वैकुंठ एकादशी मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को आती है और सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इस दिन वैकुंठ के द्वार खुलते हैं, पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष का मार्ग प्राप्त होता है। व्रत, विष्णु सहस्रनाम पाठ और रात्रि जागरण इस दिन विशेष फलदायी है।
भगवान विष्णु का नृत्य सर्वाधिक मोहिनी अवतार से जुड़ा है — समुद्र मंथन के बाद मोहिनी रूप में उनका मनमोहक नृत्य प्रसिद्ध है, जिससे 'मोहिनी अट्टम' नृत्य-शैली प्रेरित है। 'आनंद तांडव' मूलतः शिव के नटराज स्वरूप से जुड़ा है — विष्णु जी के लिए यह पद शास्त्रों में उतना प्रचलित नहीं है।
भगवान विष्णु का वाहन 'गरुड़' है — पक्षियों के राजा, विनता और कश्यप ऋषि के पुत्र। गरुड़ की भक्ति और शक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना वाहन बनाया। इसीलिए विष्णु को 'गरुड़वाहन' और 'गरुड़ध्वज' भी कहते हैं।
पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने वृंदा (तुलसी के पूर्वजन्म) को वरदान दिया था कि वे बिना तुलसी के कोई भोग स्वीकार नहीं करेंगे। वृंदा के पतिव्रत-बल से तुलसी का जन्म हुआ और विष्णु जी ने उसे लक्ष्मी के समान 'विष्णुप्रिया' कहा। इसीलिए विष्णु पूजा में तुलसी अनिवार्य है।
विष्णु जी के शंख का नाम 'पाञ्चजन्य' है। भागवत पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण ने 'शंखासुर' दैत्य का वध करके यह शंख प्राप्त किया था। महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में इसी पाञ्चजन्य को बजाकर युद्धारंभ की घोषणा की गई थी।
देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु राजा बलि को दिए वचन के कारण पाताल लोक में वास करते हैं — इसे ही उनकी योगनिद्रा कहते हैं। यह आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीने (चातुर्मास) चलता है। इस दौरान विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं होते।
शालिग्राम को घर में ऊँचे पवित्र स्थान पर रखें, नित्य पूजा का संकल्प लें, दान या बिक्री न करें। अशुद्ध अवस्था में स्पर्श न करें। जितनी पूजा की क्षमता हो उतने ही रखें। शालिग्राम के साथ तुलसी का पौधा भी शुभ है।
विष्णु जी के भोग में तुलसी दल अनिवार्य है — उसके बिना भोग अधूरा है। मुख्य प्रिय भोग है खीर (गाय के दूध से बनी), सूजी का हलवा, पंचामृत, केला, पेड़े और श्रीफल। भोग सदा सात्विक, ताजा और तुलसी सहित अर्पित करें।
विष्णु पुराण में कुल 6 अंश (खण्ड) हैं। इसकी रचना महर्षि पराशर ने की है और इसमें लगभग 7,000 श्लोक उपलब्ध हैं। इसमें सृष्टि, ध्रुव-प्रह्लाद कथा, राजवंश, श्रीकृष्ण चरित्र और मोक्ष का वर्णन है। 18 पुराणों में आकार में सबसे छोटा पर महत्व में उच्च है।
शेषनाग भगवान विष्णु के परम भक्त और शय्या हैं। वे क्षीरसागर में अपने सहस्र फणों से आसन बनाते हैं जिस पर विष्णु जी योगनिद्रा में विराजते हैं। वे पृथ्वी को धारण करते हैं और रामावतार में लक्ष्मण, कृष्णावतार में बलराम के रूप में अवतरित हुए।
