्याओं के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर यानी दामाद की प्राप्ति होती है। साथ ही पशू वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है। यह विशेष फल द्वितीया मृत्यु वाले पितर का श्राद्ध करने पर भी मिलता है।
इस सिद्धांत का व्यापक प्रभाव यह है कि श्राद्ध की तिथि का चयन वंशज के लिए सरल हो जाता है। यदि उसे माता, पिता, भाई, पत्नी आदि की मृत्यु तिथि याद है और वह द्वितीया है, तो वह बिना किसी संदेह के द्वितीया तिथि पर श्राद्ध कर सकता है, चाहे शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष।
श्राद्ध की विधि में भी कोई परिवर्तन नहीं होता। चाहे मृत्यु शुक्ल द्वितीया को हुई हो या कृष्ण द्वितीया को, श्राद्ध की विधि एक ही होती है। कुतप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त, अपराह्न काल का चयन, कुश-तिल का प्रयोग, अपसव्य, नैऋत्य मुख, पञ्चबलि, अग्नौकरण, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन - ये सब विधियाँ समान रूप से सम्पन्न होती हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण, श्राद्ध कल्पलता और याज्ञवल्क्य स्मृति इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया तिथि को स्वाभाविक रूप से मरे व्यक्ति का श्राद्ध भी द्वितीया तिथि को ही होता है। शुक्ल या कृष्ण पक्ष का भेद नहीं है, परंतु अकाल मृत्यु, सधवा या संन्यासी की मृत्यु द्वितीया को हुई हो तो श्राद्ध की तिथि क्रमशः चतुर्दशी, नवमी या द्वादशी को होगी।
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