विस्तृत उत्तर
धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु के अनुसार, कालभैरव एक तामसिक शक्ति के नियंत्रक और रात्रिकालीन देवता हैं, जिनका प्राकट्य 'निशीथ काल' (मध्यरात्रि) में हुआ था। अतः कालाष्टमी के व्रत में 'रात्रिव्यापिनी अष्टमी' (वह अष्टमी जो रात में विद्यमान हो) का सर्वाधिक महत्व है। यदि अष्टमी तिथि प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) और निशीथ काल को स्पर्श करती है, तो उसी दिन कालाष्टमी का व्रत किया जाना चाहिए।



