विस्तृत उत्तर
चातुर्मास वह चार महीने की अवधि है जो देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल एकादशी) से देवोत्थानी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी) तक चलती है। इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं।
शास्त्रों में इस अवधि में कुछ कार्य वर्जित बताए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण निषेध हैं — विवाह संस्कार, यज्ञोपवीत संस्कार (जनेऊ), गृहप्रवेश, मुंडन, दीक्षाग्रहण तथा अन्य सभी मांगलिक षोडश संस्कार। ये सोलह संस्कार इस अवधि में रुक जाते हैं।
पद्म पुराण के अनुसार चातुर्मास में विशेष आहार त्याग का भी विधान है: सावन में साग (पत्तेदार सब्जियाँ) का त्याग, भादों में दही का त्याग, क्वार (आश्विन) में दूध का त्याग, और कार्तिक में दाल का त्याग। जो ब्रह्मचर्य का पालन कर सके वह भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
इसके पीछे वैज्ञानिक-स्वास्थ्य कारण भी हैं — वर्षा ऋतु में पाचन शक्ति क्षीण हो जाती है, गरिष्ठ भोजन ठीक से पचता नहीं और अनेक रोगाणु उत्पन्न होते हैं। इसीलिए यह अवधि त्याग, तपस्या, कथा-पुराण श्रवण, जप, ध्यान और भजन-कीर्तन के लिए विशेष शुभ बताई गई है।