शालिग्राम की पूजा में प्रातः स्नान के बाद गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें, तुलसी दल अर्पित करें (यह अनिवार्य है), चंदन, पुष्प, धूप-दीप और खीर का भोग लगाएं। 'ॐ नमो नारायणाय' का जाप करें। शालिग्राम को ऊँचे स्थान पर रखें और नित्य पूजा का संकल्प रखें।
चातुर्मास में विवाह, यज्ञोपवीत, गृहप्रवेश, मुंडन, दीक्षा आदि सभी मांगलिक संस्कार वर्जित हैं। सावन में साग, भादों में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग करने का विधान है। यह काल जप, भजन, कथा-श्रवण और तपस्या के लिए सर्वोत्तम है।
विष्णु जी का नीला रंग उनकी सर्वव्यापकता का प्रतीक है — जैसे आकाश सर्वत्र है और परिभाषित नहीं, वैसे ही वे। वे क्षीरसागर में निवास करते हैं और 'नारायण' अर्थात जल में निवासी हैं। नीला रंग उनकी असीमता, शांति और परब्रह्म-स्वरूप को दर्शाता है।
भागवत पुराण में भगवान विष्णु के 24 अवतारों में प्रमुख हैं — सनकादि ऋषि, नारद, नर-नारायण, कपिल, दत्तात्रेय, मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि (अभी आना है)। इनमें से 10 दशावतार सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।
विष्णु पूजा में सफेद अक्षत (कच्चा चावल) नहीं चढ़ाते — चढ़ाना हो तो पीला रंगकर चढ़ाएं। सिरस, धतूरा, सेमल, अकौवा के फूल वर्जित हैं। बासी, जूठा या अशुद्ध भोग भी नहीं लगाना चाहिए। तामसिक भोजन और अन्य देवताओं की विशेष सामग्री भी न चढ़ाएं।
भगवान विष्णु का पीतांबर (पीला वस्त्र) पृथ्वीतत्त्व, ज्ञान, शुभता और सात्त्विकता का प्रतीक है। पालनकर्ता होने के नाते वे पृथ्वी के समान सृष्टि का पोषण करते हैं। पीला रंग उनकी स्वर्णिम दिव्यता, समृद्धि और शुभ-शक्ति का प्रतीक है। इसीलिए विष्णु पूजा में पीले फूल और पीले वस्त्र विशेष शुभ हैं।
शालिग्राम भगवान विष्णु का विग्रह रूप है जो नेपाल की गंडकी नदी से प्राप्त होता है। पुराणानुसार वृंदा के श्राप से विष्णु जी का एक रूप पत्थर बना — वही शालिग्राम है। शालिग्राम नामक ग्राम के नाम से भी इसे यह नाम मिला। इस पर चक्र और चिह्न विष्णु के अवतारों के प्रतीक हैं।
विष्णु सहस्रनाम का पाठ प्रातःकाल स्नान के बाद, शुद्ध आसन पर बैठकर, एकाग्र मन और शुद्ध उच्चारण के साथ करना चाहिए। एकादशी, पूर्णिमा और गुरुवार को पाठ विशेष फलदायी है। श्रद्धा और नियमितता इसकी सबसे महत्वपूर्ण शर्त है।
नारायण कवच भागवत पुराण (स्कन्ध 6, अध्याय 8) में वर्णित विष्णु जी का रक्षा-मंत्र है, जो सर्वप्रथम इन्द्र को दिया गया था। स्नान करके, शुद्ध आसन पर बैठकर, 'ॐ नमो नारायणाय' से न्यास सहित पाठ करें। गुरुवार, एकादशी या संकट काल में इसका पाठ विशेष फलदायी है।
विष्णु जी के चार हाथों में — बाएं नीचे कमल (पद्म) = पवित्रता, दाएं नीचे गदा (कौमोदकी) = शक्ति-न्याय, बाएं ऊपर शंख (पाञ्चजन्य) = सृष्टि-नाद, दाएं ऊपर चक्र (सुदर्शन) = काल और ज्ञान। पुराणों में ये चारों प्रतीकात्मक रूप से सृष्टि-संचालन के चार तत्त्वों को दर्शाते हैं।